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बच्चे की धमकाने वाली आदत कहां से आती है? घर के झगड़े और तानों का सीधा असर — बाल मनोवैज्ञानिकों की चेतावनीपेरेंटिंग
13 जून 2026, 5:30 am (47 दिन पहले)· 0

बच्चे की धमकाने वाली आदत कहां से आती है? घर के झगड़े और तानों का सीधा असर — बाल मनोवैज्ञानिकों की चेतावनी

स्कूली बच्चों की 'ब्लैकमेलिंग' और धौंस जमाने की आदत अक्सर घर के माहौल से आती है। बाल मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि माता-पिता का आपसी व्यवहार ही बच्चे का असली स्कूल है।

“मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुम्हें अपनी बर्थडे पार्टी में नहीं बुलाऊंगा!” — या फिर — “अगर तुमने अपना टिफिन शेयर नहीं किया, तो मैं तुम्हारे साथ प्रोजेक्ट नहीं करूंगा.” स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों के मुंह से निकलने वाले ये वाक्य आज इतने आम हो गए हैं कि ज्यादातर माता-पिता और टीचर्स इन्हें ‘बचपना’ या ‘मासूम नोकझोंक’ कहकर टाल देते हैं. लेकिन ठहरिए — क्या कभी सोचा है कि किसी पर दबाव डालकर, धमकाकर या भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करके अपना काम निकलवाने का यह तरीका इन कोमल दिमागों तक पहुंचता कहां से है?

जड़ें घर के भीतर ही हैं

बाल मनोवैज्ञानिकों (Child Psychologists) का कहना है कि इस आदत का स्रोत अक्सर बाहर नहीं, बल्कि बच्चे के अपने घर के माहौल में छिपा होता है. एक पुरानी कहावत यहां बिल्कुल सटीक बैठती है — बच्चे वो नहीं करते जो हम उनसे कहते हैं, वे वही करते हैं जो वे हमें करते हुए देखते हैं.

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डेन्वर में हुए एक हालिया रिसर्च में यही बात उभरकर सामने आई. इसके मुताबिक बच्चे अपने घर के बड़ों का हूबहू अनुकरण (Copy) करते हैं. वे केवल यह नहीं सीखते कि क्या बोलना है — वे बारीकी से यह भी ताड़ लेते हैं कि अपनी बात मनवाने के लिए बड़े लोग कौन-कौन से हथकंडे अपनाते हैं.

जब माता-पिता का तरीका ही गलत हो

घर में अगर पति-पत्नी अपनी बात मनवाने के लिए एक-दूसरे को धमकी देते हैं, ताने कसते हैं, ‘साइलेंट ट्रीटमेंट’ यानी बातचीत बंद कर देने का सहारा लेते हैं, या इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं — तो बच्चा अनजाने में यही समझ बैठता है कि यही ‘सही’ रास्ता है. उसके मन में यह बात गहराई से बैठ जाती है कि दूसरों पर धौंस जमाकर या उन्हें नीचा दिखाकर अपना काम करवाया जा सकता है.

कुछ बेहद आम उदाहरण देखिए — किसी को नीचा दिखाने वाली बातें जैसे “तुम तो हो ही निकम्मे” या “तुमसे कुछ नहीं होगा”; शर्तें थोपना जैसे “अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं तुमसे बात नहीं करूंगी”; एक-दूसरे की कमजोरियों का फायदा उठाना और लगातार आलोचना करना. जो बच्चा यह सब रोज देखता है, वही आगे चलकर अपने दोस्तों से कहने लगता है — “तुम्हारे कपड़े अच्छे नहीं हैं, तुम हमारे ग्रुप में नहीं खेल सकते.”

बोबो डॉल एक्सपेरिमेंट क्या साबित करता है

मनोविज्ञान का एक बेहद चर्चित अध्ययन है, जिसे ‘बोबो डॉल एक्सपेरिमेंट’ कहा जाता है. इसमें पाया गया कि जिन बच्चों ने वयस्कों (Adults) को एक डॉल के साथ आक्रामक बर्ताव करते देखा, उन बच्चों ने अकेले में उसी डॉल के साथ ठीक वैसा ही हिंसक और आक्रामक व्यवहार दोहराया.

विशेषज्ञ बताते हैं कि प्री-स्कूल यानी 3 से 6 साल की उम्र सबसे संवेदनशील होती है. इस दौर में बच्चा घर में जो कुछ देखता है, उसकी छाप उसके कोमल मन पर सबसे गहरी पड़ती है. आज भले ही माता-पिता बच्चों के सामने शारीरिक हिंसा न करते हों, लेकिन मानसिक और शाब्दिक (Verbal) रूप से एक-दूसरे को चोट पहुंचाना भी उतना ही नुकसानदेह है.

धौंस जमाने की आदत का खतरनाक भविष्य

यहां सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बुलिंग यानी धौंस जमाने की यह आदत केवल सामने वाले बच्चे को ही नुकसान नहीं पहुंचाती — यह खुद उस बच्चे का भविष्य भी अंधेरे में धकेल देती है जो ऐसा करता है. विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जो बच्चे बचपन में आक्रामक या हेरफेर करने वाला (Manipulative) व्यवहार सीख लेते हैं, उनके किशोरावस्था (Teenage) में पहुंचने पर डिप्रेशन यानी अवसाद का शिकार होने, नियम तोड़ने और क्रिमिनल टेंडेंसी पनपने, तथा नशे की लत में फंसने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है.

हल पूरी तरह माता-पिता के हाथ में

राहत की बात यह है कि इस समस्या की चाबी पूरी तरह माता-पिता के पास ही है. हर बच्चा मूल रूप से दो ही चीजों से चलता है — जो उसे चाहिए उसे पाना (जैसे प्यार, खिलौने, तारीफ) और जिससे वह बचना चाहता है उससे दूरी (जैसे पढ़ाई या जल्दी सोना). सवाल बस इतना है कि उसे अपनी बात मनवाने के लिए कौन-सा रास्ता दिखाया जाए.

नकारात्मक तरीकों की जगह सकारात्मक तरीके अपनाने पर नतीजे बदल जाते हैं:

  • सम्मान और सहयोग: बच्चों के सामने एक-दूसरे को “थैंक यू” कहें, तारीफ करें और एक टीम की तरह काम करते दिखें.
  • सराहना की आदत: जब आप बच्चों के सामने अपने पार्टनर की तारीफ करते हैं — जैसे “आज मम्मी की वजह से हम टाइम पर पहुंच पाए” — तो बच्चा सहयोग का असली महत्व समझता है.
  • धैर्य से समाधान: कोई मतभेद हो तो चिल्लाने के बजाय शांति से बैठकर बात सुलझाएं.

जब बच्चे घर में दयालुता, सम्मान और आपसी तालमेल देखते हैं, तो वे न सिर्फ दूसरों को धमकाना छोड़ देते हैं, बल्कि खुद भी ‘बुलिंग’ का शिकार बनने से बच जाते हैं. उनके भीतर एक मजबूत आत्मसम्मान (Self-esteem) पनपता है. याद रखिए — आपके पास बच्चों से केवल काम करवाने की पावर ही नहीं है, बल्कि उन्हें एक संवेदनशील और बेहतरीन इंसान गढ़ने की जिम्मेदारी भी है.

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