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विदेशी अंशदान कानून 2026 के नए प्रावधानों पर चर्च संगठनों ने जताई कड़ी आपत्ति, अमेरिकी सांसद राइली मूर की टिप्पणी के बाद गरमाया मामलाभारत
6 अग॰ 2026, 9:13 pm (1 दिन पहले)· 0

विदेशी अंशदान कानून 2026 के नए प्रावधानों पर चर्च संगठनों ने जताई कड़ी आपत्ति, अमेरिकी सांसद राइली मूर की टिप्पणी के बाद गरमाया मामला

केंद्र सरकार संसद में एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 पेश करने की तैयारी में है, जिसके प्रावधानों को लेकर ईसाई संगठनों ने चिंता जताई है। वहीं गृह मंत्रालय का कहना है कि यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है।

केंद्र सरकार आगामी सप्ताह में लोकसभा के पटल पर विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पेश करने की तैयारी कर रही है। हालांकि, इस प्रस्तावित कानून को लेकर देश भर के विभिन्न चर्च और ईसाई संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। विरोधी संस्थाओं का तर्क है कि बिल के नए प्रावधान उनके सामाजिक कार्यों, प्रशासनिक स्वतंत्रता और संस्थागत परिसंपत्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। दूसरी ओर, केंद्रीय गृह मंत्रालय का कहना है कि इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य विदेशी धन के लेनदेन में राष्ट्रीय सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करना है।

नामित प्राधिकरण और संपत्तियों के प्रबंधन पर उठे सवाल

ईसाई संगठनों की सबसे प्रमुख आशंका बिल के उस प्रावधान को लेकर है, जिसमें केंद्र सरकार को एक नामित प्राधिकरण यानी डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है। प्रस्तावित नियमों के तहत यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है, संस्था स्वयं अपना लाइसेंस छोड़ देती है, या फिर समय पर नवीनीकरण न होने के कारण लाइसेंस समाप्त हो जाता है, तो यह प्राधिकरण उस संस्था के संपूर्ण प्रबंधन को अपने नियंत्रण में ले सकेगा। इसके साथ ही, विदेशी फंड की मदद से बनाई गई सभी चल-अचल संपत्तियों का अधिकार भी इसी नामित प्राधिकरण के पास चला जाएगा।

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देश भर में कई ईसाई संस्थाएं बड़े पैमाने पर सामाजिक और जनकल्याणकारी कार्यों का संचालन करती हैं। इनमें प्राथमिक और उच्च विद्यालय, अस्पताल, अनाथालय, वृद्धाश्रम और सामुदायिक केंद्र शामिल हैं। इन संस्थाओं के दैनिक संचालन और कल्याणकारी योजनाओं का एक बड़ा हिस्सा विदेशी अनुदान और चैरिटी पर निर्भर रहता है। संगठन के प्रतिनिधियों का मानना है कि यदि यह विधेयक बिना संशोधनों के पारित होता है, तो जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने वाली स्वास्थ्य और शिक्षा संबंधी सुविधाएं सीधे तौर पर बाधित हो सकती हैं।

धार्मिक संस्थाओं का विरोध और जेपीसी को भेजने की मांग

संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण के प्रावधान पर कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने भी गहरी चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि विधेयक के नियम सरकार को उन संपत्तियों पर भी स्थायी कब्जा करने, उन्हें दूसरी जगह ट्रांसफर करने या बेचने की शक्ति प्रदान करते हैं, जिन्हें दशकों से विदेशी और घरेलू दोनों तरह के चंदे से तैयार किया गया है। संस्था का मानना है कि इससे वर्षों की मेहनत से खड़ी की गई बुनियादी सुविधाओं पर संकट मंडराने लगा है।

इसी क्रम में केरल लैटिन कैथोलिक एसोसिएशन ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सरकार ने संबंधित पक्षों और हितधारकों से पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना ही कानून में इतने बड़े बदलाव प्रस्तावित कर दिए हैं। संगठन के अनुसार, प्रक्रियात्मक पारदर्शिता के बिना लाए गए इन संशोधनों से उन सभी सामाजिक और परोपकारी संस्थाओं में अनिश्चितता का माहौल पैदा हो गया है, जो लंबे समय से पूरी तरह कानूनी, पारदर्शी और शांतिपूर्ण तरीके से काम कर रही हैं।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ईसाई समुदाय के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात कर अपनी मांगें रखीं। प्रतिनिधियों ने गृह मंत्री से अपील की कि इस विधेयक को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए या फिर विस्तृत अध्ययन के लिए इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजा जाए। मुलाकात के दौरान गृह मंत्री ने प्रतिनिधिमंडल की चिंताओं को ध्यानपूर्वक सुना और आश्वासन दिया कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा तथा सरकार के अन्य वरिष्ठ मंत्रियों के साथ भी इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।

