जमशेदपुर में एक साधारण सी साइकिल लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। इस साइकिल को किसी आम यात्री वाहन की तरह नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती दुकान के रूप में तैयार किया गया है। इसे तैयार करने वाले विशाल शर्मा ने साबित कर दिया है कि सीमित संसाधनों के बीच भी अगर इंसान के भीतर कुछ कर दिखाने की जि लदोज़ हो, तो वह अपनी अलग पहचान बना सकता है। उनकी यह अनूठी रचना हर देखने वाले को चकित कर देती है। वे इसी साइकिल के जरिए अलग-अलग इलाकों और बस्तियों तक पहुंचते हैं और लोगों के घरों के दरवाजे पर जाकर घरेलू तथा कृषि कार्यों में उपयोग होने वाले धारदार औजारों को पैना करते हैं।
अपनी जरूरत के हिसाब से तैयार कराया विशेष ढांचा
विशाल शर्मा ने अपने काम को आसान बनाने और अपनी व्यावसायिक जरूरतों को पूरा करने के लिए साइकिल में खुद ही मोडिफिकेशन करवाया है। उन्होंने वेल्डिंग के जरिए साइकिल के पिछले हिस्से में एक खास तरह का ढांचा फिट कराया है। इसमें अतिरिक्त पहिए के पास लोहे की एक रिंग और औजारों को सुरक्षित रखने व चलाने की पूरी व्यवस्था की गई है। इस चलती-फिरती यूनिट में दो विशेष प्रकार के पत्थर भी लगाए गए हैं, जिनका उपयोग उपकरणों पर धार लगाने के लिए किया जाता है। इस अनोखी व्यवस्था के कारण उन्हें अब किसी पक्की दुकान के किराए की चिंता नहीं करनी पड़ती और न ही ग्राहकों के आने का इंतजार करना होता है, बल्कि वे खुद चलकर ग्राहकों तक पहुंच जाते हैं।
रोजाना तय करते हैं 20 किलोमीटर का लंबा सफर
अपने इस अनूठे व्यवसाय के तहत विशाल हर रोज अपनी इस स्पेशल साइकिल से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। इस दौरान वे विभिन्न गांवों और बस्तियों का दौरा करते हैं, जहां रसोई में उपयोग होने वाले चाकू, छुरी और अन्य धारदार उपकरणों को नई धार दी जाती है। ग्रामीण इलाकों में आज भी इस प्रकार के पारंपरिक कामगारों की काफी मांग बनी हुई है, क्योंकि खेतों में काम आने वाले औजारों से लेकर रसोई के सामानों तक को समय-समय पर पैना करने की आवश्यकता पड़ती है। उनकी यह घूम-घूमकर सेवा देने वाली दुकान ग्रामीणों के लिए बेहद मददगार साबित हो रही है, जिससे उन्हें अपने भारी या छोटे औजारों को दूर ले जाने की परेशानी से मुक्ति मिल जाती है।
मेहनत और हुनर के दम पर हो रही बेहतरीन कमाई
इस अनूठी कार्यशैली और रोजाना की कड़ी मेहनत का परिणाम यह है कि विशाल इस काम के जरिए प्रतिदिन करीब 2,000 रुपये तक की कमाई कर लेते हैं। उनकी यह सफलता इस बात का स्पष्ट उदाहरण पेश करती है कि अपने पैरों पर खड़े होने या आजीविका कमाने के लिए हमेशा भारी-भरकम पूंजी या किसी बड़े बिजनेस सेटअप की आवश्यकता नहीं होती। यदि व्यक्ति के पास सही कौशल, अटूट मेहनत और थोड़ी सी रचनात्मक सोच हो, तो वह साधारण साधनों से भी कमाई का एक मजबूत जरिया विकसित कर सकता है।
आत्मनिर्भरता की एक अनूठी और प्रेरणास्पद मिसाल
विशाल शर्मा की यह कहानी सिर्फ एक जुगाड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि समस्याओं को किस प्रकार अवसरों में बदला जा सकता है। जहां आज के समय में तमाम युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर भटकते हैं, वहीं उन्होंने अपनी सूझबूझ और श्रम के बल पर साइकिल को ही अपना आत्मनिर्भर रोजगार बना लिया है। हर दिन बीस किलोमीटर साइकिल चलाना, गांव-गांव जाकर मेहनत करना और अपने परिवार का भरण-पोषण करना उनकी असाधारण कार्यनिष्ठा और आत्मनिर्भरता की एक जीवंत दास्तान बयां करता है।




















