अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बदलते स्वरूप और महाशक्तियों के बीच गहराते तनाव के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ किया है कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख लीडर्स मीटिंग 2026 के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने विस्तार से रेखांकित किया कि किस तरह वाशिंगटन अब पारंपरिक वैश्विक दायित्वों से पीछे हटते हुए जानबूझकर एक अलग-थलग रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, जबकि दूसरी तरफ बीजिंग का लगातार बढ़ता प्रभाव दुनिया के सामरिक और आर्थिक समीकरणों को पूरी तरह बदल रहा है। उन्होंने आगाह किया कि इन दोनों प्रमुख ताकतों के बीच जारी खींचतान अब महज सीमा या कूटनीति तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विभिन्न देशों के आर्थिक संसाधन, उत्पादन तंत्र और तकनीकी क्षमताएं भी अब दबाव बनाने और प्रभाव जमाने के औजार में तब्दील हो चुकी हैं।
वाशिंगटन की नई दिशा और बीजिंग का आक्रामक उभार
जयशंकर के अनुसार, समकालीन वैश्विक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संयुक्त राज्य अमेरिका का अपनी अंतरराष्ट्रीय स्थिति में किया गया मौलिक फेरबदल है। उन्होंने इसे एक रणनीतिक बदलाव करार देते हुए कहा कि अमेरिका ने अपनी स्पष्ट प्राथमिकताओं के आधार पर खुद को काफी हद तक एक एकाकी शक्ति बना लिया है। यह किसी बाहरी दबाव का परिणाम नहीं बल्कि वाशिंगटन का अपना सोच-समझकर लिया गया फैसला है। इसके ठीक उलट, चीन खुद को एक विशिष्ट और असाधारण देश के रूप में पेश करते हुए वैश्विक मंच पर अपना वर्चस्व बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इन दोनों महाशक्तियों के बीच जारी तीखी रणनीतिक होड़ ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों, नीतिगत निर्णयों और वैश्विक बाजारों पर सीधा और गहरा असर डालना शुरू कर दिया है।
आर्थिक संसाधनों और आपूर्ति तंत्र को हथियार बनाने की रणनीति
विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि शक्ति संतुलन की यह होड़ केवल दो प्रतिद्वंद्वियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया का प्रत्येक देश इसकी जद में आ रहा है। आज अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति में जिस देश के पास जो भी विशिष्ट लाभ या साधन उपलब्ध है, वह उसका उपयोग अपनी शर्तों को मनवाने के लिए कर रहा है। उन्होंने व्यापारिक निर्भरता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हुए पूछा कि आपूर्ति करने वाले और सामान खरीदने वाले के बीच असली शक्ति किसके हाथ में होती है। क्या विनिर्माण और उत्पादन पर सीधा नियंत्रण ज्यादा प्रभावी है या फिर एक विशाल उपभोक्ता बाजार की हिस्सेदारी अधिक ताकत देती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर वही राष्ट्र अपने हितों की रक्षा कर पाएगा, जिसके पास जटिल आर्थिक क्षेत्रों में निर्णय लेने की स्वायत्तता, दीर्घकालिक प्रतिबद्धता और व्यापक नियंत्रण की क्षमता मौजूद होगी।
गोल्डीलॉक्स संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता की तलाश
दोनों महाशक्तियों की खींचतान के बीच दुनिया को किसी एक ध्रुव की ओर झुकने से बचाने के लिए जयशंकर ने 'गोल्डीलॉक्स' जैसी स्थिति की आवश्यकता पर बल दिया। उनका संकेत एक ऐसी संतुलित वैश्विक व्यवस्था की ओर था, जो न तो अत्यधिक टकरावपूर्ण और गर्म हो और न ही इतनी शिथिल कि कोई एक शक्ति पूरे तंत्र पर एकतरफा दबदबा कायम कर ले। इस नाजुक दौर में मध्यम और उभरती हुई ताकतें किसी एक खेमे का पिछलग्गू बनने के बजाय रणनीतिक हेजिंग का मार्ग अपना रही हैं। ये देश अपनी आर्थिक मजबूती, ऊर्जा सुरक्षा, उन्नत तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं को किसी भी अचानक आने वाले वैश्विक झटके से बचाने के लिए विभिन्न साझेदारों के साथ स्वतंत्र और व्यावहारिक रिश्ते विकसित कर रहे हैं।
उभरते देशों के लिए बहुपक्षीय सहयोग के नए अवसर
वैश्विक संस्थाओं और तौर-तरीकों में आ रहे बदलाव को देखते हुए विदेश मंत्री ने उभरती और मध्यम शक्तियों के बीच एक मजबूत तालमेल बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इन देशों को शांति, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, लचीली आपूर्ति श्रृंखला, उच्च तकनीक आधारित विनिर्माण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी, जलवायु परिवर्तन, रक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में तनाव या संघर्ष की स्थिति पैदा होती है, तो जरूरी नहीं कि दुनिया केवल महाशक्तियों के रुख का इंतजार करे। मध्यम देश अपने संसाधनों और कूटनीतिक प्रभाव को जोड़कर एक-दूसरे का समर्थन कर सकते हैं। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि पूर्ण सहयोग स्थापित करने के लिए हर एक वैश्विक मुद्दे पर शत-प्रतिशत वैचारिक सहमति की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि कुछ साझा हितों के आधार पर भी ठोस और परिणामोन्मुख साझेदारी बनाई जा सकती है।
तकनीकी विशेषज्ञता से गैर-महाशक्तियां बन रही हैं निर्णायक
