कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक तीखा पोस्ट साझा करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों पर बड़ा हमला बोला है। उनका कहना है कि मौजूदा शासन सच्चाई और सत्याग्रह दोनों से घबराता है। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब मध्य प्रदेश में केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासी समुदायों ने अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। प्रभावित लोग अपनी ज़मीनें छीने जाने के बाद न्यायपूर्ण मुआवजे और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग को लेकर जल सत्याग्रह और भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे।
केन-बेतवा परियोजना और आदिवासियों का संघर्ष
मध्य प्रदेश में लागू की जा रही केन-बेतवा परियोजना के कारण स्थानीय आदिवासी परिवारों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इस महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना के दायरे में आने वाले कई गांवों के लोगों की उपजाऊ और पुश्तैनी ज़मीनें अधिग्रहित की गई हैं। आदिवासियों का आरोप है कि ज़मीन ले लिए जाने के बाद उन्हें न तो नियमानुसार उचित मुआवजा मिला और न ही रहने के लिए कोई ठोस पुनर्वास योजना तैयार की गई। इसी उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ आदिवासी नागरिकों ने जल सत्याग्रह का रास्ता अपनाया और ठंडे पानी में खड़े होकर अपनी आवाज बुलंद की।
सच्चाई और सत्याग्रह से घबराने का आरोप
अपने सोशल मीडिया संदेश में राहुल गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सत्य यही है कि आदिवासी देश के पहले निवासी हैं और उनके अधिकारों की इस तरह अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि जब शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जमीन और जंगल के हक के लिए आवाज उठाई जाती है, तो सरकार की ओर से संवाद के बजाय पुलिस बल का इस्तेमाल किया जाता है। जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने के लिए प्रशासन द्वारा दमनकारी नीतियों का सहारा लिया जा रहा है, जिससे आम नागरिकों में भारी रोष व्याप्त है।
मध्य प्रदेश के बारे में
मध्य प्रदेश भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है जिसकी आधिकारिक राजधानी भोपाल है। यह राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाता है, जिसकी सीमाएं उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान से मिलती हैं। एक नवंबर 2000 को इस राज्य से सोलह जिले अलग करके छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना की गई थी, जिसके बाद से यह देश के बड़े राज्यों में शुमार है। यहाँ के विभिन्न क्षेत्रों में निवासरत आदिवासी समुदाय अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए पारंपरिक रूप से संघर्षरत रहे हैं।
जनता की प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले पर सोशल मीडिया यूजर्स और आम जनता की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं, जहां कई लोगों ने आदिवासियों के अधिकारों का समर्थन किया और सरकार से पारदर्शी मुआवजे की मांग उठाई। कुछ लोगों ने इस विरोध प्रदर्शन को लोकतांत्रिक हक बताते हुए प्रशासन से शांतिपूर्ण समाधान की अपील की है।


























