दार्जिलिंग के पहाड़ी इलाकों में दशकों से चली आ रही गोरखा पहचान और प्रशासनिक अधिकारों की उलझन को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार ने एक निर्णायक कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग हिल्स का प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ एक अहम बैठक की, जिसमें इस पुराने विवाद का एकमुश्त और स्थायी राजनीतिक हल तलाशने का भरोसा दिलाया गया है।
सुकना बैठक में स्पष्ट की गईं सीमाएं और प्राथमिकताएं
सुकना में आयोजित इस उच्चस्तरीय बैठक के दौरान अमित शाह ने यह साफ कर दिया कि गोरखा समुदाय के अधिकारों से जुड़ा कोई भी समाधान भारतीय संविधान की तय सीमाओं के भीतर ही निकाला जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरी प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल राज्य का विभाजन नहीं किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि केंद्र सरकार एक तरफ जहां गोरखा समुदाय की विशिष्ट पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक स्वायत्तता की मांगों पर गंभीरता से विचार कर रही है, वहीं राज्य की भौगोलिक अखंडता से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।
समस्या के समाधान के लिए हाईलेवल कमेटी का गठन
सिर्फ मौखिक आश्वासनों तक सीमित न रहते हुए केंद्र सरकार ने इस दिशा में ठोस अमल के लिए एक हाईलेवल कमेटी बनाने की घोषणा कर दी है। पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर और केंद्र सरकार के पूर्व वार्ताकार पंकज कुमार सिंह इस महत्वपूर्ण समिति के अध्यक्ष होंगे। इस कमेटी के कंधों पर केवल चर्चाएं आयोजित करने की जिम्मेदारी नहीं होगी, बल्कि यह समिति संभावित अंतिम समझौते का पूरा मसौदा तैयार करेगी, उसके तौर-तरीके तय करेगी और इस समाधान को जमीन पर उतारने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप भी बनाएगी। दार्जिलिंग की पहाड़ियों में लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता को खत्म करने की दिशा में इस कमेटी के गठन को एक बहुत बड़ा और अहम मोड़ माना जा रहा है।
संवैधानिक दायरे में प्रशासनिक स्वायत्तता और विकास
बैठक में गोरखा समुदाय की अलग पहचान और राजनीतिक मान्यता के मुद्दों को प्रमुखता से रखा गया। सरकार की तरफ से यह संकेत दिए गए हैं कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही पहाड़ी क्षेत्रों को अधिक प्रशासनिक अधिकार देने या किसी विशेष प्रशासनिक ढांचे को विकसित करने की संभावनाओं पर काम किया जा सकता है। हालांकि, इस व्यवस्था का वास्तविक और अंतिम स्वरूप तभी सामने आएगा जब हाईलेवल कमेटी अपनी व्यापक बातचीत पूरी कर लेगी और अपनी सिफारिशें सौंप देगी। इसके अलावा, अमित शाह ने उत्तर बंगाल के इन पहाड़ी क्षेत्रों में बरसों से लटके पड़े बुनियादी ढांचे और विकास कार्यों की कमियों को दूर करने के वास्ते पर्याप्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का भी आश्वासन दिया है।
11 गोरखा समुदायों के एसटी दर्जे की मांग पर भी चर्चा
इस उच्चस्तरीय विचार-विमर्श में गोरखा समुदाय की कई पुरानी और लंबित मांगों को भी शामिल किया गया। इसमें सबसे प्रमुख मांग 11 वंचित गोरखा समुदायों को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा दिए जाने की है। यदि इन समुदायों को एसटी का दर्जा मिल जाता है, तो इससे उन्हें आरक्षण और अन्य संवैधानिक संरक्षण जैसे जरूरी लाभ प्राप्त हो सकेंगे। इसके साथ ही, गोरखाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने और उन्हें पुख्ता संवैधानिक सुरक्षा कवच देने से जुड़े पहलुओं को भी इस पूरी बातचीत का अहम हिस्सा बनाया गया है।