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में प्रभाव जमाने के लिए किसी देश का विशाल भौगोलिक आकार होना अनिवार्य नहीं है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए जयशंकर ने आधुनिक सेमीकंडक्टर और सटीक विनिर्माण उद्योग का उदाहरण दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि वैश्विक तकनीक की रीढ़ मानी जाने वाली कई क्षमताएं पारंपरिक महाशक्तियों के पास नहीं, बल्कि मध्यम दर्जे के देशों के पास हैं। उन्नत माइक्रोचिप के विनिर्माण में ताइवान की टीएसएमसी पूरी दुनिया के लिए अपरिहार्य बन चुकी है, जबकि अत्याधुनिक चिप बनाने वाली लिथोग्राफी मशीनों के निर्माण में नीदरलैंड की एएसएमएल की भूमिका निर्णायक है। इसी प्रकार स्वास्थ्य सुरक्षा के मोर्चे पर उन्होंने जीवनरक्षक दवाओं और सक्रिय दवा सामग्री यानी एपीआई के उत्पादन को कुछ सीमित केंद्रों पर निर्भर रखने के बजाय दुनिया भर में फैलाने की वकालत की। उन्होंने याद दिलाया कि कोरोना महामारी ने किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के भारी खतरों को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया था।
क्वाड, ब्रिक्स और नए संपर्क गलियारों का विस्तार
बदलते अंतरराष्ट्रीय ढांचे में भारत की सक्रिय भागीदारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने क्वाड जैसे मंचों को मध्यम शक्तियों के बढ़ते समन्वय का स्वाभाविक परिणाम बताया। वैश्विक संपर्क और व्यापार के क्षेत्र में उन्होंने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा और नॉर्दर्न सी रूट जैसी रणनीतिक परियोजनाओं के महत्व को रेखांकित किया। ब्रिक्स के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यह ऐसा मंच है जहां विकासशील देश यह महसूस करते हैं कि उनकी सामूहिक आवाज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-अलग रहने की तुलना में कहीं अधिक वजन रखती है। इसके साथ ही उन्होंने भारत द्वारा शुरू किए गए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के गठबंधन को व्यावहारिक सहयोग के सफल वैश्विक मॉडल के रूप में पेश किया।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते की अहमियत
भारत और यूरोपीय संघ के बीच विचाराधीन मुक्त व्यापार समझौते यानी एफटीए को जयशंकर ने दोनों पक्षों के संबंधों के लिए एक वास्तविक गेम चेंजर करार दिया। उन्होंने कहा कि यह समझौता केवल आयात-निर्यात के आंकड़ों को बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे दोनों क्षेत्रों के नियामक तंत्र, उद्योग जगत और नीति निर्माता एक-दूसरे के तौर-तरीकों को गहराई से समझ सकेंगे। इससे उन्नत विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI, सेमीकंडक्टर, जीवन विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में व्यापक सहयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि AI के नियमन और विकास को लेकर भारत और यूरोप की दृष्टि में गहरी समानता है, जबकि भारत में काम कर रहे ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर दोनों अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ने वाले सबसे मजबूत सेतु बन चुके हैं।
रक्षा विनिर्माण, अंतरिक्ष और स्वच्छ ऊर्जा में नई संभावनाएं
यूरोप द्वारा अपनी अंतरिक्ष और रक्षा क्षमताओं को पुनर्जीवित करने के प्रयासों के बीच जयशंकर ने भारतीय क्षमताओं की मजबूती को सामने रखा। उन्होंने कहा कि भारत उपग्रह प्रक्षेपण और अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे के विकास में अपनी वैश्विक हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा रहा है। वहीं रक्षा क्षेत्र में भारतीय स्टार्टअप अब प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम स्थापित कर रहे हैं, जिससे भारत के रक्षा निर्यात में अभूतपूर्व तेजी आई है। स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए उन्होंने यूरोप की उन्नत तकनीक और निवेश को भारतीय बाजार की विशालता के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को गति दी जा सके।
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र में जरूरी सुधार
पुरानी वैश्विक व्यवस्था के संरक्षण में अमेरिका की भूमिका के धीमे पड़ने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक रणनीतिक शून्य पैदा हुआ है। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक कद वाले राष्ट्रों को अब आगे बढ़कर इस खाली जगह को भरना होगा और अधिक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां उठानी होंगी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर बात करते हुए कहा कि संस्था को नकारना समाधान नहीं है, बल्कि समय की मांग के अनुरूप इसमें संरचनात्मक सुधार करना अनिवार्य है। एक सच्चे बहुध्रुवीय विश्व में एकतरफा खेमेबंदी की राजनीति कमजोर हो रही है, और ग्लोबल साउथ तथा ग्लोबल नॉर्थ दोनों के राष्ट्र अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं के जोखिम को कम करने के लिए व्यावहारिक आधार पर नए गठबंधन तैयार कर रहे हैं।





















