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PoK में बगावत के बीच मुनीर का नया दांव: 'शर्तें मानो या धारा 56 झेलो' — समझिए कैसे यह भारत के आर्टिकल 370 की उल्टी नकल हैपाकिस्तान
13 जून 2026, 4:42 am (46 दिन पहले)· 0

PoK में बगावत के बीच मुनीर का नया दांव: 'शर्तें मानो या धारा 56 झेलो' — समझिए कैसे यह भारत के आर्टिकल 370 की उल्टी नकल है

बिजली रेट और आटा सब्सिडी पर भड़के PoK के आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तान ने धारा 56 का हथियार निकाला है। फील्ड मार्शल Asim Munir ने आंदोलनकारियों को घुटने टेकने या मुजफ्फराबाद सरकार के खात्मे का अल्टीमेटम दिया है।

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जो असंतोष महीनों से सुलग रहा था, वह अब खुली बगावत बन चुका है। बिजली की दरें और आटे पर मिलने वाली सब्सिडी जैसे रोज़मर्रा के सवालों पर शुरू हुआ आंदोलन इतना गहरा गया है कि लोग सड़कों पर जान तक गंवा रहे हैं। जब इन प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी फौज ने गोलियां चलाईं, तो दुनिया भर में Shehbaz और Asim Munir की कड़ी आलोचना हुई। खुली सख्ती उल्टी पड़ती देख फील्ड मार्शल ने अब रास्ता बदला है और एक पुराने कानूनी हथियार — 'आर्टिकल 56' — को सामने ले आए हैं।

आंदोलन की जड़ में महंगाई और छिनती सब्सिडी

आसमान छूती बिजली कीमतों, बढ़ती महंगाई और आटे पर सब्सिडी खत्म होने के विरोध में 'ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) ने कई महीने पहले मोर्चा खोला था। यह आंदोलन धीरे-धीरे विकराल रूप ले चुका है। गोलीबारी और हत्याओं से भी जब बात नहीं बनी, तो पाकिस्तान के 'फील्ड मार्शल' ने प्रदर्शनकारियों के सामने आखिरी शर्त रख दी — या तो इस्लामाबाद की शर्तों पर झुक जाओ, या फिर 'आर्टिकल 56' का डंडा झेलने के लिए तैयार रहो। यही वह प्रावधान है जो PoK की बची-खुची स्वायत्तता को भी हमेशा के लिए दफ्न कर सकता है।

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क्या है 'आर्टिकल 56' का असली खेल

जिस इलाके को पाकिस्तान दुनिया के सामने 'आजाद कश्मीर' कहकर पेश करता है, उसी के अंतरिम संविधान — AJK Interim Constitution Act, 1974 — का आर्टिकल 56 इस्लामाबाद को बेलगाम अधिकार सौंपता है। इस प्रावधान के तहत पाकिस्तान की संघीय सरकार जब चाहे यहां मनमानी कर सकती है, और उसे कानूनी आड़ भी पूरी मिलती है।

  • वहां की जनता द्वारा चुनी गई मुजफ्फराबाद सरकार को यह कानून पल भर में बर्खास्त कर सकता है।
  • पूरी विधानसभा को एक ही झटके में भंग कर ताला लगाया जा सकता है।
  • सबसे डराने वाली बात यह है कि इस कार्रवाई के लिए यह तक नहीं देखा जाता कि मुजफ्फराबाद सरकार के पास बहुमत है या नहीं — इस्लामाबाद को इससे रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता।

नतीजा यह कि PoK की पूरी कार्यकारी ताकत सीधे इस्लामाबाद में बैठी 'आजाद कश्मीर काउंसिल' और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के हाथों में सिमट जाती है।

