केंद्र सरकार अगले सप्ताह लोकसभा में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पेश करने की तैयारी कर रही है। इस प्रस्तावित कानून के माध्यम से देश में गैर-सरकारी संगठनों, धार्मिक ट्रस्टों और शैक्षणिक संस्थानों को मिलने वाले विदेशी चंदे के नियमों को अधिक पारदर्शी और सख्त बनाने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, भारतीय संसद में इस विधेयक के पेश होने से पहले ही अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्य राइली मूर ने इस प्रस्तावित संशोधन पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि इससे नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच कूटनीतिक रिश्तों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े अमेरिकी सांसद राइली मूर ने मंगलवार को सार्वजनिक रूप से भारत के इस कदम का विरोध किया। वेस्ट वर्जीनिया से कांग्रेस सदस्य मूर, जो डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी से संबंध रखते हैं, ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी चिंताएं साझा कीं। उनका आरोप है कि यदि यह विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में पारित हो जाता है, तो इससे भारत सरकार को चर्चों और ईसाई धार्मिक चैरिटी संस्थाओं के प्रशासनिक प्रबंधन का सीधा नियंत्रण हासिल हो जाएगा। उन्होंने इस विधायी प्रस्ताव को धार्मिक स्वतंत्रता पर अतिक्रमण करार दिया है।
धार्मिक स्वतंत्रता और ऐतिहासिक संदर्भ पर अमेरिकी सांसद का रुख
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने भारत में ईसाई समुदाय के प्राचीन इतिहास का उल्लेख करते हुए अपने तर्कों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ईसा मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद संत थॉमस भारत के मालाबार तट पर पहुंचे थे, जिससे भारत में ईसाई परंपरा का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। मूर के अनुसार, इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय संसद ऐसे कानून पर विचार कर रही है, जो सरकार को धार्मिक संपत्तियों और चैरिटी निकायों के संचालन में हस्तक्षेप का अधिकार दे सकता है।
विधेयक के प्रावधानों को चुनौती देते हुए राइली मूर ने X पर लिखा, "यदि यह विधेयक इसी रूप में आगे बढ़ता है, तो यह भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों में बड़ी चिंता का विषय होगा।" उनका तर्क है कि विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले धार्मिक संगठनों पर सरकारी प्रबंधन थोपने से दोनों देशों के आपसी संबंधों में तनाव पैदा हो सकता है।
विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक 2026 के प्रमुख प्रावधान
भारत सरकार द्वारा तैयार किए गए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के अंतर्गत एक विशेष नामित प्राधिकरण (Designated Authority) के गठन का प्रस्ताव रखा गया है। यह प्राधिकरण उन परिस्थितियों में प्रभावी होगा, जब किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द कर दिया जाता है, संस्था स्वयं अपना पंजीकरण सरेंडर कर देती है या फिर उसके नवीनीकरण की समय-सीमा समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में, वह नामित प्राधिकरण उस संस्था के पास उपलब्ध विदेशी चंदे और उस धन से निर्मित अचल या चल संपत्तियों का संपूर्ण प्रबंधन अपने हाथ में ले लेगा।
इस विधेयक में धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को लेकर भी एक स्पष्ट धारा जोड़ी गई है। इसके अनुसार, यदि नामित प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित की जाने वाली संपत्तियों में कोई पूजा स्थल शामिल होता है, तो उसके मूल धार्मिक स्वरूप और पवित्रता को हर हाल में बनाए रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त, कानून का अनुपालन आसान बनाने और दंडात्मक प्रावधानों को व्यावहारिक बनाने के उद्देश्य से FCRA नियमों के उल्लंघन पर मिलने वाली अधिकतम जेल की सजा को 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष करने का प्रस्ताव दिया गया है।
विदेशी चंदे और FCRA पंजीकरण के आधिकारिक आंकड़े
गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों से भारत में विदेशी धन के आगमन के व्यापक पैमाने का पता चलता है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से वर्ष 2022 के बीच देश के 13,520 संगठनों को कुल मिलाकर 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ था। इतने बड़े पैमाने पर आने वाले विदेशी धन की निगरानी और जवाबदेही तय करने के लिए ही सरकार FCRA नियमों को लगातार अपडेट कर रही है।
इसके साथ ही, FCRA पोर्टल पर उपलब्ध 15 जुलाई 2026 तक के अद्यतन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि उस तिथि तक देश में 14,449 सक्रिय FCRA पंजीकरण मौजूद थे। वहीं, नियमों के उल्लंघन या अन्य कारणों से 22,498 संगठनों के पंजीकरण रद्द किए जा चुके थे, जबकि 15,212 पंजीकरणों की समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी।
संसद में पेशी और भावी कूटनीतिक असर
केंद्र सरकार द्वारा अगले सप्ताह इस संशोधन विधेयक को लोकसभा में चर्चा और मंजूरी के लिए पेश किए जाने की संभावना है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि विदेशी चंदे की आड़ में होने वाली अनियमितताओं को रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा वित्तीय पारदर्शिता को मजबूत करने के लिए यह कदम आवश्यक है। दूसरी ओर, अमेरिकी सांसद राइली मूर की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय चर्चाओं का एक संवेदनशील बिंदु बन सकता है।



















