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घर पहुंचते ही बच्‍चे से पढ़ाई के सवाल पूछना पड़ सकता है भारी, एक्‍सपर्ट्स ने बताया आधे घंटे का सुनहरा नियमपेरेंटिंग
2 घंटे पहले· 2

घर पहुंचते ही बच्‍चे से पढ़ाई के सवाल पूछना पड़ सकता है भारी, एक्‍सपर्ट्स ने बताया आधे घंटे का सुनहरा नियम

स्‍कूल से लौटते ही बच्‍चों से पढ़ाई, शिकायत या टिफिन को लेकर पूछे गए सवाल उनके आत्‍मविश्‍वास को कमजोर कर सकते हैं। एक्‍सपर्ट्स की सलाह है कि पहले आधे घंटे को सवाल-मुक्‍त रखकर बच्‍चे को सिर्फ प्‍यार और सुकून दिया जाए।

पूजा भट्टपूजा भट्टहेल्थ संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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दोपहर के दो-तीन बजते ही ज्‍यादातर घरों में एक जैसा नजारा दिखता है। गली में स्‍कूल बस रुकती है, बच्‍चे भारी बस्‍ता लादे दरवाजे तक पहुंचते हैं और अंदर घुसते ही उनका सामना सवालों की एक लंबी फेहरिस्‍त से होता है। ज्‍यादातर पैरेंट्स को लगता है कि बच्‍चे से तुरंत बातचीत शुरू करना प्‍यार जताने का तरीका है, लेकिन साइकोलॉजी की मानें तो यही जल्‍दबाजी बच्‍चे के मन पर उल्‍टा असर डाल देती है। थके हुए दिमाग पर लगातार सवालों की बौछार उसके आत्‍मविश्‍वास को कमजोर कर सकती है और धीरे-धीरे बच्‍चा खुद में सिमटने लगता है।

पढ़ाई से जुड़ा पहला सवाल ही बना देता है दबाव

बच्‍चा स्‍कूल में लगातार 6 से 7 घंटे अनुशासन, पढ़ाई और मानसिक कसरत में बिताकर घर लौटता है। ऐसे में जैसे ही घर में कदम रखते ही उससे आज क्‍लास में क्‍या पढ़ाया जैसा सवाल पूछा जाता है, उसका पहले से थका दिमाग और भारी हो जाता है। साइकोलॉजिस्‍ट डॉ. अनन्‍या शर्मा का कहना है कि जब पैरेंट्स स्‍कूल से लौटते ही सीधे पढ़ाई या परफॉर्मेंस से जुड़ी बात करते हैं, तो बच्‍चे को लगता है कि घर में भी उसकी पहचान सिर्फ एक स्‍टूडेंट की है, एक बच्‍चे की नहीं। उनके मुताबिक, यह सवाल पूछताछ जैसा महसूस होता है, जिससे बच्‍चा मानसिक रूप से बचाव की मुद्रा में आ जाता है और खुलकर बात करना बंद कर देता है।

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शिकायत और झगड़े वाले सवाल भरोसा तोड़ देते हैं

दूसरी आम गलती यह है कि पैरेंट्स बच्‍चे के घर घुसते ही अपने मन में उठ रही शंकाओं को शांत करने लगते हैं। बच्‍चा जरा भी शांत या चुप दिखे, तो फौरन पूछ लिया जाता है कि किसी ने शिकायत तो नहीं की या आज किसी से झगड़ा तो नहीं हुआ। बार-बार दोहराए गए ऐसे सवाल बच्‍चे के आत्‍मसम्‍मान को गहरी चोट पहुंचाते हैं। चाइल्‍ड बिहेवियर एक्‍सपर्ट राहुल वर्मा बताते हैं कि घर में कदम रखते ही किसी नेगेटिव बात या गलती के बारे में पूछे जाने से बच्‍चे के भीतर एक तरह का डर बैठ जाता है। उसे यह महसूस होने लगता है कि घर पर भी उसे परखा और जज किया जा रहा है। इसका नतीजा यह होता है कि बच्‍चा धीरे-धीरे अपनी गलतियां और परेशानियां पैरेंट्स से छुपाने लगता है, उसका आत्‍मविश्‍वास डगमगा जाता है और वह खोया-खोया रहने लगता है।

