देश के दो राज्यों से आए उपचुनाव नतीजों ने बीजेपी को हिला दिया है। बिहार की बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बीजेपी को 19,324 वोटों से मात दी, तो उधर मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। साथ ही झारखंड और कर्नाटक में भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया है।
बांकीपुर में प्रशांत किशोर ने बीजेपी के गढ़ में सेंध लगाई
बिहार की सियासत में सबसे चर्चा का विषय बना बांकीपुर उपचुनाव, जहां प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बीजेपी को उसकी सबसे मजबूत सीट पर 19,324 मतों के अंतर से हरा दिया। पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी का खाता तक नहीं खुल पाया था, लेकिन बांकीपुर से बीजेपी विधायक नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई इस सीट को प्रशांत किशोर ने अपने नाम कर लिया। इस मुकाबले में आरजेडी तीसरे स्थान पर खिसक गई, फिर भी आरजेडी नेता इस नतीजे से संतुष्ट नजर आए क्योंकि उनके मुताबिक बीजेपी का घमंड टूट गया।
असल कहानी सिर्फ जीत-हार की नहीं है। बड़ी बात यह है कि प्रशांत किशोर ने बीजेपी को ठीक उसी सीट पर पटखनी दी है, जिसे पार्टी अपनी सबसे पक्की सीट मानती थी। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की थी, जो यहां से लगातार पांच बार चुनाव जीत चुके थे। ऐसी मजबूत गढ़ वाली सीट का हाथ से निकलना बीजेपी संगठन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
बीजेपी ने पीके को हल्के में क्यों लिया था
बीजेपी के भीतर प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी को गंभीरता से न लेने के पीछे ठोस वजहें थीं। पिछले साल जन सुराज पार्टी ने बिहार विधानसभा की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। खुद बांकीपुर सीट पर भी उस चुनाव में प्रशांत किशोर को 5 प्रतिशत से भी कम वोट मिले थे। यानी एक साल के भीतर ही तस्वीर पूरी तरह बदल गई।
इस उपचुनाव में बीजेपी ने भी पूरी ताकत झोंकी थी और प्रचार के लिए 40 स्टार प्रचारकों को मैदान में उतारा था। इसके जवाब में प्रशांत किशोर ने करीब 250 पेशेवर कार्यकर्ताओं की मदद से गली-मोहल्ले तक जाकर जमीनी स्तर पर चुनाव लड़ा। कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने बीजेपी की हर कमजोरी को बारीकी से पकड़ा और उसका इस्तेमाल किया, चाहे वह सम्राट चौधरी की सार्वजनिक छवि हो, स्थानीय नेताओं का अहंकार हो या फिर कार्यकर्ताओं के भीतर पनप रही नाराजगी।
इस जीत ने बांकीपुर सीट पर पार्टी, जाति और नेता जैसे परंपरागत चुनावी समीकरणों को पूरी तरह पलट दिया। इस नतीजे से बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं, वहीं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
दतिया में कांग्रेस की वापसी, नरोत्तम मिश्रा की सीट फिर फिसली
बीजेपी को दूसरा बड़ा झटका मध्य प्रदेश से मिला। हालांकि गुजरात की मांजलपुर सीट पर पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की, लेकिन मध्य प्रदेश की दतिया सीट उपचुनाव में हाथ से निकल गई। यहां कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6016 वोटों के अंतर से हराया। गौर करने वाली बात यह है कि विधानसभा चुनाव में भी यह सीट कांग्रेस के खाते में गई थी।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेन्द्र भारती ने तत्कालीन मंत्री नरोत्तम मिश्रा को साढ़े सात हजार से अधिक वोटों से हराया था। लेकिन एक पुराने मामले में अदालत ने राजेन्द्र भारती को तीन साल की सजा सुनाई, जिसके चलते उनकी विधानसभा सदस्यता खत्म हो गई और यह सीट खाली हुई।
दिलचस्प यह है कि दतिया के जिस वार्ड में नरोत्तम मिश्रा का घर है, उसी वार्ड में भी कांग्रेस को बीजेपी से 27 वोट ज्यादा मिले। दतिया की यह हार इसी बात की मिसाल बताई जा रही है कि कैसे बीजेपी ने खुद ही अपनी हार का रास्ता तैयार किया। पहले यह सीट नरोत्तम मिश्रा की थी, फिर वे कांग्रेस से चुनाव हार गए और मंत्री पद भी गंवा बैठे। इसके बाद उन्हें उपचुनाव लड़ने की उम्मीद बंधी और उनके समर्थक भी पूरे उत्साह में आ गए, लेकिन बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इस फैसले पर समर्थकों ने विरोध जताया और खुद नरोत्तम मिश्रा भावुक होकर रो पड़े, फिर भी पार्टी के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ा। अब कहा जा रहा है कि नरोत्तम मिश्रा के आंसुओं ने ही चुपचाप इस हार की जमीन तैयार कर दी। आने वाले दिनों में नरोत्तम मिश्रा अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे और मध्य प्रदेश बीजेपी के नेताओं को इसका हिसाब देना पड़ सकता है।
