बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने एक नया और बेहद दिलचस्प मोड़ ले लिया है, जहां राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। एक तरफ जहां नामांकन के आखिरी दिन पटना की सड़कों पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपना शक्ति प्रदर्शन किया और भारी भीड़ जुटाई, वहीं दूसरी तरफ राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का कोई साथ नहीं मिला। चुनाव प्रचार के सबसे अहम समय में तेजस्वी यादव का विदेश यात्रा पर चले जाना यह दर्शाता है कि राजद के भीतर रणनीतिक रूप से कितनी बड़ी चूक हो रही है। उनकी इस हड़बड़ी और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर उठ रहे सवालों ने राजद के कार्यकर्ताओं को निराश कर दिया है और बांकीपुर जैसी महत्वपूर्ण सीट पर पार्टी की उम्मीदवार को पूरी तरह से राम भरोसे छोड़ दिया गया है। बांकीपुर महज एक साधारण सीट नहीं है, बल्कि यह राजधानी पटना का शहरी हृदय है, जहां जीत हासिल करना किसी भी दल के लिए प्रतिष्ठा का सवाल होता है। ऐसे महत्वपूर्ण समय पर सेनापति का मैदान छोड़कर चले जाना पार्टी के मनोबल को बुरी तरह तोड़ रहा है।
नामांकन के दिन शक्ति प्रदर्शन और एक चौंकाने वाली गिरफ्तारी
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए नामांकन का अंतिम दिन बेहद नाटकीय और राजनीतिक सरगर्मियों से भरा रहा। इस दौरान तीन प्रमुख दलों के उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत का जोरदार प्रदर्शन किया, जबकि चौथे उम्मीदवार से जुड़ी एक घटना ने पूरे राज्य को चौंका दिया। जन सुराज पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अपने उम्मीदवार के समर्थन में पूरे बिहार से कार्यकर्ताओं को पटना पहुंचने की खुली अपील की थी। उनकी इस अपील का असर यह हुआ कि सड़कों पर एक विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा, जिसने राजधानी के यातायात को रोक दिया और एक कड़ा राजनीतिक संदेश दिया। प्रशांत किशोर हाल ही में अपने अभियान को एक राजनीतिक दल में बदल चुके हैं और वह बांकीपुर को अपनी संगठनात्मक क्षमता साबित करने के लिए एक लॉन्चपैड के रूप में देख रहे हैं। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी नीरज सिन्हा के समर्थन में भले ही मुख्य रूप से पटना के स्थानीय समर्थक मौजूद थे, लेकिन उनके साथ पार्टी के कई दिग्गज और बड़े नेता सड़क पर उतरे, जिससे उनका पलड़ा भी भारी नजर आया। इन दोनों उम्मीदवारों की भीड़ और ताकत को देखते हुए किसी को भी कमतर आंकना एक बड़ी राजनीतिक भूल साबित हो सकती है।
इसके ठीक विपरीत, जनशक्ति जनता दल की उम्मीदवार वीणा मानवी के साथ एक बेहद चौंकाने वाला वाकया हुआ। नामांकन का पर्चा पूरे आत्मविश्वास के साथ दाखिल करने के तुरंत बाद ही स्थानीय पुलिस ने उन्हें किसी पुराने फर्जीवाड़े के मामले में गिरफ्तार कर लिया, जिससे चुनावी माहौल में अचानक सनसनी फैल गई। इन सबके बीच राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता अपनी पार्टी की सीमित क्षमता और स्थानीय समर्थकों की भीड़ के साथ नामांकन दाखिल करने पहुंचीं। इस खास मौके पर उन्हें अपने शीर्ष नेता तेजस्वी यादव की कमी सबसे ज्यादा खली, जो इस महत्वपूर्ण दिन पर नदारद रहे। बिना किसी बड़े चेहरे के उनका यह नामांकन बेहद फीका साबित हुआ, जिसने राजद की चुनावी तैयारियों की पोल खोल कर रख दी।
लोकसभा की मामूली जीत और 2025 की ऐतिहासिक हार
तेजस्वी यादव की राजनीतिक कार्यशैली में हमेशा से एक अजीब सी हड़बड़ी देखने को मिली है, जिसका खामियाजा पार्टी को हालिया चुनावों में उठाना पड़ा है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों में राजद ने चार सीटें जीतकर लंबे समय से चले आ रहे अपने चुनावी सूखे को खत्म किया था। इस छोटी सी सफलता ने तेजस्वी यादव के आत्मविश्वास को इस कदर बढ़ा दिया कि उन्होंने इसे अपने लिए मुख्यमंत्री पद का जनादेश मान लिया। उन्होंने बिना किसी ठोस जमीनी रणनीति के 2025 के विधानसभा चुनावों के लिए ताबड़तोड़ लोकलुभावन वादों की झड़ी लगा दी। मुख्यमंत्री बनने की अपनी अति-महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए उन्होंने लोकसभा चुनाव खत्म होते ही बिहार के तमाम जिलों का तूफानी दौरा शुरू कर दिया, और खुद को एक समर्पित जनसेवक के रूप में पेश करने की कोशिश की।
