अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ होने वाली बैठकों और मुलाकातों को लेकर दुनिया भर के देश हमेशा से सतर्क रहते हैं। व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में कई विदेशी मेहमानों के साथ उनका अंदाज ऐसा रहा है, जिसने कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। दक्षिण अफ्रीका और यूक्रेन के शीर्ष नेताओं के साथ हुई ऐसी ही तीखी मुलाकातों के बाद, अब भारतीय कूटनीति भी पूरी तरह से चौकस हो गई है। सरकारी सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई है कि भारत किसी भी तरह का अप्रत्याशित जोखिम उठाने से बचना चाहता है और वाशिंगटन के साथ अपनी बातचीत में बेहद नपे-तुले तरीके से आगे बढ़ रहा है। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन के साथ होने वाली हरसंभव वार्ता को लेकर नई दिल्ली का रुख फिलहाल काफी सावधानी भरा और सधा हुआ है।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ व्हाइट हाउस की वह बैठक
यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप ने किस तरह के हालात पैदा किए थे, जिसके चलते भारत जैसे मित्र देश को भी अपनी रणनीति में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी। इसकी एक बड़ी मिसाल मई 2025 में देखने को मिली, जब दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा दोनों देशों के बीच व्यापारिक और आर्थिक रिश्तों को और मजबूत करने के मकसद से व्हाइट हाउस पहुंचे थे। इस बैठक के दौरान माहौल अचानक तब बदल गया जब डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीकी विपक्षी नेता जूलियस मालेमा का एक विवादित वीडियो चला दिया, जिसमें वह एक आक्रामक नारा लगाते नजर आ रहे थे। इसके साथ ही ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीका में श्वेत किसानों के खिलाफ कथित हिंसा और उत्पीड़न से जुड़े कुछ लेख और दस्तावेज भी मेज पर रख दिए। ट्रंप ने इन मुद्दों पर रामाफोसा के सामने सीधे तौर पर कई कड़े सवाल खड़े किए, जिससे अफ्रीकी राष्ट्रपति पूरी तरह से असहज स्थिति में आ गए।
तनाव के बीच सिरिल रामाफोसा का संयम और कूटनीतिक संतुलन
भले ही ओवल ऑफिस में माहौल काफी तनावपूर्ण और अप्रत्याशित हो चुका था, लेकिन राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने असाधारण संयम और धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने बेहद स्पष्ट शब्दों में यह बात समझाई कि किसी भी विपक्षी नेता के राजनीतिक बयानों या नारों को दक्षिण अफ्रीका की आधिकारिक सरकारी नीति नहीं माना जा सकता है। उन्होंने यह भी साफ किया कि देश में होने वाले अपराध किसी एक खास समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर समाज के अलग-अलग वर्गां पर पड़ता है। इस असहज और तनावपूर्ण स्थिति के बावजूद रामाफोसा ने दोनों देशों के रिश्तों को टूटने नहीं दिया, बल्कि कूटनीतिक संवाद को बनाए रखने की पूरी कोशिश की। उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों और निवेशकों के एक प्रतिनिधिमंडल को दक्षिण अफ्रीका आने का औपचारिक निमंत्रण भी दिया ताकि वे वहां निवेश की नई संभावनाओं को तलाश सकें। ट्रंप का वह आक्रामक रवैया और रामाफोसा का वह शांत एवं सधा हुआ जवाब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा विषय बन गया।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के साथ ओवल ऑफिस का टकराव