सरकार का रुख और पूजा स्थलों के संरक्षण का प्रावधान

विवाद के बीच गृह मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह विधेयक किसी विशेष धर्म, वर्ग या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं लाया गया है। सरकार के मुताबिक यह एक समान राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है, जिसका एकमात्र ध्येय विदेशी फंडिंग की कड़ी निगरानी करना और अवैध वित्तीय गतिविधियों को रोकना है। गृह मंत्रालय ने आश्वस्त किया है कि जो धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं सभी विधिक नियमों का ईमानदारी से पालन कर रही हैं, उन्हें घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है और वे अपना काम पूर्ववत जारी रख सकती हैं।

धार्मिक स्थलों के भविष्य को लेकर उठ रही आशंकाओं को दूर करने के लिए विधेयक में एक विशेष वैधानिक सुरक्षा चक्र भी शामिल किया गया है। कानून के मसौदे में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि नामित प्राधिकरण के अधीन आने वाली कोई संपत्ति पूजा स्थल के रूप में उपयोग की जा रही है, तो उस स्थान के धार्मिक स्वरूप और पवित्रता को बनाए रखना प्राधिकरण की कानूनी जिम्मेदारी होगी।

इसके अलावा विधेयक में नियमों के उल्लंघन पर मिलने वाली सजा के प्रावधानों में भी बदलाव का प्रस्ताव है। वर्तमान व्यवस्था में नियमों के उल्लंघन पर अधिकतम पांच साल की जेल का प्रावधान है, जिसे नए संशोधन विधेयक में घटाकर एक साल की जेल करने का प्रस्ताव रखा गया है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और देश में एफसीआरए के आंकड़े

भारत में प्रस्तावित इस कानून पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा शुरू हो गई है। अमेरिका के कुछ सांसदों ने बिल के प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने बयान जारी कर दावा किया कि यह कानून भारतीय सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन अपने हाथ में लेने का अधिकार देता है। उन्होंने इसे ईसाई संस्थानों के खिलाफ उठाया गया कदम बताते हुए कहा कि इससे भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में FCRA पंजीकरण की स्थिति को समझने के लिए आधिकारिक पोर्टल पर 15 जुलाई 2026 तक के आंकड़े उपलब्ध हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक, इस समय देश भर में 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र कार्य कर रहे हैं। वहीं, नियमों के उल्लंघन या अन्य कारणों से 22,498 प्रमाणपत्र रद्द किए जा चुके हैं, जबकि 15,212 प्रमाणपत्र समय पर नवीनीकरण न हो पाने की वजह से समाप्त हो चुके हैं।

सवाल-जवाब

FCRA संशोधन विधेयक 2026 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य भारत में गैर-सरकारी और धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी फंड के लेनदेन में राष्ट्रीय सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करना है।
ईसाई संगठन और चर्च निकाय इस विधेयक का विरोध क्यों कर रहे हैं?
उन्हें आशंका है कि रद्द या समाप्त लाइसेंस वाली संस्थाओं के प्रबंधन और संपत्तियों को संभालने के लिए नामित प्राधिकरण नियुक्त करने से विदेशी मदद पर चलने वाले स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
प्रस्तावित कानून में पूजा स्थलों की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान है?
विधेयक के मसौदे में एक विशेष प्रावधान है जिसके तहत यदि कोई अधिग्रहित संपत्ति पूजा स्थल के रूप में इस्तेमाल हो रही है, तो उसका धार्मिक स्वरूप और पवित्रता बनाए रखना नामित प्राधिकरण की कानूनी जिम्मेदारी होगी।
FCRA नियमों के उल्लंघन पर सजा में क्या बदलाव प्रस्तावित है?
नए संशोधन विधेयक में नियमों के उल्लंघन पर मिलने वाली अधिकतम जेल की सजा को पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव रखा गया है।
15 जुलाई 2026 तक भारत में FCRA प्रमाणपत्रों की क्या स्थिति है?
आधिकारिक पोर्टल के अनुसार देश में 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र हैं, 22,498 प्रमाणपत्र रद्द किए जा चुके हैं और 15,212 प्रमाणपत्र नवीनीकरण न होने से समाप्त हो चुके हैं।
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