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ऑपरेशन सिंदूर के बाद सिंधु जल समझौता रद्द करने की चर्चा, जानें भारत और पाकिस्तान पर इसका क्या पड़ेगा असरपाकिस्तान
15 अग॰ 2026, 4:04 pm (28 दिन पहले)· 4

ऑपरेशन सिंदूर के बाद सिंधु जल समझौता रद्द करने की चर्चा, जानें भारत और पाकिस्तान पर इसका क्या पड़ेगा असर

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत द्वारा सिंधु जल समझौता रद्द किए जाने की चर्चाओं के बीच जानिए इसका दोनों देशों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। पाकिस्तान में जहां कृषि और ऊर्जा तंत्र ठप होने का खतरा है, वहीं बुनियादी ढांचे की कमी के कारण जम्मू-कश्मीर को भी तात्कालिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की तरफ से सिंधु जल समझौते को रद्द करने या इसे न मानने के संकेत मिलने के बाद क्षेत्रीय जल राजनीति और रणनीतिक विमर्श गरमा गया है। दशकों से कायम यह द्विपक्षीय समझौता पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के लिए एक मुख्य आधार स्तंभ की तरह काम करता आया है। अगर भारत इस करार को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो पाकिस्तान में गंभीर कृषि और ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है। हालांकि, पर्याप्त भंडारण क्षमता और बुनियादी ढांचे की तात्कालिक कमी के कारण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों को भी अल्पकालिक चुनौतियों और प्राकृतिक जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।

1960 का ऐतिहासिक समझौता और छह नदियों का बंटवारा

भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी के न्यायसंगत बंटवारे को लेकर 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु जल समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थता में तैयार हुए इस ऐतिहासिक तंत्र पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अय्यूब खान ने दस्तखत किए थे। इस व्यापक समझौते के तहत दोनों देशों के बीच बहने वाली छह प्रमुख नदियों को दो स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित किया गया था।

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समझौते की शर्तों के अनुसार, पूर्वी नदियों यानी रावी, ब्यास और सतलुज के पूर्ण नियंत्रण और 100 प्रतिशत जल उपयोग का अधिकार भारत को सौंपा गया था। दूसरी ओर, पश्चिमी नदियों यानी सिंधु, झेलम और चिनाब का लगभग 80 प्रतिशत पानी इस्तेमाल करने का अधिकार पाकिस्तान को आवंटित किया गया। भारत को इन पश्चिमी नदियों पर केवल सीमित सिंचाई सुविधाएं विकसित करने और जल प्रवाह को बिना रोके यानी 'रन-ऑफ-द-रिवर' तकनीक पर आधारित हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स बनाने की ही अनुमति दी गई थी।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए तात्कालिक चुनौतियां

राजनीतिक विशेषज्ञ रशीद राहिल ने समझौते के रद्द होने की स्थिति में उत्पन्न होने वाले जमीनी खतरों पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि समझौते के अचानक खत्म होने का सबसे पहला और सीधा असर जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख के इलाकों पर महसूस किया जाएगा। अगर नदियों का पानी तत्काल प्रभाव से रोकने का प्रयास किया जाता है, तो घाटी में भीषण बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। इसके साथ ही दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच कूटनीतिक और सैन्य तनाव भी काफी गहरा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में परिस्थितियों के अनुकूल होने पर समझौते को फिर से बहाल करने की संभावनाएं भी बनी रह सकती हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ साझा करते हुए रशीद राहिल का कहना था कि 1947 में विभाजन के समय प्राकृतिक संसाधन दोनों तरफ बंटे हुए थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण जल संसाधन था, जो भारत के पर्वतीय क्षेत्रों से निकलकर पाकिस्तान के मैदानी भागों से होता हुआ समंदर तक पहुंचता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पानी एक कुदरती देन है, जिस पर प्राथमिक अधिकार उन निवासियों का होता है जिनके लिए यह जीवन और जीविका का मूल आधार है, जिसके बाद अन्य पक्ष का अधिकार आता है।