उन्होंने महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए हर महीने 2500 रुपये देने की घोषणा की, जिसे बाद में चुनाव नजदीक आते-आते एकमुश्त 30 हजार रुपये सालाना देने के भारी-भरकम वादे में बदल दिया गया। इसके अलावा, उन्होंने बिहार के हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने, 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली प्रदान करने और वृद्धावस्था पेंशन की राशि बढ़ाने जैसे कई बड़े ऐलान किए। तेजस्वी ने ये सारी घोषणाएं उस वक्त कीं जब सत्ताधारी सरकार और मुख्यमंत्री पूरी तरह शांत बैठे थे। तेजस्वी को लगा कि उन्होंने इन वादों के जरिए एक बड़ी लहर पैदा कर दी है, लेकिन जब चुनाव का सही समय आया, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेहद सधे हुए अंदाज में और पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए इन्हीं योजनाओं की काट पेश कर दी। आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले नीतीश सरकार ने अपने कल्याणकारी कदमों से राजद के तमाम वादों पर पानी फेर दिया। इसके बाद खीझ में आकर तेजस्वी ने सरकार को 'नकलची' तक कह डाला। इस पूरी राजनीतिक जल्दबाजी का नतीजा यह हुआ कि 2020 के विधानसभा चुनाव में 75 सीटें जीतने वाली राजद 2025 आते-आते महज 25 सीटों पर सिमट कर रह गई, और उनके नेतृत्व वाला पूरा महागठबंधन सिर्फ 35 सीटों के आंकड़े तक ही पहुंच सका।
नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी के लिए संवैधानिक हड़बड़ी
विधानसभा चुनाव में मिली इस करारी और ऐतिहासिक हार के बाद राजद को गहराई से आत्ममंथन करने की जरूरत थी। किसी भी परिपक्व नेता से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी रणनीतिक कमियों पर विचार करेगा। लेकिन तेजस्वी यादव का ध्यान सिर्फ इस बात पर केंद्रित था कि किसी भी तरह से उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी हासिल हो जाए। चुनाव में जीत और हार लोकतंत्र का एक स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन महज 35 सीटों पर सिमटने के बाद भी तेजस्वी के भीतर नेता प्रतिपक्ष बनने की जो बेचैनी दिखी, वह उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाती है। नेता प्रतिपक्ष का पद केवल एक प्रतीकात्मक पद नहीं है; इसके साथ कैबिनेट मंत्री का दर्जा, राजधानी में एक शानदार सरकारी बंगला, बड़ा कर्मचारी वर्ग और महत्वपूर्ण राज्य नियुक्तियों में एक अहम भूमिका जुड़ी होती है। राजद के लिए सत्ता का यह आखिरी आधिकारिक मंच बचा था।
उनका अधैर्य इस कदर हावी था कि नई विधानसभा के गठन से पहले और नवनिर्वाचित विधायकों के शपथ ग्रहण से पहले ही उन्होंने आनन-फानन में राजद विधायक दल की जल्दबाजी में बैठक बुला ली। इस बैठक में उन्होंने खुद को नेता प्रतिपक्ष चुने जाने का प्रस्ताव पारित करवा लिया, जबकि नई सरकार का गठन भी पूरी तरह से नहीं हुआ था। तेजस्वी के लिए यह कुर्सी हासिल करना इसलिए संभव हो पाया क्योंकि राजद के पास ठीक 25 विधायक थे, जो इस संवैधानिक पद को प्राप्त करने के लिए सदन के नियमों के अनुसार न्यूनतम आवश्यक संख्या है। हालांकि, उनकी इस हड़बड़ी का फायदा एनडीए ने बहुत ही शातिर तरीके से उठाया। एनडीए ने ऐसा राजनीतिक चक्रव्यूह रचा कि तेजस्वी की यह कुर्सी अब हमेशा तलवार की धार पर रहती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण राज्यसभा चुनाव के दौरान देखने को मिला, जब राजद के अपने ही विधायक फैसल रहमान ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर वोट नहीं किया, जिसका सीधा लाभ एनडीए के उम्मीदवारों को गया। इस खुली और स्पष्ट बगावत के बावजूद तेजस्वी यादव अपने विधायक के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। उन्हें अच्छी तरह से पता है कि अगर उन्होंने फैसल रहमान को निलंबित या निष्कासित किया, तो राजद के विधायकों की संख्या 25 से नीचे गिर जाएगी और इसी के साथ बिना किसी देरी के उनकी नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी भी हमेशा के लिए छिन जाएगी।
विदेशी सैर-सपाटे के लिए दशकों पुरानी पार्टी परंपरा को तोड़ना
राजद के राजनीतिक इतिहास में 5 जुलाई का दिन सबसे ज्यादा अहमियत रखता है। इसी दिन इस पार्टी की स्थापना हुई थी, और तब से लेकर आज तक हर साल इस मौके पर एक बहुत बड़ा आयोजन किया जाता रहा है। यह वह दिन होता है जब पूरे राज्य के सुदूर गांवों से पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता पटना में इकट्ठा होते हैं और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने समर्थकों को आगे की राजनीतिक रणनीतियों और योजनाओं से अवगत कराता है। यह कैडर-आधारित पार्टी के लिए संजीवनी का काम करता है। यह परंपरा इतनी गहरी और मजबूत थी कि जब राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला के मामले में लंबे समय तक जेल में बंद थे, तब भी पार्टी ने इस स्थापना दिवस समारोह को पूरी भव्यता और जोश के साथ मनाया था।
