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उत्तराखंड में उपेक्षा के भंवर में कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य, आय घटने से लोक कलाकारों पर मंडराया आजीविका का संकटउत्तराखंड
20 सित॰ 2026, 4:35 pm (2 दिन पहले)· 1

उत्तराखंड में उपेक्षा के भंवर में कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य, आय घटने से लोक कलाकारों पर मंडराया आजीविका का संकट

कुमाऊं के पारंपरिक छोलिया नृत्य से जुड़े कलाकार शादी समारोहों में घटे अवसरों और सरकारी योजनाओं के अटके लाभ के चलते गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं.

उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और कुमाऊं मंडल की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाने वाला छोलिया नृत्य वर्तमान दौर में अपने अस्तित्व की कठिन लड़ाई लड़ रहा है. किसी समय पर्वतीय अंचल के पारंपरिक विवाह समारोहों, धार्मिक आयोजनों और भव्य सांस्कृतिक मेलों में छोलिया नर्तकों और वादकों की उपस्थिति सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी. पारंपरिक ढोल और दमाऊं की गूंज, हाथों में चमकती तलवार और ढाल तथा विशेष रंगीन वेशभूषा के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले इस लोक नृत्य की पहचान अब धीरे-धीरे धूमिल होती दिख रही है. सामाजिक प्राथमिकताओं में बदलाव और आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव ने इन पारंपरिक कलाकारों के सामने आजीविका का गहरा संकट खड़ा कर दिया है. कलाकारों का स्पष्ट कहना है कि आयोजनों में उनकी मांग तेजी से घटी है, जिससे नियमित आमदनी पर सीधा असर पड़ा है, जबकि सरकारी स्तर पर होने वाली संरक्षण और वित्तीय सहायता की घोषणाएं भी धरातल पर उन तक नहीं पहुंच सकी हैं.

पीढ़ियों से विरासत के रूप में इस विधा को जीवित रखने वाले लोक कलाकार अब परिवार के भरण-पोषण के लिए दूसरे मजदूरी और दैनिक कार्यों की ओर रुख करने को विवश हो रहे हैं. कलाकारों के सामने केवल तात्कालिक दैनिक खर्च जुटाने की समस्या नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी चिंता इस ऐतिहासिक विधा के विलुप्त होने की है. यदि नई पीढ़ी को इसमें भविष्य नहीं दिखाई दिया और वे इस परंपरा से विमुख हो गए, तो आने वाले दशकों में छोलिया दलों का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है.

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तीन पीढ़ियों से नयना देवी मंदिर में सेवा दे रहा परिवार

पिथौरागढ़ जिले के सीमांत पांखूं गांव से अपने छोलिया दल के साथ नैनीताल पहुंचे लोक कलाकार भगत राम बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से निरंतर इस पारंपरिक विधा को आगे बढ़ा रहा है. उनके दादाजी नैनीताल स्थित मां नयना देवी मंदिर में आकर ढोल वादन और नृत्य करते थे, जिसके बाद उनके पिता ने इस धरोहर को संभाला और अब वह स्वयं इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. भगत राम पिछले लगभग 30 वर्षों से हर वर्ष अपना ढोल लेकर नैनीताल आते हैं और मां नयना देवी मंदिर में नियमित आरती के दौरान अपने दल के साथ प्रस्तुति देते हैं.

भगत राम का कहना है कि इसी लोक कला से मिलने वाले मानदेय और नेग से उनके परिवार की गृहस्थी चलती रही है. हालांकि, हाल के वर्षों में सामाजिक रुझान बदलने से शादियों और शुभ कार्यों में छोलिया दलों को आमंत्रित करने का चलन काफी कम हो गया है. आमंत्रणों में भारी गिरावट आने से उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है. इसके साथ ही युवा पीढ़ी भी इसमें अनिश्चित भविष्य देखकर रुचि लेने से कतरा रही है.

