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चुनावी राजनीति और नेतृत्व का संकट: नेहरू-गांधी परिवार के वर्चस्व से लेकर क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों तक कांग्रेस के घटते जनाधार की पूरी कहानीराजनीति
16 अग॰ 2026, 6:17 pm (1 घंटे पहले)· 2

चुनावी राजनीति और नेतृत्व का संकट: नेहरू-गांधी परिवार के वर्चस्व से लेकर क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों तक कांग्रेस के घटते जनाधार की पूरी कहानी

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 140 साल के इतिहास में 1984 की 404 सीटों से 2014 की 44 सीटों तक की गिरावट के पीछे वंशवादी नियंत्रण, तुष्टीकरण की नीतियां और बयानों की शैली प्रमुख कारण रहे हैं। शाह बानो मामले से लेकर ए. के. एंटोनी समिति की सिफारिशों की अनदेखी तक, पार्टी का घटता जनाधार आज भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दुनिया के सबसे प्राचीन राजनीतिक संगठनों में से एक है, जिसकी स्थापना लगभग 140 वर्ष पूर्व 1885 में हुई थी। अपने लंबे इतिहास के दौरान पार्टी ने देश के सामाजिक और कानूनी ढांचे को आकार देने वाले कई प्रमुख कानूनों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें सूचना का अधिकार (RTI), शिक्षा का अधिकार (RTE) और भोजन का अधिकार कानून शामिल हैं। इसके साथ ही, ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करना पार्टी की सबसे ऐतिहासिक उपलब्धियों में दर्ज रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय मतदाताओं ने निरंतर कई दशकों तक केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर पार्टी को स्पष्ट जनाधार सौंपा, जिससे देश भर में इसका निर्बाध शासन कायम रहा। हालांकि, वर्ष 1977 में पार्टी के राजनीतिक प्रभाव में पहली बार बड़ी गिरावट दर्ज की गई, और 1989 के चुनाव के बाद से इसके निरंतर कमजोर होने का सिलिसिला शुरू हो गया जो आज तक जारी है।

नेतृत्व और वक्तव्यों का चुनावी प्रभाव

पार्टी की वर्तमान सांगठनिक और चुनावी चुनौतियों का विश्लेषण करने पर कई ऐसे मूलभूत कारण सामने आते हैं, जिनका स्थायी समाधान निकाले बिना राजनीतिक वापसी का मार्ग बेहद कठिन प्रतीत होता है। हालिया राजनीतिक गतिविधियों और लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की कार्यशैली से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सार्वजनिक बयानों और भाषणों की शैली ने पार्टी के लिए चुनौतियां खड़ी की हैं। भूतकाल में भी अनुचित या विवादित टिप्पणियों के कारण उन्हें कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ा है और सार्वजनिक माफी भी मांगनी पड़ी है। एक अवसर पर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने से पहले, एक विवादित वक्तव्य के कारण उनकी लोक सभा सदस्यता रद्द होने की नौबत तक आ गई थी।

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वरिष्ठ नेताओं का यह व्यवहार अचानक उत्पन्न नहीं हुआ है, बल्कि पिछले 40 वर्षों के दौरान विभिन्न अवसरों पर नेतृत्व द्वारा लिए गए निर्णयों ने पार्टी के जनसमर्थन को धीरे-धीरे क्षीण किया है। उदाहरण के लिए, राजीव गांधी के कार्यकाल में शाह बानो मामले के दौरान लिए गए फैसले से प्रगतिशील और उदारवादी दृष्टिकोण रखने वाले मुस्लिम नागरिक पार्टी से दूर हो गए। वहीं दूसरी ओर, राम जन्मभूमि से जुड़े कानूनी और राजनीतिक विषय पर अनिश्चितता बनाए रखने के निर्णय के कारण हिंदू मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भी पार्टी से छिटक गया। इसके अतिरिक्त, वर्तमान शीर्ष नेतृत्व द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर देश की आंतरिक स्थिति पर दिए जाने वाले वक्तव्य और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा अन्य भाजपा नेताओं के विरुद्ध इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को आम जनता और तटस्थ मतदाताओं द्वारा बहुत अधिक सराहा नहीं जाता है।

