अपने देश के भीतर बलूचिस्तान और पीओके जैसे गंभीर संकटों को संभालने में असफल रहने के बावजूद पाकिस्तान ने वैश्विक मंच पर एक बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाने की ठान ली है। अमेरिका और ईरान के बीच गहराते तनाव के बीच पाकिस्तान अब दोनों देशों के बीच सुलह कराने की कोशिशों में जुट गया है। इसी कूटनीतिक पहल के तहत पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर सोमवार, 24 अगस्त को ईरान की राजधानी तेहरान की यात्रा पर रवाना होंगे। ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी इस उच्च स्तरीय दौरे की आधिकारिक पुष्टि कर दी है।
कड़े प्रतिबंधों और ठप पड़ी वार्ताओं के साये में दौरा
असीम मुनीर की यह तेहरान यात्रा ऐसे नाज़ुक वक्त पर हो रही है जब अमेरिका ईरान पर अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध थोपने की पूरी तैयारी कर चुका है। इसके साथ ही, इस साल जून महीने में ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध को टालने या खत्म करने को लेकर जो आपसी समझ बनी थी, उसे आगे बढ़ाने की प्रक्रिया फिलहाल पूरी तरह ठप पड़ी हुई है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ती खटास को पाटने के लिए इस्लामाबाद अब सक्रिय रूप से बीच-बचाव की मुद्रा में आ गया है.
किन अहम मुद्दों पर होगी तेहरान में चर्चा
सामने आ रही जानकारियों के अनुसार, असीम मुनीर तेहरान पहुंचकर वहां के शीर्ष नेतृत्व के साथ अहम बैठकें करेंगे। इस बातचीत का मुख्य एजेंडा अमेरिका और ईरान के बीच रुकी हुई कूटनीति वार्ता को दोबारा पटरी पर लाना है। इसके अतिरिक्त, अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले नए प्रतिबंधों, सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों के आवागमन और लगातार सुलगते तनाव के अन्य पहलुओं पर भी विचार-विमर्श होने की पूरी संभावना है। पाकिस्तान की यह कोशिश है कि दोनों पक्ष किसी तरह बातचीत के रास्ते पर वापस लौट आएं.
वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए क्यों अहम है होर्मुज का मुद्दा
होर्मुज का समुद्री मार्ग दुनिया भर के ऊर्जा बाजार के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है क्योंकि इसी रास्ते से दुनिया भर में भारी मात्रा में कच्चे तेल और एलएनजी की सप्लाई होती है। इस क्षेत्र में तनाव और टकराव बढ़ने का नुकसान केवल ईरान या अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ईरान ने हाल के दिनों में इस मार्ग से गुजरने वाले कुछ जलपोतों के खिलाफ काफी सख्त रुख अपनाया है, जिससे तेल आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव काफी बढ़ गया है.
मध्यस्थ की भूमिका में क्यों कूद पड़ा है पाकिस्तान
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बढ़ने के बाद से ही इस्लामाबाद ने खुद को दोनों पक्षों के बीच एक प्रभावी सेतु या मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। इससे पहले भी पाकिस्तान की तरफ से दोनों देशों के बीच संवाद स्थापित करने के प्रयास किए गए थे, और असीम मुनीर का यह तेहरान दौरा उसी कूटनीति का अगला चरण है। मुनीर के इस दौरे से ठीक पहले पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने भी ईरान की यात्रा की थी। इसके अलावा, पाकिस्तानी सेना प्रमुख की ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ भी बातचीत हो चुकी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान एक साथ तेहरान और वाशिंगटन दोनों के संपर्क में बने रहने की रणनीति पर चल रहा है.
मक्का रक्षा समझौते और कूटनीतिक उलझनें
इस पूरी यात्रा का महत्व इस बात से भी बढ़ जाता है कि गत 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत तीनों देशों ने सहमति जताई है कि यदि उनमें से किसी पर भी कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हुआ हमला माना जाएगा। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य सामूहिक रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना है। हालांकि, इसे ऐसे समय में आकार दिया गया है जब ईरान और अमेरिका आमने-सामने हैं, जिससे पाकिस्तान के लिए एक कठिन कूटनीतिक संतुलन बनाने की चुनौती पैदा हो गई है.
क्या मक्का समझौते में ईरान की होगी एंट्री
कुछेक रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया है कि इस नए रक्षा ढांचे के भीतर ईरान को भी शामिल किए जाने पर चर्चा चल रही है। हालांकि, यह अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ईरान को औपचारिक रूप से इस व्यवस्था से कैसे जोड़ा जा सकता है। अगर ऐसा संभव होता है, तो यह मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बहुत बड़ा फेरबदल साबित हो सकता है, क्योंकि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के साथ ईरान का आना क्षेत्रीय तनाव को थामने के लिए एक नया मंच मुहैया करा सकता है।
तनाव कम करने की राह में बड़ी चुनौतियां
इसके बावजूद, ईरान इस नए समझौते को लेकर बहुत अधिक सतर्कता बरत रहा है। यही वजह है कि असीम मुनीर के लिए तेहरान के हुक्मरानों को यह विश्वास दिलाना आसान नहीं होगा कि यह गठबंधन ईरान के विरुद्ध नहीं है। इस बीच, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी यह साफ किया है कि मक्का समझौता किसी खास देश के निशाने पर नहीं है, बल्कि इसका मकसद केवल सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करना है। सऊदी अरब और तुर्की समेत कई प्रमुख देशों की अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी होती हैं, इसलिए पाकिस्तान ऐसी राह तलाश रहा है जिससे तेल आपूर्ति और समुद्री यातायात फिर से सामान्य हो सके।
क्या असीम मुनीर हासिल कर पाएंगे सफलता
विश्लेषकों का मानना है कि असीम मुनीर की यह तेहरान यात्रा महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं है। ऐसे समय में जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव अपने चरम पर है और अमेरिका नए प्रतिबंधों की तैयारी कर रहा है, अगर पाकिस्तान दोनों पक्षों को वार्ता की टेबल पर लाने में कामयाब हो जाता है, तो यह इस्लामाबाद के खाते में एक बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी। हालांकि, इसके लिए राह बेहद कठिन है क्योंकि पाकिस्तान को एक ही वक्त पर ईरान, अमेरिका, सऊदी अरब और तुर्की के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों में बहुत ही सावधानी से संतुलन साधना होगा।



















