बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव के रुझानों ने अचानक गरमाहट ला दी है। दोपहर करीब दो बजे सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, जनसुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर इस सीट पर आठ हजार से अधिक वोटों की मजबूत बढ़त बनाए हुए हैं। यह विधानसभा क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के विधायक पद से इस्तीफा देने के बाद खाली हुआ था। शुरुआती रुझानों में भाजपा के पिछड़ने को विपक्षी दल सत्ताधारी गठबंधन के लिए एक करारा झटका बता रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि यह सीट नितिन नवीन और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी दोनों के राजनीतिक प्रभाव के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी, और अपने नेतृत्व की पहली बड़ी परीक्षा में ही वे मुश्किल में दिख रहे हैं। हालांकि, चुनावी इतिहास यह बताता है कि किसी एक उपचुनाव के नतीजों या रुझानों के आधार पर विपक्षी दलों को बहुत ज्यादा उत्साहित होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भाजपा अतीत में ऐसे झटकों से उबरकर कई गुना ताकत के साथ वापसी करने का रिकॉर्ड बना चुकी है।
बांकीपुर में प्रतिष्ठा की लड़ाई और विपक्षी दावे
बांकीपुर सीट को पारंपरिक रूप से भाजपा और नितिन नवीन का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। नितिन नवीन इस निर्वाचन क्षेत्र से लगातार पांच बार विधायक चुने गए हैं। हाल ही में जब उन्हें भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, उसके बाद वे संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। राज्यसभा सदस्य बनने के पश्चात उन्होंने बांकीपुर विधानसभा सीट से अपना इस्तीफा दे दिया था, जिससे यहां उपचुनाव की स्थिति बनी। दूसरी तरफ, राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक कमान संभालने के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में यह भाजपा के लिए पहला सबसे बड़ा चुनावी इम्तिहान था। यही वजह है कि विपक्षी खेमा इस सीट पर आए शुरुआती रुझानों को सीधे तौर पर भाजपा के शीर्ष प्रादेशिक और केंद्रीय नेतृत्व की विफलता के रूप में प्रचारित कर रहा है। लेकिन चुनावी रणनीतियों और इतिहास का विश्लेषण करने वाले मानते हैं कि उपचुनावों के परिणाम स्थानीय परिस्थितियों और कम मतदान से प्रभावित हो सकते हैं, जिनका असर मुख्य चुनावों में पूरी तरह बदल जाता है।
2018 का गोरखपुर उपचुनाव और सत्ता का समीकरण
उपचुनाव में मिली किसी हार या बढ़त को अंतिम मानने की भूल से बचने के लिए उत्तर प्रदेश के गोरखपुर संसदीय सीट के 2018 के ऐतिहासिक उपचुनाव का उदाहरण काफी अहम है। उत्तर प्रदेश का गोरखपुर शहर राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अभेद्य राजनीतिक गढ़ माना जाता है। यहीं प्रसिद्ध नाथ संप्रदाय का मुख्य केंद्र गोरखनाथ मठ स्थित है, जो इस पूरे क्षेत्र की राजनीति को गहराई से प्रभावित करता है। योगी आदित्यनाथ खुद इस प्रतिष्ठित पीठ के महंत हैं। 2017 में जब भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल किया, तब योगी आदित्यनाथ को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने से पहले योगी आदित्यनाथ गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया, जिसके चलते मार्च 2018 में गोरखपुर संसदीय सीट पर उपचुनाव कराया गया।
यह वही गोरखपुर सीट थी, जिस पर पिछले करीब सात चुनावों से योगी आदित्यनाथ और उनसे पहले उनके पूज्य गुरु योगी अवैद्यनाथ लगातार जीत दर्ज करते आ रहे थे। इस सीट पर मठ और भाजपा का दबदबा अटूट माना जाता था, लेकिन 2018 के उपचुनाव में राजनीति का वह स्थापित सिलसिला अचानक टूट गया। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने प्रवीण कुमार निषाद को अपना उम्मीदवार बनाया था, जिन्हें बहुजन समाज पार्टी ने भी अपना पूर्ण समर्थन दिया। सपा और बसपा के इस अप्रत्याशित रणनीतिक गठजोड़ ने भाजपा को चौंका दिया। जब परिणाम घोषित हुए, तो सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने भाजपा के उम्मीदवार उपेंद्र शुक्ला को 21 हजार से भी अधिक मतों के अंतर से पराजित कर दिया। उस समय भी तमाम राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्य में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका करार दिया था।
2019 के आम चुनाव में बाजी पलट जाने का सबक
गोरखपुर उपचुनाव के नतीजों से उत्साहित होकर 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने औपचारिक गठबंधन कर लिया। भारतीय राजनीति के इतिहास में यह एक अत्यंत दुर्लभ मोड़ था, जब बसपा प्रमुख मायावती ने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में पहली बार सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के साथ एक ही मंच साझा किया। विपक्षी खेमे को भरोसा था कि 2018 के गोरखपुर मॉडल को पूरे उत्तर प्रदेश में दोहराकर वे भाजपा का सूपड़ा साफ कर देंगे। लेकिन जब 2019 के आम चुनाव के नतीजे सामने आए, तो परिणाम विपक्षी अनुमानों के बिल्कुल विपरीत रहे।
सपा और बसपा के विशाल सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को राज्य में कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा। उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने अकेले अपने दम पर 62 सीटों पर शानदार जीत हासिल की। वहीं उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल सोनेवाल ने दो सीटें जीतीं। दूसरी ओर, गठबंधन के बावजूद बहुजन समाज पार्टी को 10 और समाजवादी पार्टी को महज पांच सीटों से संतोष करना पड़ा। यहां तक कि कांग्रेस केवल एक सीट ही बचा सकी और उसके तात्कालिक अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पारंपरिक सीट अमेठी से चुनाव हार गए। सबसे दिलचस्प बदलाव खुद गोरखपुर सीट पर देखने को मिला, जहां भाजपा प्रत्याशी रवि किशन ने जबरदस्त वापसी करते हुए सपा उम्मीदवार रामभूवन निषाद को तीन लाख से अधिक वोटों के भारी-भरकम अंतर से धूल चटा दी। इसलिए, बांकीपुर के शुरुआती रुझानों को देखकर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।


















