पंजाब की प्रादेशिक राजनीति एक बार फिर अपने पारंपरिक एवं संवेदनशील पंथक मुद्दों की दिशा में तेजी से घूमती नजर आ रही है। वर्ष 2027 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव से काफी पहले सिख समुदाय से संबंधित मांगों ने सियासी गलियारों में नई सुगबुगाहट पैदा कर दी है। इस समूचे घटनाक्रम के केंद्र में बेअंत सिंह हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे बंदी जगतार सिंह हवारा की अस्थाई रिहाई यानी पैरोल की याचिका है। हैरानी की बात यह है कि इस संवेदनशील मांग पर सूबे के परस्पर विरोधी राजनीतिक दलों के दिग्गजों के सुर पूरी तरह मेल खाते दिख रहे हैं, जिससे राज्य के आगामी सियासी समीकरणों को नई दिशा मिल रही है।
मानवीय आधार पर पैरोल की मांग और मुख्यमंत्री की पहल
जगतार सिंह हवारा को कुछ दिनों की राहत देने का यह पूरा मामला शुद्ध रूप से मानवीय संवेदनाओं पर टिका है। हवारा की माताजी 80 वर्ष की वृद्धावस्था में हैं और उनका स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा है। पंजाब के शीर्ष प्रशासनिक प्रमुख भगवंत मान ने स्वयं पहल करते हुए इस विषय में राजभवन का ध्यान आकर्षित किया है। मान का कहना है कि एक अत्यंत वृद्ध और बीमार मां अपने जीवन के अंतिम दौर में अपने पुत्र का चेहरा देखना चाहती हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने चंडीगढ़ स्थित राजभवन पहुंचकर सूबे के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया के साथ वार्ता की और उनसे दयालु दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया।
राजभवन में हुई इस मुलाकात से कुछ ही समय पहले भगवंत मान ने राज्यपाल को एक औपचारिक पत्र भेजकर हवारा को 10 दिवस की पैरोल देने की सिफारिश की थी। मान ने तर्क दिया था कि तीन दशकों से भी लंबे इंतजार के पश्चात एक मां को अपने पुत्र का स्पर्श पाने की किरण दिखाई दी है। परिजनों के अनुसार हवारा की मां अचेत स्थिति में हैं, किंतु जब उनके समीप हवारा का नाम उच्चारित किया जाता है, तो वे हल्की प्रतिक्रिया देती हैं। इसी मानवीय पहलू को देखते हुए शासन और राजनीति के स्तर पर सहानुभूतिपूर्वक कदम उठाने की मांग उठ रही है।
रवनीत सिंह बिट्टू का रुख और बदलती राजनीतिक सोच
इस पूरे मामले में सर्वाधिक चर्चा का विषय भारतीय जनता पार्टी के नेता रवनीत सिंह बिट्टू का बदला हुआ रुख बना है। रवनीत सिंह बिट्टू स्वर्गीय बेअंत सिंह के पोते हैं, जिनकी हत्या में हवारा की संलिप्तता सिद्ध हुई थी। इसके बावजूद बिट्टू ने हवारा की अस्थाई रिहाई के संबंध में राजभवन द्वारा तैयार सकारात्मक रिपोर्ट की सराहना की है। उन्होंने राज्यपाल से बातचीत के उपरांत सार्वजनिक रूप से कहा कि एक असहाय और अस्वस्थ वृद्धा की स्थिति को देखते हुए इंसानियत का परिचय दिया जाना चाहिए।
रवनीत सिंह बिट्टू का मानना है कि उनके परिवार के समक्ष दादा बेअंत सिंह की शहादत का स्थान सदैव सर्वोच्च रहेगा, लेकिन एक मां की वात्सल्य भावना और उसकी जर्जर सेहत के सामने सद्भावना दिखाना भी जरूरी है। उन्होंने रेखांकित किया कि किसी समाज के नवनिर्माण हेतु प्रतिशोध के स्थान पर दयालुता, भ्रातृत्व और स्थाई शांति की भावना सर्वोपरि होनी चाहिए। इस बयान के बाद राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि पंजाब में पुरानी कड़वाहटों को भुलाने की नई कोशिशें आकार ले रही हैं।
बेअंत सिंह हत्याकांड की पृष्ठभूमि और हवारा की प्रासंगिकता
जगतार सिंह हवारा का नाम पंजाब के अतीत के बेहद अशांत दौर से जुड़ा रहा है। 31 अगस्त 1995 की तारीख को चंडीगढ़ स्थित राज्य सचिवालय के मुख्य द्वार के निकट एक विनाशकारी बम धमाका हुआ था। उस भयावह हादसे में तत्कालीन सूबा प्रमुख बेअंत सिंह सहित कुल 17 नागरिकों ने अपनी जान गंवाई थी। न्यायिक प्रक्रिया के बाद हवारा को दोषी पाते हुए आजीवन कारावास का दंड सुनाया गया था। प्रतिबंधित चरमपंथी धड़े बब्बर खालसा का पूर्व सदस्य हवारा वर्तमान में देश की राजधानी स्थित मंडोली कारागार में निरूद्ध है।
