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यौन उत्पीड़न और पॉक्सो के मामलों में जल्द न्याय के लिए 2031 तक चलेगी फास्ट ट्रैक कोर्ट योजनाभारत
5 नव॰ 2026, 10:53 am (1 दिन पहले)· 1

यौन उत्पीड़न और पॉक्सो के मामलों में जल्द न्याय के लिए 2031 तक चलेगी फास्ट ट्रैक कोर्ट योजना

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना को पांच साल का विस्तार देते हुए 31 मार्च 2031 तक जारी रखने की मंजूरी दी है, जिसके तहत कुल 850 अदालतों का संचालन किया जाएगा।

देश भर में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले गंभीर यौन अपराधों के मामलों में त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के मकसद से केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट से जुड़ी केंद्र प्रायोजित योजना की अवधि को अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ाने का फैसला किया गया। यह विस्तारित चरण 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होकर 31 मार्च 2031 तक जारी रहेगा। इस पूरी योजना पर कुल 3,788.04 करोड़ रुपये का वित्तीय खर्च अनुमानित है, जिसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 2,353.15 करोड़ रुपये रहेगी और शेष 1,434.89 करोड़ रुपये का वहन राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा किया जाएगा। केंद्र सरकार अपने हिस्से की पूरी धनराशि का प्रबंध निर्भया फंड से करेगी।

अदालतों का दायरा बढ़ाकर 850 तक ले जाने की तैयारी

इस योजना के अंतर्गत विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष पॉक्सो अदालतों सहित कुल 850 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट संचालित करने का खाका तैयार किया गया है। वर्तमान समय में देश भर के अंदर 779 ऐसी विशेष अदालतें काम कर रही हैं, जिनमें 399 विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं। लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब इन अदालतों की संख्या बढ़ाकर 850 की जा रही है, ताकि जिन जिलों में अभी यह सुविधा नहीं पहुंची है, वहां भी इसका विस्तार किया जा सके। यह फैलाव राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज अनसुलझे मुकदमों के आंकड़ों के आधार पर तय किया जाएगा।

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कार्यप्रणाली को मजबूत और असरदार बनाने के लिए हर अदालत के स्तर पर समर्पित मानव संसाधन की व्यवस्था तय की गई है। योजना के प्रावधानों के मुताबिक, पॉक्सो अधिनियम 2012 तथा दुष्कर्म के मामलों की बिना किसी रुकावट के सुनवाई पूरी करने के लिए प्रत्येक अदालत में एक समर्पित न्यायिक अधिकारी, एक विशेष लोक अभियोजक और 6 सहायक कर्मचारियों का स्टाफ तैनात किया जाएगा। हर अदालत के साथ विशेष लोक अभियोजक की तय जिम्मेदारी होने से मुकदमों की कानूनी प्रक्रिया तेज गति से आगे बढ़ सकेगी।

मुकदमों के निपटारे में तेजी और संवेदनशील माहौल का निर्माण

मंत्रिमंडल के इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों को समयबद्ध तरीके से कानूनी राहत पहुंचाना है। अदालतों का यह विशेष नेटवर्क तैयार होने से मुकदमों की लंबी फेहरिस्त में कमी आएगी और मामलों का निस्तारण निर्धारित समय सीमा में हो सकेगा। इसके साथ ही, कानूनी प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों को अतिरिक्त मानसिक दबाव से बचाने के लिए भी खास उपाय किए जा रहे हैं। योजना के तहत कमजोर गवाह बयान केंद्रों और बच्चों के अनुकूल अदालती परिसरों के निर्माण को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे बच्चे और महिलाएं बिना किसी भय अथवा मानसिक तनाव के अपने बयान दर्ज करा सकें।

कार्यान्वयन और सख्त निगरानी व्यवस्था

इस योजना का सीधा लाभ उन महिलाओं और बच्चों को मिलेगा जो यौन हिंसा और पॉक्सो कानून के अंतर्गत आने वाले अपराधों का सामना करते हैं। केंद्रीय न्याय विभाग इस पूरी परियोजना का संचालन सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों के साथ मिलकर करेगा। कामकाज में पारदर्शिता और गति बनाए रखने के लिए न्याय विभाग एक समर्पित डिजिटल डैशबोर्ड, आवधिक प्रगति रिपोर्टों और राज्यों द्वारा पेश किए जाने वाले खर्च के ब्योरे के जरिए नियमित निगरानी रखेगा। इसके साथ ही, व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए विभिन्न उच्च न्यायालयों और प्रांतीय सरकारों के साथ निरंतर विचार विमर्श भी किया जाएगा।

