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उत्तराखंड के शुभ विवाहों में मांगल गीतों का महत्व और मंग्ल्यौर परंपरा की नई वापसीउत्तराखंड
6 अक्तू॰ 2026, 10:10 pm (31 दिन पहले)· 2

उत्तराखंड के शुभ विवाहों में मांगल गीतों का महत्व और मंग्ल्यौर परंपरा की नई वापसी

उत्तराखंड के पारंपरिक विवाह समारोहों में गाए जाने वाले मांगलिक गीतों और लोक कलाकारों यानी मंग्ल्यौर की भूमिका को सहेजने के लिए देहरादून में विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए इन पारंपरिक गीतों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है।

पहाड़ी समाज की शादियों और मांगलिक उत्सवों में लोकगीतों की परंपरा बेहद पुरानी और समृद्ध रही है। उत्तराखंड के मूल निवासी जो शहरों में बस चुके हैं, उनकी नई पीढ़ी अक्सर अपनी जड़ों और पुरखों के पारंपरिक संस्कारों से दूर होती जा रही है। देहरादून जैसे बड़े शहरों में जब वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो अक्सर वे सुर और धुनें सुनाई नहीं देतीं जो कभी बुजुर्ग महिलाओं की पहचान हुआ करती थीं। पहाड़ी संस्कृति में किसी भी शुभ अवसर पर गाए जाने वाले इन पारंपरिक अनुष्ठानिक गीतों को मांगल गीत कहा जाता है, जिनके बिना पहाड़ी शादियों की रस्में पूरी नहीं मानी जाती हैं।

कौन हैं मंग्ल्यौर और क्या है इनका सामाजिक महत्व

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मांगलिक आयोजनों पर मांगल गीत गाने वाले लोक कलाकारों को स्थानीय बोलचाल में मंग्ल्यौर कहा जाता है। यह परंपरा सदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मौखिक रूप से आगे बढ़ती आई है। ऐतिहासिक रूप से ये गीत मुख्यतः गढ़वाली भाषा में रचे और गाए जाते हैं। पर्वतीय भूगोल के अलग-अलग क्षेत्रों में जैसे ही बोली बदलती है, वैसे ही इन गीतों के शब्दों, उच्चारण और गायन शैली में भी क्षेत्रीय विविधता देखने को मिलती है।

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मांगल गीत केवल मनोरंजन या संगीत का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह पीढ़ियों से मिला सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उपहार हैं। इन गीतों के माध्यम से कुल देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है, नवदंपति को अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया जाता है, और पूरे परिवार के कल्याण की कामना की जाती है। बदलते वक्त के साथ जब आधुनिक डीजे और पश्चिमी धुनों का प्रभाव बढ़ा, तो यह अनमोल विरासत धीरे-धीरे शहरों के वैवाहिक मंचों से गायब होने लगी थी।

शहरी शादियों में लोकगीतों को संजोने का अनूठा प्रयास

लुप्त होती इस सांस्कृतिक धरोहर को फिर से मुख्यधारा में लाने के लिए देहरादून का जय मां भगवती ग्रुप पिछले 10 वर्षों से निरंतर सक्रिय है। यह सांस्कृतिक समूह मांगल गीतों को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा उठाए हुए है। आधुनिक जीवनशैली और पश्चिमी संगीत की ओर आकर्षित हो रहे युवाओं के बीच इस परंपरा को प्रासंगिक बनाए रखना एक बड़ी चुनौती रही है।

इस दिशा में काम कर रहीं समूह की कलाकार रिंकी बताती हैं कि प्राचीन समय की पारंपरिक लोक भाषा में प्रयोग होने वाले शब्द काफी क्लिष्ट और कठिन होते थे, जिन्हें आज की पीढ़ी आसानी से समझ नहीं पाती थी। इसी को ध्यान में रखते हुए अब गीतों में आसान और बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया जाने लगा है। सरल शब्दावली की वजह से युवा इन गीतों के भाव और अर्थ को तुरंत ग्रहण कर लेते हैं। इस पहल का असर यह हुआ है कि देहरादून के आधुनिक वैवाहिक पंडालों में अब एक बार फिर मंग्ल्यौर महिलाओं के सुर गूंजने लगे हैं, जिससे पहाड़ की समृद्ध लोक परंपरा को नया जीवन मिल रहा है।

सवाल-जवाब

उत्तराखंड की संस्कृति में मांगल गीत किसे कहते हैं?
उत्तराखंड में विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर गाए जाने वाले पारंपरिक शुभ गीतों को मांगल गीत कहा जाता है।
मंग्ल्यौर किन्हें कहा जाता है?
मांगलिक उत्सवों पर पारंपरिक मांगल गीत प्रस्तुत करने वाले लोक कलाकारों को क्षेत्र में मंग्ल्यौर के नाम से जाना जाता है।
मांगल गीत मुख्य रूप से किस भाषा में गाए जाते हैं?
पारंपरिक रूप से ये गीत मुख्यतः गढ़वाली भाषा में गाए जाते हैं, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों के अनुसार इनके शब्दों में थोड़ा बदलाव आ जाता है।
देहरादून में मांगल गीतों को सहेजने का काम कौन सा समूह कर रहा है?
देहरादून का जय मां भगवती ग्रुप पिछले 10 वर्षों से इन मांगल गीतों को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है।
नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए इन गीतों में क्या बदलाव किया गया है?
कलाकार रिंकी के अनुसार, गीतों की पुरानी कठिन भाषा के स्थान पर अब साधारण और सुगम शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है ताकि युवा इन्हें आसानी से समझ सकें।
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टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·30 दिन पहले

शहरों में अपनी संस्कृति को जिंदा रखना वाकई मुश्किल होता है। देहरादून में डीजे के शोर के बीच मांगल गीतों का इस तरह वापस लौटना दिल को सुकून देता है, खासकर जब युवा भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·30 दिन पहले

अपनी जड़ों और पारंपरिक गीतों को बचाए रखने की यह कोशिश वाक़ई बहुत अच्छी है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·30 दिन पहले

रविकश जी, कोशिश अच्छी है पर क्या सच में डीजे की जगह ये ले पाएंगे? युवा तो पार्टी वाले गानों पर ही थिरकते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·30 दिन पहले

देहरादून में जब भी ढोल-दमाऊ की थाप और मांगल गीत सुनाई देते हैं, तो लगता है अपनी मिट्टी से जुड़ गए। डीजे के शोर में ये पारंपरिक सुर खोते जा रहे थे, इन्हें दोबारा सुनना सुकून देता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·30 दिन पहले

रोहन भाई, बिल्कुल सही कहा आपने। डीजे के शोर में हमारे लोकगीत और संस्कृति कहीं खो से गए थे, इन्हें वापस लाना बहुत ज़रूरी था।

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