आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और विभिन्न दलों की चुनावी बिसात पर स्थिति स्पष्ट होने लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर राजनीतिक गलियारों में पहले केंद्र से टकराव और ब्राह्मण मतदाताओं की नाराजगी की चर्चाएं थीं, जिनमें से केंद्र से जुड़ा गतिरोध अब समाप्त माना जा रहा है, जबकि ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की प्रक्रिया अभी जारी है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का मुख्य जोर दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने पर है और उन्हें पूर्ण विश्वास है कि मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन उनकी पार्टी को ही मिलेगा। कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन तय माना जा रहा है, भले ही पार्टी के कुछ कनिष्ठ नेता अलग बयान दें। दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती अपने पारंपरिक आधार वोट के साथ ब्राह्मणों और मुसलमानों को जोड़ने की रणनीति के तहत अकेले ही चुनावी मैदान में उतरेंगी। हालांकि उनके सामने अपने परिवार को लेकर कुछ आंतरिक असमंजस की स्थिति भी रही है, क्योंकि वह अपने भतीजे आकाश आनंद को तीन बार राष्ट्रीय संयोजक के पद पर नियुक्त करने के बाद हटा चुकी हैं। इस बार के चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम एक बड़ा फेरबदल साबित हो सकती है, क्योंकि वह लगातार मुस्लिम समुदाय की आत्मसम्मान की भावनाओं को झकझोर रहे हैं। यदि ओवैसी मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने में सफल होते हैं, तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।
मध्य प्रदेश में फर्जी इलाज और आयुष्मान योजना के नाम पर धोखाधड़ी
मध्य प्रदेश सरकार ने आयुष्मान योजना के तहत फर्जी उपचार दिखाकर सरकारी खजाने को चूना लगाने वाले कुल 83 अस्पतालों के विरुद्ध सख्त अनुशासनात्मक और कानूनी कदम उठाए हैं। सामान्य सर्दी, बुखार या पेट दर्द जैसी मामूली समस्याओं से पीड़ित मरीजों को भी गहन चिकित्सा कक्ष यानी आईसीयू में भर्ती दिखाकर भारी-भरकम बिल सरकार के पास भेजे जा रहे थे। इस बड़े फर्जीवाड़े के दायरे में आए कुल 83 अस्पतालों में से 25 अकेले भोपाल शहर से संबंधित हैं। इस कार्रवाई के तहत राज्य में 18 अस्पतालों को पूरी तरह काली सूची में डाल दिया गया है, जबकि 50 अन्य अस्पतालों पर भारी वित्तीय जुर्माने लगाए गए हैं। कई निजी चिकित्सा संस्थानों ने इस अवैध कमाई के लिए विशेष तौर पर दलाल नियुक्त कर रखे थे, जो ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर मुफ्त स्वास्थ्य शिविर लगाते थे और आयुष्मान कार्ड धारकों की सूची तैयार करते थे। सामान्य बीमारियों से पीड़ित भोले-भाले ग्रामीणों को गंभीर बीमारियों का डर दिखाया जाता था और उन्हें जबरन उन निजी अस्पतालों में भर्ती करा दिया जाता था। एक मरीज को अस्पताल लाने पर दलालों को दस हजार रुपये तक का कमीशन दिया जाता था। विदिशा के ब्रज नारायण विश्वकर्मा के मामले में उनके परिजनों ने बताया कि उन्हें पेट की पथरी का हवाला देकर सीधे आईसीयू में डाल दिया गया, ऑक्सीजन मास्क लगाकर उनकी तस्वीरें खींची गईं और पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया, जबकि वे अस्पताल के बाहर सामान्य रूप से घूमते मिले। इसी प्रकार रायसेन के ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें मुफ्त इलाज और भोजन का प्रलोभन देकर लाया गया था और चार दिन में वापसी का