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गन्ने से एथनॉल उत्पादन पर अरविंद केजरीवाल का हमला, बोले विदेशी मुद्रा बचाने के चक्कर में चीनी संकट खड़ा हुआनेता जी
20 अग॰ 2026, 11:26 am (1 दिन पहले)· 3

गन्ने से एथनॉल उत्पादन पर अरविंद केजरीवाल का हमला, बोले विदेशी मुद्रा बचाने के चक्कर में चीनी संकट खड़ा हुआ

एथनॉल ब्लेंडिंग नीति को लेकर अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि तेल आयात में विदेशी मुद्रा बचाने के प्रयास में गन्ने का इस्तेमाल बढ़ाया गया, जिससे देश में चीनी की कमी हो गई और अब उसी मुद्रा से चीनी आयात करने की स्थिति बन रही है।

भारत सरकार की एथनॉल मिश्रण नीति और उसके कृषि तथा आर्थिक प्रभाव को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बयान जारी कर सरकार के आर्थिक प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि कच्चे तेल के आयात बिल में कटौती करने और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के उद्देश्य से गन्ने का बड़े पैमाने पर एथनॉल उत्पादन में उपयोग किया गया। हालांकि, इस फैसले का सीधा असर देश में चीनी के उत्पादन और उसकी उपलब्धता पर पड़ा है, जिससे घरेलू बाजार में चीनी की किल्लत की स्थिति पैदा हो रही है।

एथनॉल नीति और चीनी संकट का गणित

अरविंद केजरीवाल का कहना है कि सरकार की नीतियों में अदूरदर्शिता के कारण एक समस्या को हल करने का प्रयास दूसरी बड़ी मुसीबत को जन्म दे रहा है। भारत अपने ईंधन आयात खर्च को कम करने के लिए E20 एथनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को तेजी से लागू कर रहा है। इसके तहत पेट्रोल में एथनॉल के मिश्रण का लक्ष्य रखा गया है ताकि देश का भारी-भरकम तेल आयात बिल कम हो सके। हालांकि, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए गन्ने के रस और सीरे का इस्तेमाल एथनॉल बनाने में बढ़ा दिया गया, जिसके कारण चीनी रिफाइनरियों के पास शक्कर बनाने के लिए पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

अरविंद केजरीवाल ने अपने पोस्ट में लिखा कि विदेशी मुद्रा बचाने के नाम पर गन्ने से एथनॉल बनाना शुरू किया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि चीनी की कमी हो गई। अब उसी विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल करके चीनी आयात करनी पड़ेगी। उन्होंने सरकार की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि फैसले लेने वालों को यह समझ ही नहीं है कि एक निर्णय का दूसरे क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

विदेश व्यापार, मुद्रा भंडार और आर्थिक दबाव

हाल के समय में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर ₹92 प्रति डॉलर के स्तर तक फिसल चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को देखते हुए आयात खर्च को नियंत्रित करना बेहद आवश्यक हो गया है। भारत हर साल विदेशी मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल, खाद्य तेल और सोने के आयात पर खर्च करता है। अकेले खाद्य तेलों के विदेशों से आयात पर भारत हर साल अरबों डॉलर चुकाता है। जब कच्चे तेल के आयात पर विदेशी मुद्रा बचाने के लिए गन्ने को एथनॉल में बदला जाता है और खाद्य तेल या चीनी जैसी आवश्यक खाद्य वस्तुओं की किल्लत होती है, तो देश को पुनः आयात का सहारा लेना पड़ता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूर्व में देशवासियों से तेल के उपयोग में संयम बरतने, पेट्रोल की खपत कम करने, बेवजह सोना न खरीदने और विदेश यात्राओं पर समझदारी से खर्च करने की अपील की थी ताकि देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षा प्रदान की जा सके। इसके अलावा भारत ने समुद्र मंथन योजना के तहत ₹84,084 करोड़ के मास्टर प्लान की तैयारी भी की है, ताकि भविष्य में तेल और गैस के लिए केवल खाड़ी देशों पर निर्भर न रहना पड़े। ऐसे में अगर एथनॉल निर्माण के कारण चीनी का आयात करना पड़ता है, तो इससे विदेशी मुद्रा की शुद्ध बचत का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।

ऊर्जा सुरक्षा बनाम खाद्य सुरक्षा का संतुलन

आर्थिक विशेषज्ञों और नीति विश्लेषकों का मानना है कि ईंधन सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए सबसे कठिन चुनौती होती है। एथनॉल ब्लेंडिंग से जहां एक ओर कार्बन उत्सर्जन कम होता है और तेल आयात बिल में राहत मिलती है, वहीं दूसरी ओर यदि कृषि संसाधनों का ध्यान केवल ईंधन निर्माण पर केंद्रित हो जाए, तो आम जनता के लिए खाद्य वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगते हैं। यदि एथनॉल नीति की वजह से बाजार में चीनी महंगी होती है या इसका आयात करना पड़ता है, तो विदेशी मुद्रा की जो बचत तेल के मोर्चे पर हुई थी, वह चीनी के आयात में बह जाएगी।

चीन के बारे में

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कृषि बाजार के संदर्भ में एशियाई महाद्वीप के पूर्व में स्थित देश चीन की भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। चीन विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, जिसकी लिखित भाषा प्रणाली और सांस्कृतिक इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। ऐतिहासिक रूप से प्राचीन चीन ने दुनिया को कागज, कम्पास, बारूद और मुद्रण जैसी चार महान खोजें दी हैं। वैश्विक जिंस बाजार और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में भी चीन के उत्पादन और खपत के आंकड़े वैश्विक कीमतों को प्रभावित करते हैं।

जनता की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर अरविंद केजरीवाल के इस बयान के बाद जनता की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई उपयोगकर्ताओं ने सरकार से नीतिगत फैसलों के आंकड़ों के साथ जवाबदेही तय करने की मांग की, जबकि कुछ लोगों ने एथनॉल कार्यक्रम को देश के ऊर्जा भविष्य के लिए आवश्यक बताते हुए खाद्य और ईंधन सुरक्षा के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने की सलाह दी।

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सवाल-जवाब

अरविंद केजरीवाल ने एथनॉल नीति पर क्या कहा?
अरविंद केजरीवाल का कहना है कि विदेशी मुद्रा बचाने के लिए गन्ने से एथनॉल बनाने से देश में चीनी की कमी हो गई है, जिससे अब चीनी आयात पर वही विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ेगी।
E20 एथनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम क्या है?
यह भारत सरकार की योजना है जिसमें कच्चे तेल के आयात को कम करने और प्रदूषण घटाने के लिए पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाया जाता है।
एथनॉल उत्पादन से चीनी आपूर्ति पर क्या असर पड़ता है?
जब गन्ने के रस और सीरे का बड़ा हिस्सा एथनॉल बनाने में इस्तेमाल होता है, तो शक्कर रिफाइनरियों के पास चीनी बनाने के लिए कच्चा माल कम रह जाता है।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार क्यों दबाव में है?
कच्चे तेल, खाद्य तेलों और सोने के भारी आयात तथा डॉलर के मुकाबले रुपये के ₹92 के स्तर तक फिसलने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना रहता है।
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