झारखंड में पेपर लीक के आरोपों पर छात्रों का धरना
राजनीतिक उलटफेर के बीच झारखंड और कर्नाटक में भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों का गुस्सा भी बड़ा मुद्दा बन गया है। झारखंड लोक सेवा आयोग यानी जेपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में पेपर लीक होने और ओएमआर शीट में छेड़छाड़ के गंभीर आरोप लगे हैं। छात्रों का कहना है कि कम अंक पाने वाले कई उम्मीदवारों को भी चुन लिया गया, जिनमें हरियाणा और यूपी के करीब 400 उम्मीदवार भी शामिल हैं जो इस परीक्षा में पास घोषित किए गए।
इसी गड़बड़ी के विरोध में छात्र 29 जुलाई से लगातार धरने पर बैठे हैं। उनकी मुख्य मांग है कि यह परीक्षा रद्द की जाए। इसके अलावा छात्र यह भी चाहते हैं कि जेपीएससी, जेएसएससी और अन्य एजेंसियों द्वारा कराई गई सभी परीक्षाओं की जांच सीबीआई से कराई जाए और पेपर लीक के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो।
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने वीडियो कॉल के जरिए आंदोलनकारी छात्रों से बातचीत की और उनकी मांगों का समर्थन किया। अभिजीत दिपके ने बताया कि तबीयत खराब होने की वजह से वे फिलहाल रांची नहीं पहुंच पा रहे हैं, लेकिन सेहत सुधरते ही वे रांची जाएंगे।
झारखंड और दिल्ली के प्रोटेस्ट में एक बड़ा फर्क साफ नजर आता है। दिल्ली में केंद्र सरकार ने खुद माना था कि पेपर लीक हुआ है, जबकि झारखंड में जेपीएससी परीक्षा को लेकर अभी जांच जारी ही है। दिल्ली मामले में सीबीआई ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, लेकिन रांची में छात्र सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं जबकि राज्य सरकार अभी इसके लिए राजी नहीं है। दिल्ली के प्रोटेस्ट में शामिल रही सीजेपी झारखंड के आंदोलन में कहीं नजर नहीं आई। दिल्ली में लगभग सभी बीजेपी विरोधी दलों ने धरने को समर्थन दिया था, जबकि झारखंड में फिलहाल सिर्फ बीजेपी ही इस आंदोलन के समर्थन में खड़ी दिख रही है।
कर्नाटक में वेटरनरी भर्ती घोटाले पर सियासत तेज
पेपर लीक का मुद्दा कर्नाटक में भी उतना ही गरमाया हुआ है। कर्नाटक में वेटरनरी अफसरों की भर्ती में गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। कर्नाटक लोक सेवा आयोग ने 17 जुलाई को वेटरनरी अफसर के 400 पदों के लिए चुने गए उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। इसके बाद परीक्षा में शामिल रहे कुछ उम्मीदवारों ने सबूतों के साथ दावा किया कि 80 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक रिश्वत लेकर भर्ती की गई और इसके लिए ओएमआर शीट में हेरफेर किया गया।
यह मामला अभी हाईकोर्ट में विचाराधीन है। सबूत देखने के बाद हाईकोर्ट ने भी इसे दिनदहाड़े हुई धोखाधड़ी करार दिया, जिसके बाद सरकार को भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगानी पड़ी। जांच के लिए एसआईटी का गठन किया जा चुका है और हाईकोर्ट ने 6 अगस्त तक इससे रिपोर्ट मांगी है। कुछ छात्रों ने इस मामले में बिचौलियों का स्टिंग ऑपरेशन भी किया और इससे जुड़े ऑडियो, वीडियो रिकॉर्डिंग और तस्वीरें सार्वजनिक कीं। पुलिस अब तक इस मामले में दो बिचौलियों, सिकंदर चौधरी और आरिफ मोहम्मद मुल्ला, को गिरफ्तार कर चुकी है।
इसी बीच कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे के एक बयान ने विवाद को और भड़का दिया। प्रियांक खरगे ने कहा कि पहले छात्रों को धरने पर बैठना होगा, 25 दिन तक भूखे रहना होगा, फिर लाठीचार्ज होगा और तभी उनके इस्तीफे की बारी आएगी, जैसा धर्मेंद्र प्रधान ने दिया था। इस बयान को बेहद गैर-जिम्मेदाराना माना जा रहा है क्योंकि इसमें दिल्ली में हुए छात्र प्रोटेस्ट का मजाक उड़ाया गया लगता है। पेपर लीक और उस पर हो रहा विरोध, दोनों ही संवेदनशील मुद्दे हैं जिन्हें हल्के में लेना उचित नहीं माना जा रहा।


