वंशवादी ढांचा और सांगठनिक नियंत्रण

पार्टी के जनाधार में आई ऐतिहासिक गिरावट का एक सबसे बड़ा कारक इसकी आंतरिक संरचना में वंशवादी राजनीति का बढ़ता वर्चस्व माना जाता है। स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में यद्यपि इस पर व्यापक ध्यान केंद्रित नहीं हुआ था, परंतु कालांतर में यह धारणा मजबूत होती चली गई कि पार्टी का नियंत्रण स्थायी रूप से नेहरू-इंदिरा परिवार के हाथों में ही केंद्रित रहा है। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद सत्ता की कमान उनकी पुत्री इंदिरा गांधी के पास आई। उनके दुखद निधन के पश्चात नेतृत्व उनके पुत्र राजीव गांधी को सौंपा गया।

राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने संगठन की जिम्मेदारी संभाली। विभिन्न चुनावी असफलताओं और सांगठनिक पतन के संकेतों के बावजूद पार्टी के भीतर संरचनात्मक परिवर्तन या नए विकल्पों की तलाश की कोई ठोस सुगबुगाहट देखने को नहीं मिली। लगातार 3 लोक सभा चुनावों में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बावजूद, वर्तमान में भी सांगठनिक निर्णय और भविष्य की उम्मीदें राहुल गांधी के इर्द-गिर्द ही केंद्रित बनी हुई हैं।

तुष्टीकरण की राजनीति और ऐतिहासिक चुनावी आंकड़े

पार्टी पर अल्पसंख्यक राजनीति और तुष्टीकरण के आरोप काफी समय से लगते रहे हैं। इस नीति का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण 1986 में देखने को मिला था, जब मध्य प्रदेश की शाह बानो को उनके पति द्वारा दिए गए तलाक के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित महिला और उनके बच्चों के लिए गुजारा भत्ता तय करने का आदेश जारी किया था। हालांकि, उस समय की राजीव गांधी सरकार ने धार्मिक रूढ़िवादियों और धर्मगुरुओं के भारी दबाव में आकर संसद में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित कर दिया।

इस विधायी कदम ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के प्रभाव को समाप्त कर दिया। सरकार के इस फैसले से मुस्लिम समुदाय स्वयं दो स्पष्ट धड़ों में विभाजित हो गया, जिनमें से एक वर्ग अदालत के न्यायसंगत फैसले का समर्थन कर रहा था जबकि दूसरा वर्ग इसका विरोध कर रहा था। इस राजनीतिक फैसले का सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ा। वर्ष 1984 के लोक सभा चुनाव में 404 सीटें जीतकर ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित करने वाली कांग्रेस 1989 के आम चुनाव में सिमटकर मात्र 197 सीटों पर आ गई।

चुनावी ग्राफ: 2014 से 2024 तक का सफर

संसदीय चुनावों में पार्टी का सबसे निचला स्तर वर्ष 2014 के लोक सभा चुनाव में दर्ज किया गया। राहुल गांधी के नेतृत्व में पहली बार चुनाव लड़ते हुए पार्टी मात्र 44 सीटों पर सिमट कर रह गई। वर्ष 2019 के आम चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन में मामूली सुधार हुआ और 10 सीटों के इजाफे के साथ कुल 54 सीटें हासिल हुईं। इसके बाद वर्ष 2024 के लोक सभा चुनाव में पार्टी को 99 सीटें प्राप्त हुईं।

केंद्र में सत्ता में वापसी की रणनीति के तहत पार्टी ने विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किए और उनके सामने अपनी शर्तें सुगम बनाईं। इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना, संविधान पर खतरे का नैरेटिव निर्मित करना और मतों की चोरी के आरोप लगाना पार्टी की मुख्य प्रचार रणनीति का हिस्सा रहा। हालांकि, EVM से जुड़ी शिकायतों को लेकर जब मामला अदालत तक पहुंचा तो कानूनी जांच के बाद ये सभी दावे आधारहीन साबित हुए, जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक विमर्श में पार्टी के तर्कों की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।

