शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के बिश्केक शिखर सम्मेलन में जारी किए गए नए घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ एक बेहद सख्त और साझा रुख अपनाया गया है। सम्मेलन के दौरान चीन सहित सभी सदस्य देशों ने इस साझा घोषणापत्र पर अपनी सहमति जताई और अपने हस्ताक्षर किए। यह कदम आतंकवाद को लेकर भारत के पुराने और स्पष्ट रुख को वैश्विक मंच पर और अधिक मजबूती प्रदान करता है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में किसी भी प्रकार की ढिलाई या नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। विदेश मंत्रालय (एमईए) ने सम्मेलन की जानकारी देते हुए बताया कि संगठन में शामिल सभी राष्ट्रों ने आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से निपटने की अपनी पुरानी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया है। इस बिश्केक घोषणापत्र के जरिए सदस्य देशों ने हर तरह के आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की है और इस खतरे से निपटने में दोहरे रवैये (डबल स्टैंडर्ड) को पूरी तरह से अस्वीकार्य घोषित किया है।
आतंकवाद पर कड़ा रुख और बिश्केक घोषणापत्र के प्रमुख पहलू
घोषणापत्र में यह बात भी पूरी तरह स्पष्ट की गई है कि अपने स्वार्थी या राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आतंकवादी, अलगाववादी और चरमपंथी समूहों का इस्तेमाल करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगा। सभी सदस्य राष्ट्रों ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करने के साथ-साथ सीमा पार से होने वाली आतंकवादियों की आवाजाही को रोकने और सभी आतंकी संगठनों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका में सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया है। यह भाषा भारत की प्राथमिकताओं और नीतियों के बिल्कुल अनुकूल है। विदेश मंत्रालय ने शिखर सम्मेलन के 13 प्रमुख परिणामों का विशेष उल्लेख किया, जिनमें सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए यूनिवर्सल सेंटर की नियमावली को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। यह व्यवस्था आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ क्षेत्रीय सहयोग को और अधिक बढ़ाने में मददगार साबित होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट संदेश
बिश्केक में आयोजित इस उच्चस्तरीय बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में आतंकवाद पर बेहद कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद को मिलने वाले वित्तीय पोषण (टेरर फंडिंग), नए लड़ाकों की भर्ती, उग्रवाद फैलाने की गतिविधियों और आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों के पूरे तंत्र को जड़ से नष्ट करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे रवैये की कोई जगह नहीं हो सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो देश आतंकवाद को अपनी राज्य नीति के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें यह साफ और कड़ा संदेश दिया जाना चाहिए कि आतंकवाद कभी भी किसी की सामरिक संपत्ति (स्ट्रेटेजिक एसेट) नहीं हो सकता।
2025 के गतिरोध से लेकर 2026 के नए रुख की कहानी
मौजूदा स्थिति पिछले वर्ष 2025 की परिस्थितियों से काफी अलग नजर आती है। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद किंगदाओ में आयोजित एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत को घोषणापत्र में इस हमले का जिक्र कराने के लिए काफी कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। उस समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साझा दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया था, क्योंकि उसमें आतंकवाद या पहलगाम हमले का उल्लेख शामिल नहीं किया गया था। हालांकि, बाद में तियानजिन शिखर सम्मेलन के दौरान एससीओ ने पहलगाम हमले की आधिकारिक तौर पर निंदा की थी और दोषियों को कानून के कटघरे में लाकर न्याय दिलाने की बात कही थी।
पाकिस्तान पर बढ़ता कूटनीतिक दबाव
वर्ष 2026 में जब चीन सहित एससीओ के सभी सदस्य देश आतंकवाद के खिलाफ भारत के सुर में सुर मिला रहे हैं, तो इससे पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक संदेश बेहद स्पष्ट हो गया है। इस्लामाबाद लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद को अपनी आधिकारिक नीति का हिस्सा बनाकर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता आ रहा है, जबकि बलूचिस्तान में होने वाली घटनाओं के लिए वह भारत पर मनगढ़ंत आरोप लगाता है। एससीओ में बनी यह नई सर्वसम्मति पाकिस्तान की उस पुरानी रणनीति को पूरी तरह कमजोर करती है, जिसके जरिए वह चीन के सहारे आतंकवाद से जुड़े बयानों की भाषा को हल्का कराने की कोशिश करता था। चीन द्वारा आतंकवाद के खिलाफ इस मुहिम में शामिल होने से पाकिस्तान पर भारी कूटनीतिक दबाव बन गया है। यह बदलाव चेतावनी देता है कि आतंकवाद पर क्षेत्रीय सहमति मजबूत हो रही है और एससीओ की आगामी अध्यक्षता पाकिस्तान के पास आने के बावजूद यह सख्त घोषणापत्र उसे अपने आचरण और व्यवहार में बदलाव लाने के लिए मजबूर करेगा।



