वादा किया गया था, लेकिन हफ्ता बीत जाने पर भी जब उन्हें नहीं छोड़ा गया तो फसल बुवाई के समय कुछ लोग वहां से भागकर अपने गांव वापस आए। इस तरह की गंभीर धांधली यह दर्शाती है कि आम जनता के कल्याण के लिए बनाई गई योजनाओं का किस प्रकार दुरुपयोग किया जा रहा है। केवल आर्थिक जुर्माना लगाना या भुगतान रोकना इस तरह के गंभीर अपराध के लिए नाकाफी है, और जब तक ऐसे फर्जीवाड़े में लिप्त दो-चार अस्पताल पूरी तरह बंद नहीं किए जाते, तब तक अपराधियों के मन में कानून का डर उत्पन्न नहीं हो सकता।
यासीन मलिक का हलफनामा और सजा-ए-मौत की मांग
वर्ष 2019 से तिहाड़ जेल में आतंकवाद के वित्तपोषण के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष यासीन मलिक ने श्रीनगर की पोटा अदालत को एक विस्तृत हलफनामा भेजा है। कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट की हत्या के पुराने मामले में अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए यासीन ने कहा है कि उनका इस हत्याकांड से कोई संबंध नहीं है और अब वह इस कानूनी मुकदमे को आगे नहीं लड़ना चाहते हैं, इसके बजाय अदालत उन्हें सीधे फांसी की सजा सुना दे। उनका यह 25 पन्नों का संदेश काफी भावुक है, जिसमें उन्होंने कानूनी प्रक्रियाओं से पूरी तरह ऊब जाने की बात कही है। इस पत्र में उन्होंने अपनी पाकिस्तान निवासी पत्नी मुशाल हुसैन मलिक और अपनी पुत्री के नाम भी संदेश भेजा है। मुशाल हुसैन मलिक उनसे आयु में बीस वर्ष छोटी हैं और पाकिस्तान में रहती हैं, जिनके लिए यासीन ने लिखा कि अब उनके जेल से बाहर आने की कोई संभावना नहीं बची है और उनकी पत्नी के सामने पूरा जीवन शेष है, इसलिए वह उन्हें विवाह के बंधन से मुक्त करते हैं। यासीन मलिक ने अपने इस हलफनामे में लिखा कि उन्होंने इस्तेखारा की दुआ के बाद यह कठोर निर्णय लिया है कि वह अपना मुकदमा और नहीं लड़ेंगे, लेकिन उनके इस कदम को उनके अपराध की स्वीकारोक्ति या लगाए गए सभी आरोपों की सत्यता न समझा जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपने जीवन के हर निर्णय और कार्य का उत्तरदायित्व ईश्वर पर छोड़ते हैं और किसी के प्रति उनके मन में कोई द्वेष या बदला लेने की भावना नहीं है। वह यह पत्र किसी प्रकार की सहानुभूति या दया पाने के लिए नहीं लिख रहे हैं, बल्कि यह उनकी अंतरात्मा की आखिरी पुकार है। तिहाड़ जेल में पिछले सात वर्षों से एकांतवास में रह रहे साठ वर्षीय यासीन मलिक कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। हालांकि अतीत में वह एक उग्रवादी रहे थे और उन्होंने हथियार उठाए थे, लेकिन लगभग बत्तीस वर्ष पूर्व उन्होंने हिंसा का मार्ग त्यागकर महात्मा गांधी के दिखाए अहिंसा के रास्ते पर चलने की घोषणा की थी। डॉक्टर मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान उन्होंने कश्मीर विवाद के समाधान के लिए बैक-चैनल शांति वार्ताओं में भी हिस्सा लिया था और पाकिस्तान जाकर लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष कमांडरों तथा मुंबई हमलों के षड्यंत्रकारी हाफिज़ सईद से भी मुलाकात की थी, हालांकि वह प्रयास किसी मुकाम पर नहीं पहुंच सका। इन तमाम परिस्थितियों के बीच, जबकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उन्हें 2019 में गिरफ्तार किया था, अदालती फैसले से पहले ही उनकी मृत्युदंड की मांग और उनकी व्यक्तिगत व पारिवारिक स्थिति पर मानवीय दृष्टिकोण से विचार करने की आवश्यकता है।
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