खाली न हुए टिफिन पर टोकना भी बड़ी भूल

ज्‍यादातर भारतीय घरों में मां का सबसे चहेता सवाल यही होता है कि आज टिफिन पूरा खत्‍म क्‍यों नहीं हुआ। लेकिन जरा सोचिए, बच्‍चा पूरे दिन की थकान लेकर लौटा है और गले लगाने की बजाय उसे सबसे पहला ताना खाली न हुए टिफिन बॉक्‍स को लेकर मिलता है। बेशक खाना जरूरी है, लेकिन स्‍कूल से लौटने के बाद के शुरुआती 30 मिनट बच्‍चे के मानसिक सुकून के लिए होने चाहिए। इसी दौरान टिफिन को लेकर डांट या सवाल बच्‍चे को चिड़चिड़ा बना देते हैं और उसे लगने लगता है कि उसकी अपनी भूख से ज्‍यादा पैरेंट्स के लिए टिफिन का खाली होना मायने रखता है। यह छोटी सी बात दोनों के बीच के कम्‍युनिकेशन गैप को और चौड़ा कर देती है।

लगातार सवालों का बच्‍चे पर लंबे समय में क्‍या असर पड़ता है

साइकोलॉजिस्‍ट्स के मुताबिक बच्‍चे के स्‍कूल से लौटते ही पूछताछ जैसे सवाल दागना कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि रोज दोहराई जाने वाली आदत बन जाती है। यही आदत लंबे समय में बच्‍चे और पैरेंट्स के बीच झिझक और दूरी बढ़ा देती है। बच्‍चा यह मान बैठता है कि घर लौटने का मतलब भी एक तरह की परीक्षा से गुजरना है, फिर चाहे वह पढ़ाई से जुड़ी हो या व्‍यवहार से। नतीजतन वह अपनी छोटी-छोटी खुशियां, स्‍कूल में हुई कोई दिलचस्‍प घटना या अपनी परेशानियां पैरेंट्‍स से बांटना बंद कर देता है और खुद को भीतर ही भीतर समेटने लगता है।

पैरेंट्स अपनाएं आधे घंटे का सुनहरा नियम

तो फिर सही तरीका क्‍या है? एक्‍सपर्ट्स की सलाह है कि बच्‍चे के स्‍कूल से आने के बाद पहले आधे घंटे को पूरी तरह सवाल-मुक्‍त रखा जाए। इस दौरान बच्‍चे को सवालों की जगह पैरेंट्स का प्‍यार और सुकून भरा साथ मिलना चाहिए। इसके लिए कुछ आसान तरीके अपनाए जा सकते हैं:

  • मुस्‍कान और प्‍यार भरी झप्‍पी: बच्‍चा जैसे ही घर में कदम रखे, उसका मुस्‍कुराकर स्‍वागत करें, उसे गले लगाएं और कहें कि उसे देखकर कितना अच्‍छा लग रहा है।
  • सवाल का लहजा और विषय दोनों बदलें: सीधे पढ़ाई की बात करने के बजाय पहले हाथ-मुंह धुलवाएं और उसे थोड़ा आराम करने दें।
  • बच्‍चे को खुद बोलने का मौका दें: जब बच्‍चा रिलेक्‍स हो जाए और खुद कुछ बताना चाहे, तभी पूरी दिलचस्‍पी के साथ उसकी बात सुनें।

एक्‍सपर्ट्स का मानना है कि घर बच्‍चे के लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित और तनावमुक्‍त जगह होनी चाहिए। जब घर में उसे बिना किसी शर्त के प्‍यार और स्‍वीकार्यता मिलती है, तो उसका खोया हुआ आत्‍मविश्‍वास सिर्फ लौटता ही नहीं, बल्कि वह अपने दिन की हर छोटी-बड़ी बात खुद-ब-खुद पैरेंट्स से साझा करने लगता है।

इसका आप पर असर

  • पैरेंट्स के लिए: स्कूल जाने वाले बच्‍चों के पैरेंट्स रोज घर लौटने के बाद के पहले 30 मिनट में सवाल पूछने की बजाय सिर्फ प्‍यार और सुकून दें, इससे बच्‍चे का आत्‍मविश्‍वास बढ़ सकता है और पैरेंट्स-बच्‍चे के बीच का कम्‍युनिकेशन गैप कम हो सकता है।

