जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में वर्ष 2025 में हुए भीषण आतंकवादी हमले के जवाब में भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को पूरी तरह से स्थगित कर दिया है। इस फैसले के बाद पाकिस्तान बौखलाहट में नीदरलैंड स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (पीसीए) से लेकर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों के चक्कर काट रहा है। हालांकि, भारत सरकार ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि हेग की अदालत द्वारा दिया गया कोई भी आदेश या निर्णय भारत की संप्रभु नीतियों पर लागू नहीं होता और वह केवल कागज के टुकड़े से अधिक कुछ नहीं है। नई दिल्ली का सीधा और कड़ा संदेश है कि जब तक सीमा पार से जारी आतंकवाद पर पूरी तरह और स्थायी रूप से रोक नहीं लगाई जाती, तब तक जल संधि से जुड़े किसी भी दायित्व पर पुनर्विचार नहीं किया जाएगा। भारत के इस सख्त रुख ने पाकिस्तान के जल-कूटनीति के प्रयासों को गहरा झटका दिया है।
हेग की अदालत का आदेश और भारत द्वारा कानूनी बहिष्कार
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए भारत द्वारा आदेशों को मानने से इनकार करने पर औपचारिक विरोध जताया है। इस्लामाबाद का कहना है कि वर्ष 1960 में हस्ताक्षर की गई 60 साल पुरानी सिंधु जल संधि आज भी कानूनी रूप से पूरी तरह बाध्यकारी है। पाकिस्तान का तर्क है कि कोई भी देश अपनी इच्छा से एकतरफा तरीके से इस संधि के प्रावधानों में संशोधन नहीं कर सकता और न ही इसे बीच में रोक सकता है। हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय ने अपनी सुनवाई में कहा था कि 1960 की सिंधु जल संधि को लागू रखा जाना चाहिए, और पाकिस्तान इसी अदालती फैसले की प्रतियां लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष भारत के खिलाफ रोना रो रहा है।
दूसरी ओर, भारत ने इस पूरी अदालती कार्यवाही की वैधता को ही नकार दिया है। भारत का रुख पाकिस्तान से बिल्कुल अलग और स्पष्ट है। नई दिल्ली ने इस मामले में नीदरलैंड के हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय की कार्यवाहियों में हिस्सा ही नहीं लिया और इसे मूल रूप से गलत तथा कानूनी तौर पर अमान्य करार दिया है। भारत सरकार का तर्क है कि जिस आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है, वह 1960 की मूल संधि में तय की गई विवाद निपटारा व्यवस्था के सीधे खिलाफ है। जब ट्रिब्यूनल का गठन ही संधि के नियमों का उल्लंघन करके हुआ है, तो उसके द्वारा पारित किसी भी आदेश, फैसले या अंतरिम निर्देश को स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। भारत ने साफ कह दिया है कि ऐसे अमान्य मंचों का फैसला उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा नीतियों को प्रभावित नहीं कर सकता।
पहलगाम का भीषण आतंकी हमला और भारत का कड़ा फैसला
सिंधु जल संधि को रोकने का भारत का निर्णय किसी सामान्य कूटनीतिक विवाद का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे पाकिस्तान द्वारा पोषित सीमा पार आतंकवाद की गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पहलगाम में एक नृशंस और भीषण आतंकी हमला हुआ था। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने 26 निर्दोष नागरिकों की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी थी, जिनमें अधिकांश असहाय पर्यटक थे जो कश्मीर की खूबसूरत वादियों का आनंद लेने आए थे। इस दर्दनाक और कायराना आतंकी वारदात ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
इस जघन्य घटना के तुरंत बाद भारत सरकार ने कड़ा रणनीतिक कदम उठाते हुए सिंधु जल संधि के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगा दी। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह सिद्धांत मजबूती से रखा है कि निर्दोष नागरिकों की हत्या और द्विपक्षीय संधियाँ एक साथ नहीं चल सकतीं। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद और बातचीत दो परस्पर विरोधी बातें हैं। जब तक पाकिस्तान अपनी सीमा से संचालित होने वाले आतंकी तंत्र को पूरी तरह ध्वस्त नहीं करता और आतंकवाद पर सत्यापन योग्य तथा स्थायी रोक नहीं लगाता, तब तक सिंधु जल संधि को स्थगित ही रखा जाएगा।
1960 की सिंधु जल संधि का ढांचा और जल बंटवारे के नियम
सिंधु जल संधि का इतिहास छह दशक पुराना है। वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल का वैज्ञानिक और न्यायसंगत बंटवारा करना था। संधि के प्रावधानों के अनुसार, पूर्वी नदियों का पूरा अधिकार भारत को सौंपा गया। इन पूर्वी नदियों में रावी, ब्यास और सतलुज शामिल हैं, जिनके पानी के उपयोग, भंडारण और मोड़ पर भारत का एकाधिकार है।
इसके विपरीत, पश्चिमी नदियों का अधिकांश जल पाकिस्तान के हिस्से में दिया गया था। इन पश्चिमी नदियों में सिंधु, झेलम और चिनाब शामिल हैं। हालांकि, संधि के तहत भारत को इन पश्चिमी नदियों के पानी का भी सीमित उपयोग करने का अधिकार दिया गया है। भारत को इन नदियों पर बिना पानी रोके जलविद्युत परियोजनाएं (रन-ऑफ-द-रिवर प्रोजेक्ट्स) बनाने, कृषि के लिए सीमित जल प्रयोग करने और घरेलू जरूरतों को पूरा करने की अनुमति दी गई है। लेकिन पाकिस्तान वर्षों से भारत की वैध जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में अड़ंगे लगाता रहा है और समझौते में तय तंत्र का पालन करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की शरण में जाता रहा है। इसी कारण भारत ने अब स्पष्ट कर दिया है कि वह पाकिस्तान की इस दोहरी नीति को और सहन नहीं करेगा।
वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान की छटपटाहट और चीन की खामोशी
भारत द्वारा जल संधि रोके जाने के बाद पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र के लिए गहरा संकट नजर आ रहा है। पाकिस्तान की मुख्य चिंता यह है कि भारत के फैसलों से उसकी नदियों में बहने वाले पानी की मात्रा प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि इस्लामाबाद विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों और तीसरे पक्षों के जरिए भारत पर दबाव बनाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है ताकि भारत फिर से वार्ता की मेज पर लौट आए। पाकिस्तान ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) जैसी महत्वपूर्ण बैठकों में भी इस मामले को उठाने की कोशिश की।
हालांकि, कूटनीतिक मोर्चे पर भी पाकिस्तान को केवल निराशा ही हाथ लगी है। भारत का स्टैंड बेहद स्पष्ट है कि पाकिस्तान के साथ सभी मुद्दे विशुद्ध रूप से द्विपक्षीय हैं और इसमें किसी तीसरे देश, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ या संस्था के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। पाकिस्तान ने बार-बार यह जताने की कोशिश की कि चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी पर भारत और चीन के सुधरते संबंधों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। लेकिन हकीकत इसके उलट देखने को मिली। बिश्केक में आयोजित एससीओ बैठक के दौरान जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु के पानी को लेकर रोना रोया, तो चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और पूरी तरह खामोश रहे। यह घटना दर्शाती है कि सीमा पार आतंकवाद पर भारत के कड़े रुख का मुकाबला करने में पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुका है।



