राजनीतिक दलों के प्रमुख चेहरों की सहभागिता
सुकना में हुई यह बैठक इसलिए भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पहाड़ी क्षेत्र के तमाम विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि एक ही मंच पर एक साथ मौजूद थे। इस बैठक में पश्चिम बंगाल के शुभेंदु अधिकारी, दार्जिलिंग के सांसद राजू बिष्ट, राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा यानी जीजेएम के प्रमुख बिमल गुरुंग और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट यानी जीएनएलएफ के अध्यक्ष मन घीसिंग समेत कई दिग्गज नेता शरीक हुए। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले इन नेताओं का एक जगह इकट्ठा होना इस जटिल मसले पर एक व्यापक सहमति बनाने की ओर एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और उसके आसपास के पहाड़ी इलाकों में रहने वाली घनी आबादी लंबे अरसे से अपनी अलग गोरखा पहचान, भाषा, संस्कृति और पुख्ता राजनीतिक अधिकारों के लिए मुखर रही है। गोरखालैंड की मांग का मुख्य तर्क हमेशा से यही रहा है कि इन पहाड़ी क्षेत्रों की सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई स्थितियां पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों से काफी भिन्न हैं। आंदोलन की अगुवाई करने वाले नेताओं का यह आरोप रहा है कि दशकों से इन पहाड़ी इलाकों की राजनीतिक और आर्थिक उपेक्षा की जाती रही है। एक अलग राज्य के तौर पर गोरखालैंड की मांग ने सबसे पहले 1980 के दशक में एक बड़े आंदोलन और हिंसक संघर्ष का रूप लिया था, जिसके बाद 2007 और 2017 में भी बड़े पैमाने पर आंदोलन देखने को मिले थे।
पूर्व की प्रशासनिक व्यवस्थाएं और उनकी सीमाएं
गोरखालैंड की मांग के ज्वार को शांत करने के मकसद से अतीत में भी कई प्रशासनिक व्यवस्थाएं बनाई गई थीं। साल 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल यानी डीजीएचसी का गठन किया गया था, और बाद में साल 2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन यानी जीटीए अस्तित्व में आया। हालांकि, पहाड़ी इलाकों के कई स्थानीय नेता इन व्यवस्थाओं को नाकाफी मानते आए हैं क्योंकि उनके अनुसार इन संस्थाओं को पर्याप्त अधिकार नहीं सौंपे गए थे। उनका यह भी आरोप रहा है कि ये प्रशासनिक निकाय आर्थिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह कोलकाता पर निर्भर हैं और इनके जरिए पहाड़ी अंचल के लोगों की मूल आकांक्षाओं का समाधान नहीं हो सका है।
जमीन के अधिकार और आजीविका से जुड़े बड़े सवाल
गोरखा पहचान का यह पूरा ताना-बाना सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक ही सीमित नहीं है। इन पहाड़ी क्षेत्रों में चाय बागान, पर्यटन, रोजगार के अवसर, जमीन के अधिकार और वहां काम करने वाले मजदूरों की दयनीय स्थिति भी बरसों से अत्यंत संवेदनशील मुद्दे रहे हैं। तमाम चाय बागानों के बंद होने, मजदूरी और रोजगार की किल्लत तथा भूमि अधिकारों को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार असंतोष सुलगता रहा है। इसके साथ ही, नेपाली भाषा और स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक खींचतान सामने आती रही है। अब केंद्र सरकार की ओर से स्थायी राजनीतिक राजनीतिक समाधान के वास्ते हाईलेवल कमेटी के गठन से एक नई उम्मीद जगी है कि इस दशकों पुराने विवाद को महज चुनावी वादों तक सीमित रखने के बजाय एक ठोस संवैधानिक और प्रशासनिक दिशा दी जा सकेगी। हालांकि, इस पूरी कवायद की असली परीक्षा इस कमेटी की सिफारिशों और उन्हें जमीन पर उतारने के लिए दिखाई जाने वाली राजनीतिक इच्छाशक्ति पर ही टिकी होगी।





