न्यायालय से सजायाफ्ता होने और लंबे समय तक जेल में रहने के बाद भी सिख पंथ के एक विशेष वर्ग में हवारा की पकड़ कमजोर नहीं हुई है। इस प्रभाव का साक्ष्य वर्ष 2015 में अमृतसर के समीप आयोजित एक विशाल जमावड़े में मिला था, जहां चरमपंथी समूहों ने सर्वसम्मति से हवारा को सर्वोच्च धार्मिक पीठ अकाल तख्त का समानांतर प्रमुख घोषित कर दिया था। यही वजह है कि उसकी रिहाई या छूट का प्रश्न सीधे तौर पर पंथक जनभावनाओं को उद्वेलित कर देता है।
बंदी सिंहों की रिहाई का आंदोलन और अकाली गुटों की लामबंदी
पंजाब के मौजूदा माहौल में केवल हवारा का मामला ही नहीं, बल्कि विभिन्न जेलों में निरुद्ध अनेक सिख कैदियों, जिन्हें 'बंदी सिंह' कहा जाता है, को मुक्त करने की मांग भी प्रचंड हो उठी है। मुख्य अकाली दल के साथ कौमी इंसाफ मोर्चा जैसे पंथक संगठनों का कहना है कि कई सजायाफ्ता कैदी अपनी निर्धारित कानूनी अवधि पूरी कर चुके हैं, फिर भी उन्हें सलाखों के पीछे रखा गया है। इन बंदियों में पूर्व मुख्यमंत्री हत्याकांड के सह-अभियुक्त बलवंत सिंह राजोआना का मामला भी प्रमुखता से लिया जा रहा है।
इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए विभिन्न अकाली धड़े लगातार प्रयासरत हैं। हाल ही में मंगलवार को शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) नामक धड़े के सदस्यों ने राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से चर्चा की। इस दल ने राज्यपाल से विशेष आग्रह किया कि हवारा को उनकी मरणासन्न माताजी से भेंट हेतु अविलंब पैरोल प्रदान की जाए, ताकि इस पारिवारिक त्रासदी में कुछ राहत मिल सके।
अमृतपाल सिंह के संगठन की चुनावी एंट्री और बस्सी पठाना का टिकट
पंजाब की पंथक सियासत में इस बार केवल पुराने दल ही सक्रिय नहीं हैं, बल्कि नए राजनीतिक मंच भी आक्रामक तरीके से उतर रहे हैं। वर्तमान समय में जेल में निरुद्ध खडूर साहिब के लोकसभा सदस्य अमृतपाल सिंह के नेतृत्व वाले वारिस पंजाब दे नामक दल ने 2027 के चुनाव मैदान में अपना पहला प्रत्याशी घोषित कर दिया है। संगठन ने फतेहगढ़ साहिब जिले में स्थित बस्सी पठाना सीट से 61 वर्षीय बुजुर्ग सतवंत सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है।
यह राजनीतिक घोषणा अत्यंत अर्थपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि घोषित उम्मीदवार सतवंत सिंह वास्तव में केहर सिंह के सुपुत्र हैं। केहर सिंह को देश की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कत्ल के षड्यंत्र में लिप्त रहने के जुर्म में फांसी की सजा दी गई थी। इस कदम से स्पष्ट है कि यह नया संगठन चरम पंथक भावनाओं को लामबंद करने की रणनीति अपना रहा है। अतीत में पंथक वोट बैंक पर मुख्य अकाली दल का वर्चस्व रहता था, परंतु बीते कुछ वर्षों में यह जनाधार कई अलग-अलग हिस्सों में विभाजित हो चुका है।
2022 के नतीजों की सीख और 2027 के राजनीतिक समीकरण
साल 2022 में संपन्न हुए पंजाब विधानसभा चुनाव ने सूबे की पारंपरिक दलीय व्यवस्था को झकझोर दिया था। उस चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने ऐसे ग्रामीण व पंथक बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में भारी सेंधमारी की थी, जिन्हें दशकों से अकाली दल का अभेद्य दुर्ग स्वीकार किया जाता था। उस ऐतिहासिक पराजय के उपरांत अब अकाली दल के विभिन्न गुट और नए सिख संगठन अपने खोए हुए जनसमर्थन को दोबारा पाने के लिए हरसंभव जतन कर रहे हैं।
इसी रणनीतिक जरूरत के तहत हवारा को राहत देने, जेल में बंद सिखों को मुक्त कराने, राजोआना के मामले की समीक्षा, करतारपुर गलियारे की आवाजाही और सिख अस्मिता से जुड़े मुद्दों को 2027 के चुनाव से ठीक पहले प्राथमिकता से उठाया जा रहा है। अब पंजाब के राजनीतिक फलक पर मूल प्रश्न यह उभरकर सामने आया है कि क्या सिख पंथक मतदाता आगामी 2027 के चुनाव में किसी एक छतरी के नीचे इकट्ठा हो पाएगा या फिर विभाजित होकर अलग-अलग गुटों में ही बंटता रहेगा।
