2019 में हुई थी इस विशेष अदालती ढांचे की शुरुआत

इस विशेष अदालती व्यवस्था की नींव 2 अक्टूबर 2019 को रखी गई थी। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2018 के लागू होने के उपरांत और उच्चतम न्यायालय द्वारा 25 जुलाई 2019 को दिए गए दिशा निर्देशों के तहत इस केंद्र प्रायोजित योजना को शुरू किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया था कि जिन जिलों में पॉक्सो कानून के तहत 100 से अधिक मामले लंबित हैं, वहां विशेष अदालतों की स्थापना अनिवार्य रूप से की जाए। शुरुआत में यह परियोजना मात्र 1 वर्ष के लिए लाई गई थी, जिसे बाद में आगे बढ़ाते हुए 31 मार्च 2026 तक जारी रखने की स्वीकृति दी गई थी। शुरुआत से लेकर अब तक इस व्यवस्था के जरिए कुल 4,02,457 मामलों का निस्तारण किया जा चुका है।

सवाल-जवाब

फास्ट ट्रैक कोर्ट योजना को कब तक के लिए बढ़ाया गया है?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस योजना को 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक यानी अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया है।
इस योजना पर कुल कितना बजट खर्च होगा?
इस परियोजना पर कुल 3,788.04 करोड़ रुपये खर्च होंगे, जिसमें 2,353.15 करोड़ केंद्र सरकार और 1,434.89 करोड़ राज्य सरकारें वहन करेंगी।
विस्तार के बाद अदालतों की कुल संख्या कितनी हो जाएगी?
वर्तमान में चल रही 779 अदालतों से बढ़ाकर इनकी कुल संख्या 850 की जाएगी, जिसमें विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं।
प्रत्येक फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में कौन सा स्टाफ तैनात होगा?
हर अदालत में एक समर्पित न्यायिक अधिकारी, एक विशेष लोक अभियोजक और छह सहायक कर्मचारी नियुक्त किए जाएंगे।
शुरुआत से अब तक इस योजना के तहत कितने मामलों का निपटारा हुआ है?
वर्ष 2019 में शुरुआत के बाद से इस व्यवस्था के तहत अब तक कुल 4,02,457 मुकदमों का निस्तारण किया जा चुका है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·15 घंटे पहले

अदालत में तारीख पर तारीख मिलते देखना वाकई बहुत दर्दनाक होता है, खासकर जब मानसिक तनाव से जूझ रहे बच्चों और महिलाओं को न्याय के लिए सालों इंतज़ार करना पड़े।

Arjun Mehta@arjun-mehta·15 घंटे पहले

अदालतें बढ़ाई जाना अच्छी बात है, लेकिन जब तक मुकदमों की सुनवाई तय समय पर पूरी नहीं होगी, तब तक न्याय मिलने में देरी का दर्द कम नहीं होगा।

Meera Joshi@meera-joshi·15 घंटे पहले

अर्जुन, आपकी बात बिल्कुल सही है। जब मैंने अपनी काउंसलिंग प्रैक्टिस में उन पीड़िताओं को देखा है जो सालों-साल तारीखों के चक्कर में घुटती रहती हैं, तो समझ आता है कि असल राहत सिर्फ़ अदालतें खुलने से नहीं, बल्कि बिना मानसिक तनाव के जल्दी फ़ैसला आने से ही मिलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

आठ सौ पचास अदालतें तो बना दी जाएंगी, पर देश भर के जिलों में जजों और वकीलों की यह पूरी फौज समय पर मिल पाएगी या नहीं, यह बड़ा सवाल है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

करण भाई, बात तो सही है, कोर्ट तो खुल जाएंगे पर जजों की नियुक्ति और स्टाफ का समय पर मिलना सबसे बड़ा पेंच साबित होगा।

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