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उत्तराखंड राज्य आंदोलन के उस खूनी सफर की दास्तान जब दिल्ली जा रहे प्रदर्शनकारियों पर रामपुर तिराहे पर बरसाई गई थीं गोलियांउत्तराखंड
2 अक्तू॰ 2026, 4:01 pm (36 दिन पहले)· 2

उत्तराखंड राज्य आंदोलन के उस खूनी सफर की दास्तान जब दिल्ली जा रहे प्रदर्शनकारियों पर रामपुर तिराहे पर बरसाई गई थीं गोलियां

2 अक्टूबर 1994 को अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली कूच कर रहे उत्तराखंड आंदोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर हुए हमले की कड़वी यादें आज भी ताजा हैं। आंदोलनकारी अंबुज शर्मा ने उस रात की आपबीती साझा की जब कई साथी हमेशा के लिए बिछड़ गए।

उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए लड़ी गई लंबी लड़ाई के पन्नों में 2 अक्टूबर 1994 की तारीख एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसका जख्म तीन दशक बाद भी ताजा है। अलग पहाड़ी राज्य की आस संजोए हजारों आंदोलनकारी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के इरादे से अपने-अपने घरों से रवाना हुए थे। लोगों के दिलों में केवल अपने हक की आवाज देश की राजधानी तक पहुंचाने की उमंग थी, लेकिन किसी को जरा भी भनक नहीं थी कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित रामपुर तिराहे पर उनके काफिले का स्वागत बंदूकों की गोलियों और अमानवीय जुल्म से किया जाएगा। उस खौफनाक रात ने कई बेकसूरों की जान ले ली और अनगिनत परिवारों को जीवन भर का रोना दे दिया। उस ऐतिहासिक काफिले में शामिल रहे आंदोलनकारी अंबुज शर्मा आज भी उस मंजर को याद करते हैं तो उनका गला भर आता है और दिल में वही पुराना दर्द दोबारा उभर उठता है।

जंतर-मंतर पर हुंकार भरने की तैयारी और वो अनजाना सफर

अंबुज शर्मा के अनुसार, 2 अक्टूबर 1994 का दिन उत्तराखंड के जनमानस के लिए अपनी सामूहिक आवाज उठाने का तय मुकाम था। पूरे पहाड़ी इलाके से नौजवान, बुजुर्ग और आम नागरिक भारी संख्या में अलग-अलग वाहनों, बसों और निजी गाड़ियों में सवार होकर दिल्ली कूच करने की योजना बना रहे थे। जंतर-मंतर पर पहुंचकर केंद्र की सत्ता तक यह संदेश पहुंचाना था कि एक अलग पर्वतीय राज्य का गठन अब अपरिहार्य हो चुका है। पूरा माहौल आंदोलन के जोश और उम्मीदों से लबरेज था। काफिले में सवार लोग एक-दूसरे का हौसला बढ़ा रहे थे, हंसी-मजाक चल रहा था और अपने उज्ज्वल भविष्य की बातें हो रही थीं। लेकिन किसी ने यह कल्पना तक नहीं की थी कि रास्ते में उन्हें एक ऐसा भयावह और रक्तरंजित मंजर देखना पड़ेगा, जिसकी यादें जिंदगी के आखिरी सांस तक उनका पीछा नहीं छोड़ेंगी।

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सुबह रामपुर तिराहा पहुंचते ही पसरा था मौत का सन्नाटा

सफर के दौरान अंबुज शर्मा अपनी गाड़ी से तड़के करीब 3:30 से 4 बजे के आसपास मुजफ्फरनगर की सीमा पर रामपुर तिराहे पहुंचे। वहां कदम रखते ही जो दृश्य उनकी आंखों के सामने आया, उसने पैरों तले जमीन खिसका दी। उस समय तक वहां पुलिस की बर्बर गोलीबारी हो चुकी थी और चारों ओर चीख-पुकार, धुएं और खून के सिवा कुछ नजर नहीं आ रहा था। जमीन पर बेतरतीब तरीके से शव लाए जा रहे थे और यह पहचानना तक नामुमकिन था कि कौन सा शव किस बेकसूर का है। प्रदेश के कोने-कोने से आ रहे आंदोलनकारियों की गाड़ियां रुक रही थीं और हर तरफ घोर अफरा-तफरी मची हुई थी।

