तेहरान की ओर से असीम मुनीर के इस दौरे की आधिकारिक पुष्टि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई द्वारा की गई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते गतिरोध के बीच यह यात्रा कूटनीतिक हलकों में खासी चर्चा का विषय बनी हुई है। जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संवाद के रास्ते लगभग बंद हैं और अमेरिकी स्तर पर आर्थिक पाबंदियां बढ़ाने के कड़े संकेत दिए जा रहे हैं, तब इस पाकिस्तानी सैन्य दौरे के गहरे निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। अतीत की तरह क्या एक बार फिर कूटनीतिक मध्यस्थता की जमीन तैयार की जा रही है या इस बार समीकरण कुछ और हैं, इस पर विश्लेषकों की नजर टिकी हुई है।
क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के तमाम मुद्दों पर ईरानी नेतृत्व के साथ व्यापक बातचीत तय की गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा ईरान के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध लागू करने की चेतावनियों के बीच यह संवाद हो रहा है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव का स्तर इस बात से भी समझा जा सकता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल परिवहन की गतिशीलता लगभग बाधित है और बिना अनुमति गुजरने वाले पोतों को लेकर चेतावनी दी गई है। पाकिस्तानी पक्ष का यह मानना है कि इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय व्यापार, आर्थिक संकट और अमेरिका के साथ जारी तनातनी पर गंभीर मंत्रणा की जाएगी।
अमेरिका की ओर से हाल ही में उन सभी देशों को भी स्पष्ट शब्दों में आगाह किया गया है जो किसी भी रूप में तेहरान को आर्थिक राहत या सहायता प्रदान करने की कोशिश करेंगे। इन तमाम पाबंदियों के जवाब में ईरानी प्रशासन ने भी कड़े तेवर दिखाए हैं। ऐसे समय में पाकिस्तानी सेना प्रमुख की मध्यस्थता की भूमिका को लेकर संदेह भी जताया जाता रहा है क्योंकि अतीत में तेहरान की तरफ से इस्लामाबाद की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा चुके हैं और अमेरिका भी अब इस तरह के द्रोह या मध्यस्थता के प्रयासों को पहले जैसी अहमियत नहीं देता है।
मक्का समझौते के बाद क्यों बढ़ गई है तेहरान की चिंता
यह पूरा घटनाक्रम 7 अगस्त 2026 को हुए एक बड़े क्षेत्रीय रक्षा समझौते की पृष्ठभूमि में सामने आया है, जिसके तहत सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के प्रावधानों के अनुसार यदि तीनों देशों में से किसी एक पर भी कोई बाहरी आक्रमण होता है, तो उसे तीनों पर हमला मानकर सामूहिक प्रतिक्रिया दी जाएगी। इस नए गठजोड़ के सामने आने के बाद से ही ईरानी रणनीतिक हलकों में यह आशंका जताई जा रही थी कि इस व्यवस्था का उपयोग अंततः उनके खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
इसी कूटनीतिक अविश्वास को पाटने और तेहरान के मन में बैठ चुकी शंकाओं का समाधान करने के लिए इस यात्रा को बेहद आवश्यक माना जा रहा है। एक तरफ इस्लामाबाद रियासत और अंकारा के साथ मिलकर अपनी सैन्य और रक्षा साझेदारी को मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ वह अपने पड़ोसी देश ईरान के साथ भी संवाद के दरवाजे बंद नहीं करना चाहता है। इस यात्रा के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया जा सकता है कि हालिया मक्का समझौता किसी भी सूरत में ईरान को घेरने या अलग-थलग करने के लिए नहीं बनाया गया है, बल्कि इसका उद्देश्य केवल क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखना है।




















