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बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर का बड़ा दांव, क्या बिहार की राजनीति में ध्वस्त हो गए पुराने जातीय किले?राजनीति
3 अग॰ 2026, 7:54 pm (84 दिन पहले)· 2

बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर का बड़ा दांव, क्या बिहार की राजनीति में ध्वस्त हो गए पुराने जातीय किले?

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के शुरुआती रुझानों और मतगणना के आंकड़ों में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भारी बढ़त हासिल कर ली है। इस चुनावी नतीजने ने भाजपा के 30 साल पुराने गढ़ को हिलाकर रख दिया है और राजद के पारंपरिक समीकरण को भी बड़ा झटका दिया है।

पटना की चर्चित बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के रुझानों ने बिहार के सियासी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत किला मानी जाने वाली इस शहरी सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की अप्रत्याशित बढ़त ने पुराने राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। यह चुनाव सिर्फ एक विधानसभा सीट का उपचुनाव नहीं रह गया था, बल्कि बिहार की वर्षों पुरानी पारंपरिक और जातीय राजनीति के लिए एक बड़ी परीक्षा बन चुका था। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर जब प्रशांत किशोर खुद चुनावी मैदान में उतरे, तो पूरे राज्य की नजरें बांकीपुर के नतीजे पर टिक गईं।

21वें राउंड में 13 हजार वोटों की निर्णायक बढ़त

3 अगस्त 2026 को सुबह से शुरू हुई मतगणना के दौरान शुरुआती दौर से ही जन सुराज के उम्मीदवार प्रशांत किशोर ने लगातार अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी। जैसे-जैसे मतगणना के चक्र आगे बढ़ते गए, प्रशांत किशोर की बढ़त का दायरा चौड़ा होता चला गया। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 21वें राउंड की गिनती पूरी होने तक प्रशांत किशोर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी और भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार से लगभग 13,000 वोटों के भारी अंतर से आगे चल रहे थे। वहीं दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल की उम्मीदवार रेखा कुमारी दौड़ में बहुत पीछे छूट गईं और तीसरे स्थान पर बनी रहीं। मतगणना के इन आंकड़ों को देखते हुए प्रशांत किशोर की जीत अब महज एक औपचारिक ऐलान मानी जा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कायस्थ बहुल इस शहरी सीट पर प्रशांत किशोर ने इतना बड़ा उलटफेर कैसे कर दिखाया?

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भाजपा के 30 साल पुराने गढ़ में सेंध और सवर्ण वोट बैंक में बिखराव

बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र पिछले तीन दशकों से भाजपा का अभेद्य किला माना जाता रहा है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से कायस्थ बहुल है, लेकिन यहां भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, यादव और मुस्लिम मतदाता भी अच्छी खासी संख्या में निवास करते हैं। भाजपा की राजनीति इस सीट पर हमेशा से उच्च जातियों और शहरी मध्यम वर्ग के मजबूत समर्थन पर टिकी रही है। हालांकि, इस उपचुनाव के दौरान भाजपा का यह पारंपरिक वोट बैंक दरकता हुआ नजर आया। प्रशांत किशोर ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान विकास, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन जैसे जमीनी मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। स्थानीय स्तर पर हुई चर्चाओं और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कायस्थ, भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत समुदाय का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर युवा वर्ग, अपनी पारंपरिक पार्टी वफादारी को छोड़कर नए विकल्प की ओर आकर्षित हुआ है। अपने ही मजबूत गढ़ में पिछड़ना भाजपा के नेतृत्व के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि इसका असर आने वाले समय में पूरे बिहार के राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ सकता है।