उस खौफनाक माहौल में किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि इस अनपेक्षित संकट से कैसे निपटा जाए या किसे मदद की पुकार लगाई जाए। हर कोई बदहवास होकर अपने परिजनों और दोस्तों को तलाशने में जुटा था। इसी अफरातफरी के बीच अंबुज शर्मा के सामने अचानक एक गंभीर रूप से लहूलुहान आंदोलनकारी आया, जिसे गोली लगी हुई थी और उसका शरीर दर्द से तड़प रहा था। उस नाज़ुक स्थिति में बिना वक्त गंवाए उसे किसी भी तरह तत्काल अस्पताल पहुंचाने का फैसला लिया गया।

एंबेसडर कार में घायल साथी को बचाने की जद्दोजहद

उस समय अंबुज शर्मा के पास अपनी एंबेसडर कार थी। उन्होंने बिना देर किए उस गोली लगे अचेत युवक को सहारा देकर अपनी एंबेसडर कार की पिछली सीट पर बैठाया और फौरन नजदीकी अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। अस्पताल पहुंचने पर जब डॉक्टरों ने युवक की गंभीर और बिगड़ती हालत का मुआयना किया, तो उन्होंने स्थानीय स्तर पर इलाज संभव न बताते हुए उसे तुरंत चंडीगढ़ के बड़े अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। सबसे बड़ी विकट परिस्थिति यह थी कि उस घायल व्यक्ति के साथ न तो उसका कोई परिजन मौजूद था और न ही आसपास ऐसा कोई शख्स था जो उसकी पहचान बता सके।

उसकी शिनाख्त करने की कोशिश में जब उसकी जेबों की तलाशी ली गई, तो उसमें से एक कागज की पर्ची बरामद हुई। उस पर्ची पर उस घायल व्यक्ति का नाम और उस बस का नंबर दर्ज था जिसमें वह सवार होकर दिल्ली जा रहा था। इस सूत्र के मिलते ही अंबुज शर्मा और अन्य साथियों ने उस विशेष बस के अन्य मुसाफिरों से संपर्क साधने की हर मुमकिन कोशिश शुरू की। काफी मशक्कत और तलाश के बाद उस बस के एक व्यक्ति से संपर्क भी स्थापित हो गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। तमाम कोशिशों के बावजूद गोली का गहरा घाव झेल रहे उस जांबाज को बचाया नहीं जा सका और उसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। वह भी अलग राज्य निर्माण की वेदी पर शहीद हो गया।

अस्पताल का मंजर और अपने कॉलेज के साथी को खोने का असहनीय गम

इसके बाद अंबुज शर्मा मुजफ्फरनगर के मुख्य अस्पताल पहुंचे, जहां का नजारा किसी युद्धक्षेत्र जैसा प्रतीत हो रहा था। अस्पताल के गलियारों और वार्डों में उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े अनगिनत साथी गंभीर रूप से घायल अवस्था में तड़प रहे थे। वहां चारों तरफ अपने साथियों को ढूंढने की बेचैनी, रोने-बिलखने की आवाजें और घायल साथियों की खैरियत जानने की भागदौड़ मची थी। हर आंख में डर, गम और अपने अपनों की सलामती की चिंता साफ झलक रही थी।

अंबुज शर्मा के लिए रामपुर तिराहा कांड केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से जिंदगी का सबसे बड़ा आघात था। उन्होंने उस रात अपने सबसे अजीज साथी रविंद्र गोलू रावत को खो दिया था। अंबुज बताते हैं कि रविंद्र गोलू रावत, जिन्हें वह प्यार से 'गोलू' पुकारते थे, उनके लिए एक छोटे भाई की तरह थे। दोनों ने एक साथ कॉलेज में पढ़ाई पूरी की थी और दोनों कंधे से कंधा मिलाकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। कॉलेज के दिनों की दोस्ती और साथ मिलकर देखे गए अलग राज्य के सपने एक झटके में गोलियों की गूंज के बीच बिखर गए थे।