भारत के आर्टिकल 370 से उल्टी कहानी

पाकिस्तान की यह धारा 56 दरअसल भारत के उसी आर्टिकल 370 का एक टेढ़ा रूप है, जिसे भारत सरकार ने 2019 में हटा दिया था। भारत ने महाराजा हरि सिंह के साथ विलय समझौते के समय की परिस्थितियों को देखते हुए 370 के ज़रिए कश्मीर को 'विशेष दर्जा' और सुरक्षा की गारंटी दी थी। बाद में जब यह प्रावधान विकास की राह का रोड़ा लगने लगा, तो उसे हटा दिया गया। इसका मकसद साफ था — घाटी से आतंकवाद, अलगाववाद और पथराव को खत्म करना, कश्मीरी जनता को बाकी राज्यों जैसे पूरे अधिकार देना और निवेश व रोज़गार के नए रास्ते खोलकर उसे मुख्यधारा से जोड़ना।

फर्क यहीं साफ हो जाता है। भारत ने 370 हटाकर जनता को हक दिए, जबकि पाकिस्तानी सेना उसी हटाई जा चुकी धारा के उलट संस्करण को हथियार बनाकर अपने हक के लिए सड़क पर उतरी अवाम की आवाज़ को हमेशा के लिए दबाना चाहती है। Munir धारा 56 का इस्तेमाल किसी विकास के लिए नहीं, बल्कि कश्मीरी जनता की बची-खुची आज़ादी और लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए करना चाहते हैं।

बंद कमरों में तैयार तीन प्रस्ताव

बगावत की आग बुझाने और JAAC के आंदोलनकारियों का हौसला तोड़ने के लिए पाकिस्तान सरकार ने बातचीत के नाम पर बंद कमरों में तीन प्रस्ताव गढ़े हैं। इनमें बातचीत का दिखावा भी है और बर्बादी की धमकी भी।

पहला प्रस्ताव: पाकिस्तान की सभी राजनीतिक पार्टियों का एक हाई-पावर डेलीगेशन मुजफ्फराबाद भेजा जाएगा। यह डेलीगेशन वहां के स्थानीय नेताओं और JAAC के उन सदस्यों से बात करने का नाटक करेगा, जिन पर सरकार ने रोक नहीं लगाई है — मकसद आंदोलन में फूट डालना है।

दूसरा प्रस्ताव: आगामी 27 जुलाई को होने वाले आम चुनाव अपने तय समय पर हों, और इसके बाद नई विधानसभा के ज़रिए विवादित '12 शरणार्थी सीटों' को घटाकर आधा यानी 06 कर दिया जाए। ये सीटें 1947 के शरणार्थियों के नाम पर पंजाब, सिंध जैसे पाकिस्तान के मुख्य प्रांतों में रहने वालों के लिए रिजर्व हैं। इस्लामाबाद इन्हीं सीटों के सहारे अपनी पसंद की कठपुतली सरकार बनाता आया है, जबकि स्थानीय कश्मीरी इन्हें पूरी तरह खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

तीसरा प्रस्ताव: अगर JAAC या वहां का कोई भी राजनीतिक दल इन शर्तों को मानने से साफ इनकार करता है, तो बिना देर किए आर्टिकल 56 थोप दिया जाएगा। इसके बाद मुजफ्फराबाद की सत्ता की चाबी सीधे इस्लामाबाद के हाथ में चली जाएगी और वहां फौजी बूटों का राज होगा।

दुनिया के सामने खुलता पाकिस्तान का पाखंड

इस पूरे विवाद ने पाकिस्तान के उस झूठ को भी बेनकाब कर दिया है, जिसे वह बरसों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेचता आया है। सच्चाई यह है कि पाकिस्तान का अपना 1973 का संविधान भी PoK को न तो देश का औपचारिक हिस्सा मानता है और न ही पांचवां प्रांत। उसके संविधान के आर्टिकल 1 का क्लॉज (2)(d) इसे 'अन्य माध्यमों से शामिल होने वाला क्षेत्र' बताता है, और आर्टिकल 257 कहता है कि कश्मीर के लोग जब पाकिस्तान के साथ जुड़ने का फैसला करेंगे, तभी दोनों के संबंध तय होंगे।

लेकिन इस कागज़ी आज़ादी के पीछे की असलियत अलग है। PoK पूरी तरह पाकिस्तानी सेना के शिकंजे में है:

  • रक्षा और सुरक्षा: यहां पूरा नियंत्रण पाकिस्तानी सेना के हाथ में है।
  • विदेश मामले: दुनिया में PoK का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
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