दक्षिण अफ्रीका के अलावा दूसरी बड़ी घटना 28 फरवरी 2025 को सामने आई, जिसे अमेरिका और यूक्रेन के आपसी इतिहास के सबसे असाधारण सार्वजनिक टकरावों में शुमार किया जाता है। व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के बीच हुई वह बैठक मीडिया कैमरों के सामने ही एक तीखी और बेबाक बहस में तब्दील हो गई। जेलेंस्की की मुख्य कोशिश यह सुनिश्चित करने की थी कि अमेरिका से यूक्रेन को आगे भी लगातार सैन्य समर्थन और रूस के खिलाफ पक्की सुरक्षा की गारंटी मिलती रहे। दूसरी तरफ, डोनाल्ड ट्रंप का पूरा फोकस इस बात पर था कि इस लंबे रूस-यूक्रेन युद्ध को तुरंत खत्म कराया जाए और दोनों पक्षों को जबरन बातचीत की मेज पर लाया जाए। इस मुलाकात के दौरान दोनों देशों के बीच यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों को लेकर एक अहम मिनरल्स डील पर भी हस्ताक्षर होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन इस तीखे विवाद के बाद वह समझौता अधर में ही लटक गया।
बैठक के दौरान ट्रंप और वेंस ने जेलेंस्की से सीधे शब्दों में यह सवाल पूछा कि वह इस खूनी संघर्ष को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक रास्तों पर उतनी तेजी से आगे क्यों नहीं बढ़ रहे हैं, जितनी उम्मीद की जा रही थी। इस पर जेडी वेंस ने अपनी बात रखते हुए कहा कि अमेरिकी प्रशासन कूटनीति के माध्यम से इस युद्ध को रोकने का प्रयास कर रहा है। इसके जवाब में वोलोदिमीर जेलेंस्की ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और रूस की मंशा पर साफ तौर पर अविश्वास जताया। उन्होंने बीते वर्षों में रूस के साथ हुए उन तमाम पुराने समझौतों का हवाला दिया जो समय के साथ टूट गए थे। जेलेंस्की ने वेंस से लगभग चुनौती भरे अंदाज में यह तक पूछ लिया कि आखिर वे किस तरह की कूटनीति की बात कर रहे हैं। इस पर पलटवार करते हुए वेंस ने कहा कि वे ऐसी कूटनीति चाहते हैं जिससे यूक्रेन में मचा यह हाहाकार और तबाही हमेशा के लिए थम जाए।
तीखी बहस, चेतावनियां और मिनरल्स डील का रद्द होना
जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, वैसे-वैसे दोनों पक्षों के बीच तल्खी और ज्यादा बढ़ती चली गई। डोनाल्ड ट्रंप ने जेलेंस्की को आईना दिखाते हुए यहां तक कह दिया कि मौजूदा समय में यूक्रेन की स्थिति कतई मजबूत नहीं है और अमेरिकी मदद के बिना उनका टिकना और भी ज्यादा मुश्किल हो जाएगा। ट्रंप ने जेलेंस्की पर यह गंभीर आरोप भी लगाया कि वे अमेरिका की तरफ से मिले भारी समर्थन के लिए पर्याप्त आभार या धन्यवाद प्रकट नहीं कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह चेतावनी भी दी कि जेलेंस्की इस जंग को लेकर बेहद खतरनाक और जोखिम भरा खेल खेल रहे हैं, जिससे पूरी दुनिया पर तीसरे विश्व युद्ध का आसन्न खतरा मंडरा सकता है। इन तमाम दबावों का जवाब देते हुए जेलेंस्की ने कहा कि उन्होंने अमेरिकी नागरिकों और सरकार को कई बार शुक्रिया कहा है, लेकिन ट्रंप और वेंस अपनी बात पर अड़े रहे।
इसी तीखी बहस के दौरान डोनाल्ड ट्रंप का वह चर्चित बयान सामने आया जब उन्होंने जेलेंस्की से कहा कि ‘आपके पास अभी कार्ड नहीं हैं’ और केवल अमेरिका के साथ खड़े रहने से ही यूक्रेन को कोई मजबूत स्थिति हासिल हो सकती है। इसके जवाब में यूक्रेनी राष्ट्रपति ने कहा कि वे यहां कोई ताश के पत्ते नहीं खेल रहे हैं बल्कि इस गंभीर संकट को पूरी संवेदनशीलता से देख रहे हैं। स्थिति इतनी ज्यादा बिगड़ गई कि ट्रंप ने कैमरों के सामने ही उस बैठक को बीच में ही समाप्त कर दिया। इसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने निर्देश देते हुए जेलेंस्की और उनके पूरे प्रतिनिधिमंडल को व्हाइट हाउस से तुरंत बाहर जाने के लिए कह दिया। नतीजतन, वह प्रस्तावित मिनरल्स डील कभी साइन नहीं हो पाई और दोनों देशों के बीच का कूटनीतिक तनाव दुनिया के सामने पूरी तरह से उजागर हो गया। बाद में ट्रंप ने इस वाकये पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि जेलेंस्की उस वक्त शांति समझौते के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे, इसलिए उन्हें तभी वापस लौटना चाहिए जब वे वादे के साथ शांति वार्ता के वास्ते पूरी तरह तैयार हों।





