सवाल-जवाब

स्‍कूल से आते ही बच्‍चे से पढ़ाई का सवाल क्‍यों नहीं पूछना चाहिए?
क्योंकि 6 से 7 घंटे स्कूल में बिताने के बाद बच्चे का दिमाग पहले से थका होता है, ऐसे में तुरंत पढ़ाई का सवाल उसे स्‍टूडेंट के तौर पर आंके जाने जैसा महसूस कराता है।
30 मिनट का नो-क्‍वेश्‍चन रूल क्‍या है?
यह एक्‍सपर्ट्स की सलाह है कि बच्चे के स्कूल से लौटने के बाद पहले आधे घंटे में उससे कोई सवाल न पूछा जाए, बल्कि सिर्फ प्‍यार और सुकून दिया जाए।
शिकायत या झगड़े से जुड़े सवाल बच्चे पर क्‍या असर डालते हैं?
चाइल्ड बिहेवियर एक्सपर्ट राहुल वर्मा के मुताबिक ऐसे सवाल बच्चे के मन में डर बिठा देते हैं, जिससे वह अपनी गलतियां और परेशानियां छुपाने लगता है।
टिफिन खाली न होने पर बच्चे को टोकने से क्‍या नुकसान होता है?
बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है और उसे लगता है कि उसकी भूख से ज्‍यादा टिफिन खाली होना पैरेंट्स के लिए मायने रखता है, जिससे कम्‍युनिकेशन गैप बढ़ता है।
इस सलाह में किन एक्‍सपर्ट्स की राय शामिल है?
साइकोलॉजिस्ट डॉ. अनन्‍या शर्मा और चाइल्ड बिहेवियर एक्सपर्ट राहुल वर्मा ने इस बारे में अपनी राय दी है।
पैरेंट्स इस आधे घंटे में क्‍या करें?
बच्चे को मुस्कुराकर गले लगाएं, उसे हाथ-मुंह धोकर आराम करने दें और जब वह खुद बोलना चाहे तभी ध्यान से उसकी बात सुनें।
पूजा भट्ट
लेखक के बारे मेंपूजा भट्टहेल्थ संवाददाता लखनऊ
विशेषज्ञताहेल्थ समाचार, सार्वजनिक स्वास्थ्य, चिकित्सा रिपोर्टिंग, वेलनेस, फ़िटनेस, पोषण, स्वास्थ्य नीति, रोग जागरूकता, चिकित्सा अनुसंधान, मानसिक स्वास्थ्य

पूजा भट्ट एक हेल्थ संवाददाता हैं जो चिकित्सा ख़बरों, वेलनेस, स्वास्थ्य नीति, फ़िटनेस और सार्वजनिक स्वास्थ्य अपडेट को कवर करती हैं। वे अहम स्वास्थ्य घटनाक्रमों और उभरते चिकित्सा रुझानों पर रिपोर्ट करती हैं।

पूजा भट्ट एक हेल्थ संवाददाता हैं जो हेल्थकेयर पत्रकारिता — चिकित्सा ख़बरों, सार्वजनिक स्वास्थ्य अपडेट, वेलनेस रुझानों, अस्पताल व स्वास्थ्य तंत्र की रिपोर्टिंग और स्वास्थ्य नीति — में विशेषज्ञता रखती हैं। वे ब्रेकिंग हेल्थ स्टोरी, रोग जागरूकता, चिकित्सा अनुसंधान, फ़िटनेस, पोषण और हेल्थकेयर तकनीक की प्रगति कवर करती हैं। सटीकता और स्पष्टता पर मज़बूत ज़ोर के साथ पूजा ऐसी जानकारीपूर्ण रिपोर्टिंग देती हैं जो पाठकों को जटिल चिकित्सा विषयों और उनके वास्तविक असर को समझने में मदद करती है। उनकी कवरेज में सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल, हेल्थकेयर तक पहुँच, निवारक देखभाल, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और चिकित्सा में उभरते नवाचार शामिल हैं।

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