जो काफिला साथ चला था, वह लौटते समय बिखर चुका था

अंबुज शर्मा नम आंखों से कहते हैं कि उन्होंने जिंदगी में कभी यह नहीं सोचा था कि जिस भाई जैसे साथी और जिन जिंदादिल दोस्तों के साथ वे एक सुनहरे भविष्य का सपना लेकर घर से निकले थे, उन्हें इस तरह हमेशा-हमेशा के लिए खोना पड़ेगा। जब वह काफिला अपने घरों से दिल्ली के लिए रवाना हुआ था, तब सभी साथी साथ थे, हर चेहरा उम्मीदों से दमक रहा था और सबका एक ही मकसद था। लेकिन जब वापसी की घड़ी आई, तो वह काफिला पूरी तरह बदल चुका था।

घर लौटते वक्त कई करीबी दोस्त हमेशा के लिए दूर हो चुके थे। कई नौजवान गोलियों का शिकार होकर शहादत पा चुके थे, जबकि कई जिंदगी भर के लिए शारीरिक रूप से जख्मी हो चुके थे। अंबुज शर्मा का कहना है कि करीब तीन दशक यानी तीस साल का लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी रामपुर तिराहे की वह काली रात उनके जेहन में किसी अतीत की तरह धुंधली नहीं हुई है। साथियों को अपनी आंखों के सामने खोने की टीस और वह अंतहीन दर्द आज भी उनके सीने में उसी तरह जिंदा है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में हर साल रामपुर तिराहा कांड की बरसी उन सभी अमर शहीदों के बलिदान की याद दिलाती है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के सम्मान और अलग पहचान के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

सवाल-जवाब

रामपुर तिराहा कांड की घटना कब घटी थी?
यह दुखद घटना 2 अक्टूबर 1994 को तड़के सुबह मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर घटी थी।
आंदोलनकारी अपने घरों से किस उद्देश्य के लिए निकले थे?
आंदोलनकारी उत्तराखंड के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने जा रहे थे।
अंबुज शर्मा रामपुर तिराहे पर कितने बजे पहुंचे थे?
अंबुज शर्मा सुबह करीब 3:30 से 4:00 बजे के आसपास रामपुर तिराहे पहुंचे थे।
अंबुज शर्मा ने घायल आंदोलनकारी को अस्पताल पहुंचाने के लिए किस वाहन का इस्तेमाल किया था?
उन्होंने घायल आंदोलनकारी को अस्पताल पहुंचाने के लिए अपनी एंबेसडर कार का इस्तेमाल किया था।
घायल व्यक्ति की पहचान के संबंध में क्या जानकारी मिली थी?
उसकी जेब से एक पर्ची मिली थी जिस पर उसका नाम और उसकी बस का नंबर लिखा हुआ था।
डॉक्टरों ने घायल आंदोलनकारी को किस शहर के अस्पताल के लिए रेफर किया था?
प्राथमिक अस्पताल के डॉक्टरों ने गंभीर हालत देखते हुए घायल को चंडीगढ़ रेफर किया था, जहां उसकी मौत हो गई।
अंबुज शर्मा के कॉलेज के साथी कौन थे जो इस आंदोलन में शहीद हुए?
उनके कॉलेज के साथी और छोटे भाई जैसे करीबी रविंद्र गोलू रावत थे, जिन्हें वह प्यार से गोलू कहते थे।
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टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·35 दिन पहले

उत्तराखंड आंदोलन का यह खूनी पन्ना आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। अपनों को खोने का दर्द कभी कम नहीं होता।

Ravikash Gupta@ravikash·36 दिन पहले

सुबह साढ़े तीन-चार बजे का वो सन्नाटा और गोलियों की गूंज सोचकर ही सिहरन हो जाती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·36 दिन पहले

रविकेश जी, सच कहा आपने। सोचकर ही रूह कांप जाती है कि उन लोगों पर क्या बीती होगी जो अपनों को तलाश रहे थे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·36 दिन पहले

सुबह साढ़े तीन-चार बजे वो मंजर देखना, कलेजा कांप जाता है सोचकर।

Rohan Verma@rohan-verma·36 दिन पहले

करण भाई, सच में कलेजा कांप जाता है वो सुबह सोचकर। क्या कभी पता चल पाया कि उस रात इतनी बेदर्दी का हुक्म किसने दिया था?

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