राजद का पारंपरिक एमवाय समीकरण पूरी तरह से बेअसर

इस उपचुनाव के नतीजे केवल भाजपा के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल के लिए भी एक बहुत बड़ी चेतावनी बनकर सामने आए हैं। राजद का पारंपरिक मुस्लिम और यादव यानी एमवाय समीकरण बांकीपुर जैसे विशुद्ध शहरी इलाकों में पहले से ही बहुत मजबूत नहीं माना जाता था, लेकिन इस बार के चुनाव में राजद प्रत्याशी रेखा कुमारी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। बांकीपुर के मुस्लिम और यादव समुदाय के वोटरों का एक बड़ा वर्ग या तो जन सुराज के नए वादों की तरफ चला गया या फिर उन्होंने मतदान से दूरी बना ली। मतदान का कम प्रतिशत और राजद का तीसरे-चौथे स्थान पर सिमट जाना स्पष्ट संकेत देता है कि इस सीट पर राजद का जादुई जातीय आकर्षण पूरी तरह टूट चुका है। शहरी और युवा मतदाता अब केवल पुराने जातीय नारों के आधार पर किसी एक दल के साथ बंधकर रहने को तैयार नहीं हैं।

क्या बिहार की राजनीति में आकार ले रहा है नया 'एमबीए' समीकरण?

चुनावी रैलियों और जनसभाओं में प्रशांत किशोर हमेशा यह दावा करते रहे हैं कि वे जातिवादी राजनीति से ऊपर उठकर जनहित के बुनियादी मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन चुनावी मैदान की जमीनी हकीकत को देखें तो बांकीपुर में एक नया सामाजिक ताना-बाना उभरता हुआ दिखाई दे रहा है। राजनीतिक गलियारों में अब इसे 'एमबीए' यानी मुस्लिम, भूमिहार-ब्राह्मण और अहीर-यादव समीकरण का नाम दिया जा रहा है। प्रशांत किशोर ने बांकीपुर के विभिन्न सामाजिक वर्गों से वोट जुटाने में सफलता हासिल की है। अगर अंतिम परिणाम में उनकी जीत की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह बिहार में एक मजबूत तीसरे विकल्प के उदय का स्पष्ट संदेश होगा। यह नया समीकरण राज्य की पुरानी राजनीति यानी पारंपरिक एमवाय गठबंधन और भाजपा के सवर्ण-वैश्य वोट बैंक दोनों को सीधी चुनौती पेश कर रहा है।

भावी राजनीति और 2027 से पहले के राजनीतिक संकेत

हालांकि राजनीतिक पंडितों का मानना है कि बांकीपुर सिर्फ एक शहरी सीट है और कम मतदान प्रतिशत, शहरी माहौल तथा प्रशांत किशोर के व्यक्तिगत प्रभाव के कारण इसे पूरे बिहार का सार्वभौमिक पैमाना नहीं माना जा सकता। फिर भी, यदि भाजपा अपने सबसे सुरक्षित किले में पराजित होती है और राजद की जमानत जैसी स्थिति बनती है, तो यह राज्य के दोनों प्रमुख राजनीतिक धड़ों के लिए आत्ममंथन का कड़ा संदेश है। 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद के माहौल में जन सुराज की प्रासंगिकता और स्वीकार्यता काफी तेजी से बढ़ती दिख रही है। राज्य के युवाओं और शहरी आबादी के बीच मुद्दा आधारित राजनीति की मांग जोर पकड़ रही है। बांकीपुर उपचुनाव के इस नतीजे ने यह साबित कर दिया है कि बिहार का मतदाता अब पुराने ढर्रे से हटकर बदलाव के लिए तैयार हो रहा है, जो 2027 से पहले राज्य के संपूर्ण सियासी माहौल को बदलने की ताकत रखता है।

सवाल-जवाब

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में 21वें राउंड तक कौन आगे चल रहा था?
21वें राउंड की गिनती तक जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के नीरज कुमार से लगभग 13,000 वोटों से आगे चल रहे थे।
बांकीपुर सीट पर उपचुनाव कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के कारण बांकीपुर विधानसभा सीट खाली हुई थी, जिसके बाद यह उपचुनाव कराया गया।
बिहार राजनीति में 'एमबीए' (MBA) समीकरण का क्या मतलब है?
'एमबीए' समीकरण का तात्पर्य मुस्लिम (M), भूमिहार-ब्राह्मण (B) और अहीर-यादव (A) समुदायों के संभावित नए राजनीतिक गठजोड़ से है।
बांकीपुर सीट पर ऐतिहासिक रूप से किस पार्टी का कब्जा रहा है?
बांकीपुर सीट पर पिछले 30 वर्षों से लगातार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दबदबा रहा है और इसे पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है।
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