पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पिछले दो महीने से अधिक समय से स्थानीय नागरिक पाकिस्तानी सरकार और वहां की सेना के दमनकारी रवैये के खिलाफ लगातार सड़कों पर उतरे हुए हैं। इस क्षेत्र में बदहाल प्रशासनिक व्यवस्था, चरम पर पहुंची महंगाई और बुनियादी अधिकारों की मांग को लेकर भारी असंतोष खुलकर सामने आ चुका है, जिससे सत्ता प्रतिष्ठान की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इसी सुलगते माहौल के बीच लश्कर-ए-तैयबा के डिप्टी कमांडर सैफुल्लाह कसूरी का एक भड़काऊ वीडियो सामने आया है, जिसमें वह एक बार फिर भारत के खिलाफ बेहद आक्रामक और जहर उगलने वाले दावे करता हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ जहां पीओके की आम जनता पाकिस्तान से अपने हकों और स्वतंत्रता की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ आतंकी संगठन पुराने और खोखले जिहादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं।
गजवा-ए-हिंद और भड़काऊ बयानबाजी
सामने आई इस वीडियो क्लिप में सैफुल्लाह कसूरी कश्मीर को कथित तौर पर गजवा-ए-हिंद से जोड़ता हुआ भारत के खिलाफ सैन्य हमलों और जीत के सपने देखता नजर आता है। उसका यह दावा है कि कश्मीर की जीत ही गजवा-ए-हिंद का मार्ग प्रशस्त करेगी और यह घटनाक्रम चाहे कयामत के दिन ही क्यों न हो, एक दिन जरूर पूरा होगा। इस तरह के बयानों को भारतीय उपमहाद्वीप में अस्थिरता फैलाने वाले आतंकी संगठनों के पुराने और कट्टरपंथी प्रचार तंत्र का एक और हिस्सा माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि यह वीडियो ऐसे संवेदनशील वक्त पर सामने आया है जब पीओके के भीतर पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश छाया हुआ है।
आतंकी प्रोपेगेंडा और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
वीडियो में सैफुल्लाह कसूरी पारंपरिक पाकिस्तानी समर्थन वाले आतंकी नैरेटिव को ही दोहराता हुआ दिखाई देता है। वह खुलेआम पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई और भारत के विरुद्ध सैन्य आक्रमण के जरिए क्षेत्र पर कब्जा जमाने जैसी बातें करता है। उसके बयानों में किसी भी तरह के शांतिपूर्ण या राजनीतिक समाधान का दूर-दूर तक कोई जिक्र नहीं होता, बल्कि वह पूरी तरह से हिंसक संघर्ष और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने का काम करता रहा है। भारत सरकार ऐसे तत्वों और पाकिस्तान की सरपरस्ती में पलने वाले आतंकी संगठनों की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार सवाल उठाती रही है। इस बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर OsintTV ( OsintTV के इस पोस्ट ) द्वारा इस पूरे घटनाक्रम और कसूरी के बयानों को साझा करते हुए यह उजागर किया गया कि कैसे स्थानीय जनता की बगावत से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के कट्टरपंथी बयानों का सहारा लिया जा रहा है।
पाकिस्तानी सैन्य तंत्र और हाफिज सईद से संबंध
सैफुल्लाह कसूरी को कुख्यात आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद का बेहद करीबी माना जाता है और इसके साथ ही उसे पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान का भी करीबी समझा जाता है। वह अतीत में खुद यह बात स्वीकार कर चुका है कि उसे किस तरह पाकिस्तानी सेना के विशेष कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता रहा है। उसके इन संदिग्ध संबंधों को लेकर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती रही है, क्योंकि लश्कर-ए-तैयबा भारत की धरती पर कई भीषण आतंकी हमलों के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार रहा है। जम्मू-कश्मीर में शांति को बाधित करने वाली विभिन्न आतंकी वारदातों में भी उसका नाम बार-बार सामने आता रहा है।
पहलगाम हमला और ऑपरेशन सिंदूर का असर
सैफुल्लाह कसूरी का नाम तब भी प्रमुखता से चर्चा में आया था जब दक्षिण कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था। उस 22 अप्रैल के हमले में कुल 26 बेकसूर नागरिकों की जान चली गई थी, जिसके बाद भारतीय सुरक्षा बलों ने कड़ा रुख अपनाते हुए 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत की थी। इस निर्णायक कार्रवाई के तहत भारत ने पाकिस्तान और पीओके की सीमा के भीतर बने आतंकी लॉन्च पैड और ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया था। भारतीय सशस्त्र बलों के इस सुनियोजित अभियान में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े तमाम प्रमुख अड्डों को भारी क्षति पहुंचाई गई थी।
आतंकी ढांचे को हुआ था बड़ा नुकसान
ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद खुद सैफुल्लाह कसूरी ने कथित तौर पर इस बात को स्वीकार किया था कि भारतीय सैन्य कार्रवाई की वजह से पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले क्षेत्रों में मौजूद आतंकी ढांचे को अपूरणीय क्षति पहुंची है। उसके अपने बयानों के मुताबिक इस कार्रवाई में संगठन के कई शीर्ष और अहम सदस्य मारे गए थे। यह बयान सामरिक रूप से बेहद अहम माना गया था क्योंकि इससे यह साफ संकेत मिला था कि भारतीय हमलों ने आतंकी संगठनों के भीतर भारी तबाही मचाई है। इन सबके बावजूद कश्मीर और गजवा-ए-हिंद जैसे मुद्दों पर उसका यह नया बयान साबित करता है कि उनका कट्टरपंथी प्रोपेगेंडा अभी भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
राजनीतिक चेहरे के आवरण में छिपा आतंकी नेटवर्क
वर्ष 2017 में सैफुल्लाह कसूरी को मिल्लत मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रूप में दुनिया के सामने पेश किया गया था। इस संगठन को हाफिज सईद और लश्कर-ए-तैयबा के भूमिगत राजनीतिक मोर्चे के तौर पर देखा जाता रहा है। इस तरह के राजनीतिक छदम मंचों के माध्यम से प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से जुड़े लोग मुख्यधारा की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में घुसपैठ करने की कोशिश करते हैं। कसूरी का यह ताजा वीडियो एक बार फिर इसी पुरानी बहस को जिंदा करता है कि पाकिस्तान की व्यवस्था में किस प्रकार आतंकी सोच और राजनीतिक गतिविधियों के बीच की बारीक रेखा पूरी तरह मिट चुकी है।
पीओके का जनआक्रोश बनाम पुराना जिहादी एजेंडा
इस पूरी स्थिति का सबसे विरोधाभासी पहलू यह है कि जिस वक्त पीओके की सड़कों पर आम अवाम पाकिस्तान के कुशासन के खिलाफ उबाल पर है, ठीक उसी समय लश्कर का यह शीर्ष चेहरा भारत के खिलाफ वही पुराना और पिटा हुआ हिंसक नैरेटिव परोस रहा है। पीओके के निवासियों की बुनियादी समस्याएं और कसूरी की खोखली धमकियां बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करती हैं। एक तरफ जहां स्थानीय लोग अपनी प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारों की बहाली के लिए सवाल खड़े कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आतंकवादी संगठन आज भी उसी पुराने धार्मिक उन्माद के चश्मे से कश्मीर को देखने पर आमादा हैं। यही विरोधाभास पाकिस्तान के कब्जे वाले इस क्षेत्र की जटिल और विस्फोटक वास्तविकता को उजागर करता है।



















