पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में बुनियादी अधिकारों, बेलगाम महंगाई और राजनीतिक दमन के खिलाफ शुरू हुआ जन आंदोलन अब बेहद हिंसक रूप ले चुका है। नागरिक समाज, व्यापारियों और छात्र संगठनों के साझा मंच 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) की अगुवाई में जारी इस आंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा की गई बर्बर कार्रवाई में 40 से अधिक आम नागरिकों की जान जा चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इंटरनेट बंदी, राशन-दवाइयों की आपूर्ति पर रोक और दमनकारी नीतियों के कारण पूरे क्षेत्र में हालात बेहद विस्फोटक बने हुए हैं।
महंगाई और बुनियादी सुविधाओं का गहराता संकट
इस बड़े जन आक्रोश के केंद्र में क्षेत्र की चरमराती अर्थव्यवस्था और आम जनता पर पड़ा भारी आर्थिक बोझ है। प्रदर्शनकारियों का मुख्य विरोध बिजली के भारी-भरकम बिलों को लेकर है। स्थानीय नागरिकों की मांग है कि PoK में स्थित मंगला बांध से पैदा होने वाली सस्ती जलविद्युत के आधार पर ही बिजली की दरें तय की जाएं, ताकि स्थानीय लोगों को राहत मिल सके। इसके अलावा, गेहूं और आटे की आसमान छूती कीमतों ने आम परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है। नागरिक संगठन सरकार से रियायती दरों पर आटा उपलब्ध कराने और आवश्यक खाद्य वस्तुओं के परिवहन पर लगाई गई सभी प्रशासनिक पाबंदियों को तुरंत हटाने की मांग कर रहे हैं।
आर्थिक तंगी के साथ-साथ क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या ने भी युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। निजी निवेश की कमी और औद्योगिक विकास न होने के कारण रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। सरकारी नौकरियों की संख्या भी न के बराबर है, जिससे शिक्षित युवाओं में भारी निराशा है। वहीं, स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि बढ़ती लागत, कमजोर बाजार और अनिश्चित माहौल के कारण व्यापार ठप हो चुका है, जिससे पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था पर दबाव अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है।
चुनावी धांधली और शरणार्थी सीटों का राजनीतिक विवाद
आर्थिक संकट के अलावा, राजनीतिक उपेक्षा और प्रशासनिक हेरफेर ने भी जनता के असंतोष को हवा दी है। 27 जुलाई को PoK में आयोजित पहले चरण के निकाय चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली के गंभीर आरोप लगे हैं। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि पाकिस्तानी प्रशासन ने अपने राजनीतिक स्वार्थ को साधने के लिए चुनावी प्रक्रिया में व्यापक गड़बड़ी की है।
आंदोलनकारी PoK विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को तुरंत समाप्त करने की मांग कर रहे हैं। नागरिकों का मानना है कि इन आरक्षित सीटों की आड़ में इस्लामाबाद की सरकार राजनीतिक हेरफेर करती है और मनपसंद कठपुतली सरकारें बनाकर क्षेत्र के असली जनमत को दबाती रही है। यही कारण है कि स्थानीय लोग अब व्यवस्थागत सुधारों की मांग पर अड़े हुए हैं।
सुरक्षा बलों का हिंसक दमन और मानवाधिकार हनन
नागरिकों द्वारा 'लॉन्ग मार्च' और अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान किए जाने के बाद पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने दमनकारी रुख अपनाया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर हिंसक कार्रवाई करते हुए अंधाधुंध बल प्रयोग किया गया, जिसमें 40 से अधिक बेकसूर लोगों की मौत हो गई। दमनकारी कदम बढ़ाते हुए क्षेत्रीय प्रशासन ने आंदोलन की अगुवाई कर रहे जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया है और उस पर राज्य के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप मढ़ दिया है।
स्थानीय प्रशासन ने विरोध की आवाज दबाने के लिए इंटरनेट और सभी संचार सेवाओं को पूरी तरह ठप कर दिया है। इसके साथ ही अस्पतालों के लिए आवश्यक दवाओं और आम जनता के राशन की आपूर्ति रोक दी गई है। स्थिति की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए प्रदर्शनकारियों के शवों को उनके परिजनों को सौंपने से भी इनकार किए जाने की सूचनाएं सामने आई हैं। संकट को सुलझाने के बजाय पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने प्रदर्शनकारियों की तुलना "भारत जैसे दुश्मनों" से कर दी और शांतिपूर्ण बातचीत की हर संभावना को खारिज कर दिया, जिससे जनता का गुस्सा और भड़क गया है।
भारत की कड़ी निंदा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया
PoK में जारी हिंसक दमन पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान की कड़ी निंदा की है। भारत ने स्पष्ट किया कि यह मानवीय संकट पाकिस्तान के दशकों पुराने अवैध कब्जे, प्रशासनिक उत्पीड़न और नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखने का प्रत्यक्ष परिणाम है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से मांग की है कि पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे इस शोषण और मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया जाए।
उधर, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने भी PoK में हो रही गैर-न्यायिक हत्याओं और पुलिस बर्बरता पर गहरी चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र ने इन घटनाओं की तुरंत स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने का आह्वान किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार ने जनसंगठनों के साथ बैठकर महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक सुधारों पर ठोस निर्णय नहीं लिए, तो यह आंदोलन और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है।



