सतही तौर पर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि करार खत्म होने से नदियों का सारा पानी भारत के पास ही बना रहेगा, परंतु आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण स्थानीय स्तर पर तात्कालिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी विशाल नदियों पर पानी को बड़ी मात्रा में रोकने और स्टोर करने के लिए जरूरी बड़े बांधों तथा जलाशयों का निर्माण कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है। जल भंडारण क्षमता के अभाव में पानी का प्रवाह अचानक रोकने पर अतिरिक्त जलस्तर कश्मीर घाटी और जम्मू के मैदानी क्षेत्रों में तबाही मचाने वाली बाढ़ का रूप ले सकता है। इसके अतिरिक्त, नदियों की धारा मोड़ने या विशाल जलाशयों का निर्माण करने के लिए अरबों डॉलर के भारी-भरकम बजट और कई दशकों के लंबे समय की आवश्यकता होगी। पुख्ता योजना के बिना प्राकृतिक जल प्रवाह में हस्तक्षेप करने से स्थानीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि चक्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

पाकिस्तान पर आर्थिक, कृषि और ऊर्जा संकट का खतरा

पाकिस्तान के दृष्टिकोण से सिंधु जल समझौते का समाप्त होना एक अभूतपूर्व राष्ट्रीय और सामाजिक संकट को जन्म दे सकता है। पाकिस्तान का लगभग 80 प्रतिशत कृषि क्षेत्र और 90 प्रतिशत से अधिक खाद्य उत्पादन पूरी तरह से सिंधु नदी बेसिन के जल प्रवाह पर निर्भर है। यदि भारत नदियों का पानी नियंत्रित करता है या प्रवाह को रोकता है, तो पाकिस्तान के सबसे उपजाऊ प्रांत पंजाब और सिंध गंभीर जल किल्लत के कारण पूरी तरह बंजर जमीन में तब्दील हो सकते हैं।

वर्तमान समय में पाकिस्तान पहले से ही गंभीर जल संकट और आर्थिक दबाव से गुजर रहा है। ऐसे में जल आपूर्ति बाधित होने से वहां पीने के पानी की भीषण कमी हो जाएगी, जिससे व्यापक भुखमरी और मानवीय संकट पैदा हो सकता है। इसके अलावा, पाकिस्तान अपनी जलविद्युत क्षमता का एक बड़ा हिस्सा झेलम और चिनाब नदियों के जल से तैयार करता है। जल प्रवाह रुकने या कम होने से पाकिस्तान का राष्ट्रीय पावर ग्रिड पूरी तरह ठप हो सकता है, जिससे वहां की औद्योगिक और घरेलू बिजली व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।

दीर्घकालिक बुनियादी ढांचा और जलविद्युत क्षमता

यद्यपि तात्कालिक रूप से बुनियादी ढांचे की सीमाएं चुनौतियां खड़ी करती हैं, लेकिन यदि भारत भविष्य में मजबूत इंजीनियरिंग तंत्र और विशाल जलाशय तैयार कर लेता है, तो जम्मू-कश्मीर को इसके दूरगामी लाभ मिल सकते हैं। पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित होने के पश्चात जम्मू-कश्मीर को 4,000 मेगावाट से अधिक अतिरिक्त जलविद्युत उत्पन्न करने की क्षमता हासिल होगी। इसके साथ ही, क्षेत्र में बारहमासी सिंचाई व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकेगी, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादन और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को स्थायी मजबूती मिलेगी।

सवाल-जवाब

सिंधु जल समझौता कब और किसके बीच हुआ था?
यह समझौता 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था।
समझौते के तहत नदियों का बंटवारा किस तरह किया गया था?
पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) का 100% नियंत्रण भारत को मिला, जबकि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) के लगभग 80% पानी के इस्तेमाल का अधिकार पाकिस्तान को दिया गया।
समझौता रद्द होने पर जम्मू-कश्मीर को तात्कालिक क्या नुकसान हो सकता है?
पानी रोकने के लिए पर्याप्त बड़े बांध न होने के कारण कश्मीर घाटी और जम्मू के निचले इलाकों में तात्कालिक रूप से विनाशकारी बाढ़ आने का खतरा रहेगा।
सिंधु जल समझौता टूटने से पाकिस्तान पर क्या असर पड़ेगा?
पाकिस्तान की 80% कृषि और 90% खाद्य उत्पादन प्रभावित होगा, पंजाब और सिंध प्रांत बंजर हो सकते हैं और वहां बिजली तथा पीने के पानी का भारी संकट खड़ा हो सकता है।
भविष्य में बुनियादी ढांचा बनने पर जम्मू-कश्मीर को क्या लाभ होगा?
यदि बांध और जलाशय तैयार हो जाते हैं, तो जम्मू-कश्मीर को 4,000 मेगावाट से अधिक अतिरिक्त जलविद्युत और स्थायी सिंचाई की सुविधा प्राप्त होगी।
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