पेंशन के लिए दफ्तरों के चक्कर और अटके भुगतान

कलाकारों की एक बड़ी व्यथा यह भी है कि जीवन भर सांस्कृतिक पहचान को संजोने के बावजूद वृद्धावस्था में उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पा रही है. भगत राम बताते हैं कि लोक कलाकारों को पेंशन और सरकारी मदद मिलने की उम्मीद लंबे समय से बंधी हुई है. उन्होंने स्वयं देहरादून जाकर पेंशन की औपचारिकताओं के लिए कई बार प्रयास किए, लेकिन आज तक उन्हें किसी भी प्रकार की पेंशन का लाभ नहीं मिल सका. इसके अतिरिक्त, सरकारी स्तर पर आयोजित होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मेलों में प्रस्तुति देने के बाद मिलने वाली मानदेय राशि भी समय पर नहीं मिलती. कई पुराने कार्यक्रमों का भुगतान आज तक लंबित पड़ा हुआ है.

वेशभूषा का खर्च भी खुद उठाने को मजबूर कलाकार

छोलिया नृत्य की सबसे प्रमुख विशेषताओं में उसकी विशिष्ट और आकर्षक पारंपरिक पोशाक शामिल होती है, जिसमें घेरदार जामा, पगड़ी और कमरबंद प्रमुख हैं. भगत राम के अनुसार, इस पूरी पोशाक को तैयार कराने का सारा खर्च कलाकारों को अपनी जेब से ही वहन करना पड़ता है. आर्थिक तंगी के दौर में इन महंगी पोशाकों को तैयार कराना और उनका रखरखाव करना उनके लिए भारी बोझ साबित होता है.

कलाकारों का कहना है कि यदि शासन स्तर पर छोलिया दलों के संरक्षण के लिए एक स्पष्ट नीति तैयार की जाए, नियमित आर्थिक सहायता की व्यवस्था बने और राज्य के आधिकारिक आयोजनों में अवसर सुनिश्चित किए जाएं, तो कलाकार अपने परिवारों का सम्मानजनक पालन-पोषण कर सकते हैं. छोलिया केवल साधारण मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान है, जिसे जिंदा रखने के लिए कलाकारों को वित्तीय सुरक्षा और सामाजिक सम्मान दोनों की तत्काल आवश्यकता है.

पीढ़ियों के समर्पण के बाद भी सरकारी लाभ से वंचित

इसी परंपरा से जुड़े अन्य कलाकार किशन राम भी सरकारी मदद न मिलने से बेहद आहत हैं. उनका कहना है कि उनका परिवार पीढ़ियों से ढोल-दमाऊं और छोलिया कला की सेवा करता आ रहा है और इसी पर उनकी आजीविका निर्भर रही है. इसके बावजूद, आज तक उन्हें न तो कोई नियमित पेंशन मिली और न ही सरकार की किसी कल्याणकारी योजना का यथेष्ट लाभ उन तक पहुंचा है. किशन राम ने मांग उठाई है कि सरकार वरिष्ठ और पारंपरिक कलाकारों के लिए उचित पेंशन योजना, आपातकालीन आर्थिक सहायता तथा बुनियादी सुविधाओं की ठोस व्यवस्था करे, जिससे युवा कलाकार मजबूरी में अपनी पुश्तैनी कला को त्यागने के बजाय गौरव के साथ इसे आगे बढ़ा सकें.

सत्यापन के बाद 49 कलाकारों की फाइलें ठंडे बस्ते में

ओखलकांडा क्षेत्र से नैनीताल पहुंचे छोलिया दल का नेतृत्व कर रहे नारायण राम ने विभागीय योजनाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने बताया कि शासन की ओर से ढोल-दमाऊं बजाने वाले लोक कलाकारों को आर्थिक संबल देने के उद्देश्य से एक योजना की रूपरेखा सामने आई थी. इस योजना के अंतर्गत जिले भर से 49 योग्य लोक कलाकारों का विधिवत चयन किया गया था. कलाकारों के कई स्तरों पर कागजी सत्यापन की प्रक्रिया भी पूरी कर ली गई थी.