आलाकमान की कार्यप्रणाली और ए. के. एंटोनी समिति की सिफारिशें

स्वतंत्रता के बाद से ही संगठन पर नेहरू-गांधी परिवार की केंद्रीय भूमिका अक्षुण्ण रही है। परिवार के सदस्य औपचारिक रूप से किसी पद पर आसीन हों या न हों, सांगठनिक और नीतिगत निर्णय उन्हीं के निर्देशानुसार लिए जाते हैं। पार्टी में 'आलाकमान' की व्यवस्था इस हद तक हावी रही है कि डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए उनके मंत्रिमंडल द्वारा लाए गए एक महत्वपूर्ण विधेयक को राहुल गांधी ने एक सार्वजनिक संवाददाता सम्मेलन में 'बकवास' बताते हुए फाड़ दिया था।

वर्ष 2014 के चुनाव में पार्टी की ऐतिहासिक पराजय के कारणों की विस्तृत समीक्षा के लिए वरिष्ठ नेता ए. के. एंटोनी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था। एंटोनी समिति ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया था कि पार्टी की एकतरफा नीतियों और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की छवि के कारण बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण प्रतिद्वंद्वी भाजपा के पक्ष में हुआ। समिति ने पार्टी की मूल नीतियों और रणनीतियों में सुधारात्मक बदलाव करने का स्पष्ट सुझाव दिया था।

हालांकि, इस रिपोर्ट की सिफारिशों पर शीर्ष नेतृत्व द्वारा कोई प्रभावकारी अमल नहीं किया गया। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण असम और पश्चिम बंगाल के हालिया विधान सभा चुनावों में देखने को मिला। असम विधान सभा की कुल 126 सीटों के मुकाबले पार्टी ने 99 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिनमें से 20 मुस्लिम उम्मीदवार थे। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में पार्टी ने 5 दर्जनों से अधिक मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट आवंटित किए। इन निर्णयों के परिणामस्वरूप हिंदू मतों का एकमुश्त ध्रुवीकरण हुआ, जिसका सीधा चुनावी लाभ प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों को प्राप्त हुआ।

सवाल-जवाब

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई थी?
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना वर्ष 1885 में हुई थी और इसे दुनिया के सबसे पुराने राजनीतिक संगठनों में गिना जाता है।
शाह बानो मामला 1986 क्या था और इसका क्या प्रभाव पड़ा?
1986 में सुप्रीम कोर्ट के गुजारा भत्ता संबंधी फैसले को पलटने के लिए राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला अधिनियम पारित किया, जिससे पार्टी के जनाधार में बड़ी गिरावट आई और 1989 के चुनाव में सीटें घटकर 197 रह गईं।
ए. के. एंटोनी समिति की रिपोर्ट किस चुनाव के बाद तैयार की गई थी?
वर्ष 2014 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के 44 सीटों पर सिमटने के बाद पराजय के कारणों की समीक्षा के लिए ए. के. एंटोनी समिति का गठन किया गया था।
2014 से 2024 तक लोक सभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहा?
कांग्रेस को 2014 में 44 सीटें, 2019 में 54 सीटें और 2024 के लोक सभा चुनाव में 99 सीटें प्राप्त हुईं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·55 मिनट पहले

वंशवादी राजनीति और वैचारिक विरोधाभास कांग्रेस के पतन के मुख्य कारण रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों पर बढ़ती निर्भरता ने इसके आधार को और कमजोर किया है। यदि पार्टी को जमीन पर वापसी करनी है, तो उसे केवल केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर रहने के बजाय अपनी स्थानीय इकाइयों को मजबूत करना होगा और स्पष्ट वैचारिक रुख अपनाना होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·55 मिनट पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह स्पष्ट है कि सांगठनिक कमजोरी और बार-बार के कानूनी विवादों ने पार्टी की न्यायिक व राजनीतिक विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुँचाया है। न्यायालयों में लंबित मानहानि के मामले और बयानों पर न्यायिक स्क्रूटनी ने पार्टी की चुनावी ऊर्जा को भटकाया है। यदि ग्रासरूट स्तर पर आंतरिक लोकतंत्र बहाल नहीं किया गया और विधिक मामलों से निपटने के लिए परिपक्व रणनीति नहीं अपनाई गई, तो क्षेत्रीय दलों पर यह अत्यधिक निर्भरता और कानूनी मोर्चों पर उलझना पार्टी के राष्ट्रीय पुनरुत्थान को और अधिक अनिश्चित बना देगा।

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