राजस्थान के जालोर जिले की बंजर और कम पानी वाली जमीन पर अब एक नई कृषि क्रांति आकार ले रही है। पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले स्थानीय किसान अब किनोवा जैसी पौष्टिक फसल को अपनाकर खेती का दायरा बदल रहे हैं। कभी सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंडियों में पहचानी जाने वाली यह फसल अब जालोर के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर उगाई जा रही है। कम सिंचाई में बेहतर पैदावार देने वाली इस फसल ने जिले के कृषि परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
प्रसंस्करण और वैल्यू एडिशन से मिला बड़ा बाजार
जालोर के खेतों से कटाई के बाद किनोवा को सीधे मंडियों में नहीं बेचा जाता, बल्कि इसे व्यवस्थित तरीके से प्रसंस्कृत किया जाता है। खेतों से लाई गई उपज को आधुनिक प्रोसेसिंग इकाइयों में पहुंचाया जाता है, जहां सफाई, धुलाई, सुखाने और ग्रेडिंग के कई कड़े चरणों से गुजरने के बाद इसे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद के रूप में पैक किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के चलते उत्पाद की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ती है और यह देश के प्रमुख महानगरों के साथ-साथ विदेशों के लिए भेजा जाता है।
पोषण से भरपूर आहार के रूप में वैश्विक मांग
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किनोवा को एक अत्यंत पौष्टिक अनाज के तौर पर मान्यता मिली हुई है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, क्योंकि इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन और फाइबर के साथ-साथ आयरन एवं मैग्नीशियम जैसे आवश्यक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। खानपान में विविधता पसंद करने वाले लोग इसे सलाद, खिचड़ी, पुलाव और अन्य कई तरह के सेहतमंद व्यंजनों में प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे इसके उपभोक्ता आधार में तेजी से विस्तार हुआ है।
स्थानीय रोजगार और 3500 टन तक पहुंचा निर्यात
किनोवा उत्पादन ने केवल किसानों की आमदनी ही नहीं बढ़ाई, बल्कि स्थानीय युवाओं और श्रमिकों के लिए रोजगार के नए रास्ते भी खोले हैं। फसल की छंटाई, धुलाई, पैकेजिंग और आपूर्ति श्रृंखला में बड़ी संख्या में लोगों को काम मिल रहा है। कभी महज 100 टन के शुरुआती स्तर से शुरू हुआ जालोर का यह कृषि उद्यम अब 3000 से 3500 टन के सालाना कारोबार तक पहुंच चुका है। आज यहां से तैयार होने वाला किनोवा दुनिया के 15 से अधिक देशों में निर्यात किया जा रहा है, जिसने जालोर को वैश्विक कृषि मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।





