लेकिन इस बार तेजस्वी यादव ने अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के लिए पार्टी की इस दशकों पुरानी और ऐतिहासिक परंपरा को एक झटके में तोड़ दिया। संगठन के स्तर पर ऐसी कोई वित्तीय या राजनीतिक मजबूरी नहीं थी कि इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम को रद्द किया जाए, बल्कि इस परंपरा को तोड़ने की एकमात्र वजह तेजस्वी यादव की विदेश भ्रमण पर जाने की असीम बेचैनी थी। अपने विदेशी दौरे को तरजीह देते हुए उन्होंने स्थापना दिवस की औपचारिकता को वास्तविक तारीख से पूरे चार दिन पहले ही आनन-फानन में निपटा लिया और फ्लाइट पकड़कर विदेश रवाना हो गए। इस दौरान उन्हें इस बात का जरा भी ख्याल नहीं आया कि राज्य में बांकीपुर जैसी महत्वपूर्ण सीट पर विधानसभा का उपचुनाव हो रहा है, जहां 2025 के चुनाव में राजद दूसरे नंबर पर रही थी। अब पार्टी के विश्वस्त सूत्रों से यह जानकारी मिल रही है कि वह 24 जुलाई को अपनी विदेश यात्रा से भारत लौटेंगे। उनके वापस आने के बाद उपचुनाव के प्रचार के लिए मुश्किल से दो या तीन दिन का समय ही बचेगा। इतने कम समय में वह जनता के बीच जाकर क्या राजनीतिक संदेश दे पाएंगे, यह एक बड़ा सवाल है। एक ऐसे समय में जब कार्यकर्ताओं को अपने सेनापति की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तेजस्वी का यह रवैया साबित करता है कि वह पार्टी की जमीनी लड़ाई लड़ने के बजाय अपनी सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि चुनाव मैदान में डटी उनकी उम्मीदवार रेखा गुप्ता पूरी तरह से राम भरोसे हैं।
लगातार घटता जनाधार और अति उत्साह का खामियाजा
तेजस्वी यादव का अब तक का राजनीतिक सफर इस बात का स्पष्ट गवाह है कि वह हमेशा हड़बड़ी में फैसले लेते हैं, जिसकी वाजिब वजह भी उनके पिछले राजनीतिक अनुभवों में ही छिपी है। उनकी राजनीतिक शुरुआत बेहद शानदार रही थी। साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने नीतीश कुमार के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में राजद ने शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य में सर्वाधिक 80 सीटें हासिल की थीं। यह वही ऐतिहासिक चुनाव था, जब तेजस्वी यादव और उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव ने मुख्यधारा की सक्रिय राजनीति में अपनी सफल एंट्री की थी। तब ऐसा लग रहा था कि राजद एक नए युग में प्रवेश कर रही है।
इसके बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में राजद ने पूरी तरह से तेजस्वी के अकेले नेतृत्व में चुनाव लड़ा और तब भी पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 2015 के मुकाबले सिर्फ पांच कम यानी 75 सीटें जीतीं। उस वक्त महागठबंधन सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से सिर्फ 12 सीटें पीछे रह गया था। इस प्रदर्शन ने तेजस्वी के भीतर एक अति उत्साह और अति-आत्मविश्वास पैदा कर दिया। उन्हें लगने लगा कि बस एक छोटा सा और आक्रामक धक्का देने की जरूरत है, और नीतीश कुमार की सत्ता आसानी से छिन जाएगी। इसी सुनिश्चित सफलता की उम्मीद को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 2025 के चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई थी। बिना किसी ठोस आर्थिक दृष्टिकोण या जमीनी रणनीति के उन्होंने एक के बाद एक कई लोकलुभावन घोषणाएं कर दीं। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इन वादों के सहारे वह निश्चित तौर पर सत्ता के शिखर तक पहुंच जाएंगे। लेकिन राजनीति में सिर्फ हवा-हवाई वादों से काम नहीं चलता। उनके अति उत्साह में किए गए इन फैसलों का नीतीश कुमार ने बिल्कुल सही समय पर और अपने चिर-परिचित प्रशासनिक अंदाज में करारा जवाब दिया। नतीजतन, नतीजे बिल्कुल उलट आए और 80 सीटों वाली पार्टी 25 पर आ गिरी। आज वह मुख्यमंत्री बनने के बजाय अपनी बची-खुची नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी बचाने में संघर्ष कर रहे हैं और महत्वपूर्ण चुनावों को छोड़कर विदेशी दौरों पर जा रहे हैं, जबकि उनकी पार्टी का राजनीतिक आधार तेजी से खिसक रहा है।




















