भारतीय चुनावी इतिहास में उत्तर प्रदेश की इटावा लोकसभा सीट का साल 1991 का उपचुनाव एक असाधारण मोड़ माना जाता है। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम जब चुनावी राजनीति में उतरे, तब उन्होंने सामाजिक चेतना के आंदोलन को सीधे सत्ता की राजनीति से जोड़ने का संकल्प लिया था। पंजाब के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 को जन्मे कांशीराम ने अपने लंबे सामाजिक संघर्ष के बाद उत्तर प्रदेश को अपनी मुख्य राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। इटावा वह रणनीतिक रणक्षेत्र बना, जहां की चुनावी जीत ने कांशीराम को पहली बार देश की सर्वोच्च पंचायत यानी लोकसभा तक पहुंचाया और भारतीय लोकतंत्र में बहुजन राजनीति की नई इबारत लिखी।
समाजवादी गढ़ में 48 प्रत्याशियों के बीच कांशीराम का सियासी दांव
साल 1991 में जब इटावा लोकसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई, तब इस क्षेत्र को समाजवादी विचारधारा और मुलायम सिंह यादव की राजनीति का सबसे मजबूत किला माना जाता था। इस बहुचर्चित चुनावी मुकाबले में कुल 48 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे। बहुजन समाज पार्टी के बैनर तले मैदान में उतरे कांशीराम ने सघन जनसंपर्क अभियान चलाया। मतगणना के दिन जब परिणाम सामने आए, तो कांशीराम ने 1,44,290 मत हासिल कर शानदार विजय दर्ज की। उनके सबसे नजदीकी प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार लाल सिंह वर्मा रहे, जिन्हें कांशीराम के मुकाबले लगभग 22 हजार वोट कम मिले। इस जीत के साथ ही कांशीराम पहली बार संसद सदस्य बनकर लोकसभा पहुंचे।
अनुपम होटल का कमरा नंबर 6 और मुलायम सिंह यादव का संदेश
इटावा के चुनावी अभियान के दौरान कांशीराम ने किसी आलीशान ठिकाने के बजाय स्थानीय अनुपम होटल में डेरा डाला था। वह पूरे चुनाव प्रचार के दौरान लगभग एक महीने तक इसी होटल के कमरा नंबर 6 में ठहरे रहे। चुनाव की गहमागहमी के बीच मुलायम सिंह यादव लगातार होटल में फोन कर कांशीराम का हालचाल लेते रहते थे। मुलायम सिंह यादव ने उस दौरान होटल प्रबंधन को कड़े निर्देश दिए थे कि कांशीराम उनके विशेष मेहमान हैं और उन्हें किसी भी तरह की असुविधा नहीं होनी चाहिए। इस आतिथ्य सत्कार ने दोनों बड़े नेताओं के बीच एक अनकहे राजनीतिक सम्मान और संवाद की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी।
इटावा के सामाजिक गणित में छिपा था मुलायम का मौन सहयोग
इटावा की इस जीत के पीछे केवल कांशीराम का व्यक्तिगत प्रभाव ही नहीं था, बल्कि उत्तर प्रदेश की तेजी से बदलती सामाजिक और चुनावी बुनावट भी शामिल थी। मुलायम सिंह यादव खुद इटावा की माटी से निकलकर प्रदेश की राजनीति में यादव और मुस्लिम समीकरण के जरिए समाजवादी धारा को मजबूत कर रहे थे। उस उपचुनाव में मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाने वाले राम सिंह शाक्य जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, जिन्हें 82,624 मत प्राप्त हुए थे। चुनावी रणनीतिकारों के अनुसार, इस त्रिकोणीय और बहुकोणीय मुकाबले के समीकरणों ने भारतीय जनता पार्टी को रोकने और कांशीराम की राह को आसान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। यहीं से कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के बीच राजनीतिक समीकरणों का एक नया दौर शुरू हुआ।
मिले मुलायम-कांशीराम और 1993 के ऐतिहासिक गठबंधन की शुरुआत
साल 1991 के इस उपचुनाव के बाद कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के बीच आपसी तालमेल तेजी से मजबूत हुआ। दोनों नेताओं का सामाजिक जनाधार अलग-अलग वर्गों में बंटा था, फिर भी दोनों इस बात पर सहमत थे कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी राष्ट्रीय ताकतों से मुकाबला करने के लिए दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का साझा मंच जरूरी है। कांशीराम जहां दलित समाज को निर्णायक राजनीतिक शक्ति बनाने के मिशन पर थे, वहीं मुलायम सिंह यादव पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर चुके थे। इसी समझ ने आगे चलकर 'मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम' के चर्चित राजनीतिक नारे को जन्म दिया। इस एकजुटता ने राम मंदिर आंदोलन के चरम दौर में भारतीय जनता पार्टी के सामने एक अभेद्य चुनावी चुनौती खड़ी कर दी।
1993 की साझा सरकार से 1995 के स्टेट गेस्ट हाउस कांड तक का सफर
इटावा से शुरू हुई यह राजनीतिक समझदारी साल 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में औपचारिक चुनावी गठबंधन में तब्दील हो गई। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा और दोनों दल मिलकर सरकार बनाने में कामयाब रहे। इस समझौते के तहत मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और बहुजन समाज पार्टी ने बाहर से सरकार को समर्थन दिया। हालांकि, यह सियासी दोस्ती बहुत लंबी नहीं चल सकी। 2 जून 1995 को लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती के साथ घटित अप्रिय घटना ने दोनों दलों के रिश्तों को पूरी तरह तार-तार कर दिया। बहुजन समाज पार्टी ने तत्काल मुलायम सिंह यादव सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। इस घटना के बाद दोनों दलों के बीच दशकों तक चलने वाली गहरी राजनीतिक शत्रुता की शुरुआत हो गई।
साल 2019 में अखिलेश और मायावती का नया प्रयोग और अलगाव
गेस्ट हाउस कांड के लगभग ढाई दशक बाद इतिहास ने खुद को एक बार फिर दोहराने की कोशिश की। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती ने पुरानी कड़वाहट भुलाकर हाथ मिलाया और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक बड़ा गठबंधन तैयार किया। उस समय माना गया कि दलित, यादव और मुस्लिम मतों का यह गठजोड़ विरोधियों पर भारी पड़ेगा। चुनावी मंचों पर अखिलेश यादव ने मायावती के प्रति पूरा आदर और सम्मान दिखाया। हालांकि, चुनाव नतीजों ने दोनों दलों के बीच असमान स्थिति पैदा कर दी। बहुजन समाज पार्टी को इस गठबंधन का सीधा फायदा मिला और उसने उत्तर प्रदेश में 10 लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी महज 5 सीटों पर ही सिमट कर रह गई। नतीजों के बाद मायावती ने समाजवादी पार्टी के वोट ट्रांसफर न हो पाने पर सार्वजनिक सवाल खड़े किए। इसके साथ ही दोनों दलों के रिश्तों में फिर खटास आ गई और यह गठबंधन भी टूट गया। इस तरह 1991 में इटावा की धरती से कांशीराम द्वारा शुरू की गई गठबंधन की यह सियासी धारा समय के साथ अनेक उतार-चढ़ाव देखती रही।



