नारायण राम के अनुसार, सत्यापन पूरा होने के बाद पूरी प्रक्रिया अचानक ठंडे बस्ते में चली गई और आज तक किसी भी चयनित कलाकार को सहायता राशि जारी नहीं की गई. इस प्रशासनिक ढिलाई से कलाकारों में गहरी निराशा और आक्रोश व्याप्त है. उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में छोलिया कला से जुड़े पारंगत कलाकारों की संख्या साल-दर-साल घट रही है. यदि वक्त रहते इस लोक विधा को बचाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इस समृद्ध विरासत को केवल किताबों और पुराने वीडियो में ही देख पाएंगी.

आधुनिक डीजे संस्कृति और परंपरा को बचाने की चुनौतियां

कलाकारों का स्पष्ट विश्लेषण है कि शादी-ब्याह और पारिवारिक समारोहों में मोबाइल फोन, लाउड डीजे और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संगीत के बेलगाम चलन ने पारंपरिक लोक वाद्यों की महत्ता को गहरा आघात पहुंचाया है. पूर्व में जिस छोलिया दल के बिना कोई भी शुभ कार्य अधूरा माना जाता था, अब लोग पश्चिमी धुनों और आधुनिक लाउडस्पीकरों को प्राथमिकता देने लगे हैं. इससे लोक कलाकारों के आय के पारंपरिक स्रोत लगभग समाप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं.

अपनी लुप्तप्राय कला को पुनर्जीवित करने के लिए कलाकारों ने प्रमुख रूप से मांगें रखी हैं कि राज्य के सभी आधिकारिक सांस्कृतिक एवं पर्यटन उत्सवों में छोलिया दलों को अनिवार्य अवसर दिए जाएं, वयोवृद्ध कलाकारों के लिए नियमित पेंशन की व्यवस्था हो, पूर्व प्रस्तुतियों के बकाये भुगतान तुरंत जारी किए जाएं तथा नई पीढ़ी को पारंपरिक ढोल-दमाऊं और छोलिया नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण देने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएं. ढोल और दमाऊं की गूंजती थाप कुमाऊं की ऐतिहासिक आन-बान-शान है, जिसे बचाए रखना पूरे समाज और शासन की सामूहिक जिम्मेदारी है.

सवाल-जवाब

छोलिया नृत्य क्या है और यह किस क्षेत्र से संबंधित है?
छोलिया उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल का एक पारंपरिक युद्ध नृत्य है, जिसे ढोल और दमाऊं की थाप पर तलवार और ढाल लेकर विशेष वेशभूषा में प्रस्तुत किया जाता है.
वर्तमान में छोलिया कलाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
शादी समारोहों में आमंत्रण घटने, सरकारी सहायता व पेंशन न मिलने और आधुनिक डीजे संस्कृति के कारण कलाकारों के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है.
भगत राम कितने वर्षों से नयना देवी मंदिर में प्रस्तुति दे रहे हैं?
भगत राम पिछले करीब 30 वर्षों से हर वर्ष नैनीताल पहुंचकर मां नयना देवी मंदिर की आरती के दौरान अपने छोलिया दल के साथ प्रस्तुति दे रहे हैं.
नैनीताल में कलाकारों के चयन से जुड़ी कौन सी योजना अटकी हुई है?
ढोल-दमाऊं बजाने वाले 49 कलाकारों का चयन और सत्यापन होने के बावजूद सरकारी आर्थिक सहायता की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है.
छोलिया कलाकारों की सरकार से मुख्य मांगें क्या हैं?
कलाकार नियमित पेंशन, समय पर बकाया भुगतान, पारदर्शी आर्थिक सहायता नीति और सरकारी आयोजनों में प्रस्तुति के नियमित अवसर देने की मांग कर रहे हैं.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·1 दिन पहले

आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक लोक कलाओं का हाशिए पर जाना केवल कलाकारों की आजीविका का संकट नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और धरोहर पर्यटन के लिए भी एक गंभीर क्षति है। विवाह और उत्सवों की आधुनिक जीवनशैली में अपनी जड़ों को भूलना समाज की सांस्कृतिक संवेदनशीलता को कम करता है। छोलिया जैसे जीवंत युद्ध नृत्य को समकालीन सांस्कृतिक यात्रा कार्यक्रमों और आधुनिक आयोजनों का हिस्सा बनाकर ही हम इस अनूठी विरासत को पुनर्जीवित कर सकते हैं, जिससे नई पीढ़ी को इसमें सम्मानजनक भविष्य दिखे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

यह रिपोर्ट उत्तराखंड की सांस्कृतिक नीति और प्रशासनिक क्रियान्वयन के बीच की गहरी खाई को उजागर करती है। किसी भी राज्य की अमूर्त विरासत का संरक्षण केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि समयबद्ध पेंशन और पारदर्शी भुगतान प्रणाली से ही संभव है। जब पारंपरिक कलाकार आजीविका के संकट के कारण दैनिक मजदूरी की ओर रुख करने को मजबूर हैं, तो यह सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के जमीनी स्तर पर विफल होने का स्पष्ट संकेत है। नीतिगत स्तर पर सांस्कृतिक पर्यटन और सरकारी आयोजनों में इन कलाकारों को अनिवार्य रूप से शामिल करने की तत्काल आवश्यकता है, ताकि इस ऐतिहासिक विधा को विलुप्त होने से बचाया जा सके।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

अर्जुन की बात से सहमति जताते हुए मैं इसे आर्थिक व्यवहार्यता के चश्मे से देखता हूँ। सांस्कृतिक संरक्षण केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता है। लोक कलाओं को जीवित रखने के लिए हमें इन्हें पर्यटन अर्थव्यवस्था और स्थानीय आतिथ्य (हॉस्पिटैलिटी) उद्योग के साथ सीधे जोड़ना होगा। जब तक इन पारंपरिक दलों के लिए नियमित और संवहनीय व्यावसायिक मॉडल तैयार नहीं किए जाते, तब तक केवल सरकारी राहत पर निर्भरता संकट को पूरी तरह दूर नहीं कर सकती। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और डिजिटल बुकिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए इन्हें संगठित बाजार से जोड़ना ही इसका स्थायी समाधान है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

यह रिपोर्ट हमारी सांस्कृतिक नीति और प्रशासनिक उदासीनता के अंतर्विरोध को उजागर करती है। सरकारी स्तर पर लोक कलाओं का उपयोग केवल प्रचार और पर्यटन तक सीमित रह गया है, जबकि धरातल पर कलाकारों को सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और समय पर भुगतान जैसी बुनियादी जरूरतें भी नहीं मिल पा रही हैं। सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए केवल कागजी घोषणाओं की नहीं, बल्कि एक जवाबदेह कल्याणकारी नीति और स्थायी आर्थिक मॉडल की आवश्यकता है, ताकि नई पीढ़ी इस अनमोल विरासत से विमुख न हो।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

लोक कलाकारों को घोषित पेंशन और मानदेय न मिलना केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मामला है। सीमांत क्षेत्रों के इन कलाकारों को सांस्कृतिक संरक्षण के नाम पर केवल वादे मिले हैं, जबकि ज़मीनी स्तर पर वे आर्थिक बदहाली में धकेले जा रहे हैं। जब सरकारी कल्याणकारी योजनाएं और भुगतान फाइलों में अटक जाते हैं, तो यह व्यवस्थागत उपेक्षा बन जाती है। संस्कृति विभाग को चाहिए कि वह कलाकारों के कल्याण कोष और पेंशन वितरण का पारदर्शी ऑडिट कराए और समयबद्ध भुगतान की कानूनी व्यवस्था तय करे, ताकि यह ऐतिहासिक धरोहर प्रशासनिक लापरवाही की भेंट न चढ़े।

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