पहाड़ी समाज की शादियों और मांगलिक उत्सवों में लोकगीतों की परंपरा बेहद पुरानी और समृद्ध रही है। उत्तराखंड के मूल निवासी जो शहरों में बस चुके हैं, उनकी नई पीढ़ी अक्सर अपनी जड़ों और पुरखों के पारंपरिक संस्कारों से दूर होती जा रही है। देहरादून जैसे बड़े शहरों में जब वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो अक्सर वे सुर और धुनें सुनाई नहीं देतीं जो कभी बुजुर्ग महिलाओं की पहचान हुआ करती थीं। पहाड़ी संस्कृति में किसी भी शुभ अवसर पर गाए जाने वाले इन पारंपरिक अनुष्ठानिक गीतों को मांगल गीत कहा जाता है, जिनके बिना पहाड़ी शादियों की रस्में पूरी नहीं मानी जाती हैं।
कौन हैं मंग्ल्यौर और क्या है इनका सामाजिक महत्व
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मांगलिक आयोजनों पर मांगल गीत गाने वाले लोक कलाकारों को स्थानीय बोलचाल में मंग्ल्यौर कहा जाता है। यह परंपरा सदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मौखिक रूप से आगे बढ़ती आई है। ऐतिहासिक रूप से ये गीत मुख्यतः गढ़वाली भाषा में रचे और गाए जाते हैं। पर्वतीय भूगोल के अलग-अलग क्षेत्रों में जैसे ही बोली बदलती है, वैसे ही इन गीतों के शब्दों, उच्चारण और गायन शैली में भी क्षेत्रीय विविधता देखने को मिलती है।
मांगल गीत केवल मनोरंजन या संगीत का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह पीढ़ियों से मिला सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उपहार हैं। इन गीतों के माध्यम से कुल देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है, नवदंपति को अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया जाता है, और पूरे परिवार के कल्याण की कामना की जाती है। बदलते वक्त के साथ जब आधुनिक डीजे और पश्चिमी धुनों का प्रभाव बढ़ा, तो यह अनमोल विरासत धीरे-धीरे शहरों के वैवाहिक मंचों से गायब होने लगी थी।
शहरी शादियों में लोकगीतों को संजोने का अनूठा प्रयास
लुप्त होती इस सांस्कृतिक धरोहर को फिर से मुख्यधारा में लाने के लिए देहरादून का जय मां भगवती ग्रुप पिछले 10 वर्षों से निरंतर सक्रिय है। यह सांस्कृतिक समूह मांगल गीतों को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा उठाए हुए है। आधुनिक जीवनशैली और पश्चिमी संगीत की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं के बीच इस परंपरा को प्रासंगिक बनाए रखना एक बड़ी चुनौती रही है।
इस दिशा में काम कर रहीं समूह की कलाकार रिंकी बताती हैं कि प्राचीन समय की पारंपरिक लोक भाषा में प्रयोग होने वाले शब्द काफी क्लिष्ट और कठिन होते थे, जिन्हें आज की पीढ़ी आसानी से समझ नहीं पाती थी। इसी को ध्यान में रखते हुए अब गीतों में आसान और बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया जाने लगा है। सरल शब्दावली की वजह से युवा इन गीतों के भाव और अर्थ को तुरंत ग्रहण कर लेते हैं। इस पहल का असर यह हुआ है कि देहरादून के आधुनिक वैवाहिक पंडालों में अब एक बार फिर मंग्ल्यौर महिलाओं के सुर गूंजने लगे हैं, जिससे पहाड़ की समृद्ध लोक परंपरा को नया जीवन मिल रहा है।























