संसद की संयुक्त समिति के सामने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के प्रस्ताव को लेकर तीखा विरोध देखने को मिला है। कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता पी चिदंबरम ने इस पूरी कवायद को पूरी तरह से विकृत और असंवैधानिक करार दिया है। उन्होंने समिति के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की यह सोच बिना किसी ठोस विचार के उठाया गया कदम है।
संविधान के मूल ढांचे और कार्यकाल पर सवाल
पी चिदंबरम ने समिति को स्पष्ट शब्दों में बताया कि प्रत्येक राज्य के विधानमंडल को संविधान के तहत पांच साल का निश्चित कार्यकाल मिलता है। ऐसे में किसी भी विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल बीच में कम करना सीधे तौर पर संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के बदलाव लाने के लिए सरकार के पास संसद में जरूरी दो-तिहाई बहुमत भी नहीं है, और उनकी अपनी अंतरात्मा उन्हें इस तरह के विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देती है।
चुनाव खर्च और 2029 की अनिश्चितता
कांग्रेस नेता ने समिति के सामने एक बड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि साल 2029 में देश भर के सभी राज्यों और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराए जाएं और उसके बाद केंद्र में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले, तब ऐसी स्थिति में क्या होगा? इसके साथ ही उन्होंने चुनाव खर्च को लेकर चल रही बहसों पर कहा कि सरकार खुद चुनाव में ज्यादा खर्च नहीं करती है, बल्कि सारा खर्च उम्मीदवार करते हैं जो तय सीमा से बहुत ज्यादा होता है। सरकार को चुनाव प्रचार के इस अत्यधिक खर्च पर लगाम लगाने की आवश्यकता है, न कि चुनाव एक साथ कराने की।
समिति के अन्य सदस्यों और पद्म पुरस्कार विजेताओं की राय
संसदीय समिति की सदस्य और तृणमूल कांग्रेस की नेता सागरिका घोष ने भी इस विधेयक का कड़ा विरोध किया। उन्होंने आशंका जताई कि एक साथ चुनाव होने से निर्वाचन आयोग को असीमित और बेलगाम अधिकार मिल जाएंगे। इसके अलावा, लगभग 10 पद्म पुरस्कार से सम्मानित हस्तियों ने भी समिति के सामने अपनी बात रखी। इस समूह में तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार जैसे नाम शामिल थे। इनमें से कुछ प्रतिष्ठित हस्तियों ने एक साथ चुनाव कराने के विचार का समर्थन किया, जबकि अन्य ने चेतावनी दी कि इससे देश भर में राजनीतिक अराजकता फैल सकती है। जेपीसी की बैठकों में भी कुछ सदस्यों ने चिंता जताई कि चुनाव आयोग को असीमित शक्तियां देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं होगा।
विधेयक का राजनीतिक विरोध और जेपीसी के दौरे
यह पूरा मामला संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 से जुड़ा है, जिन्हें दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किया गया था और बाद में संयुक्त समिति के पास भेज दिया गया था। इन विधेयकों का आधार पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशें थीं, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल थे। इस बीच, संयुक्त संसदीय समिति ने महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली और गोवा जैसे राज्यों का दौरा करके विभिन्न पक्षों की राय ली है। पंजाब, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने इस प्रस्ताव का पूरी तरह विरोध किया है, जबकि 2024 में डीएमके ने भी इसका कड़ा विरोध किया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और चुनावी चक्र का टूटना
भारत के चुनावी इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब सभी चुनाव साथ होते थे। संविधान लागू होने के बाद वर्ष 1951 से लेकर 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न हुए थे। पहला आम चुनाव साल 1951-52 में एक साथ हुआ था और यह सिलसिला 1957, 1962 तथा 1967 के चुनावों में भी जारी रहा। हालांकि, वर्ष 1968 और 1969 के दौरान कई राज्यों की विधानसभाओं के समय से पहले भंग हो जाने के कारण यह चक्र टूट गया। इसके बाद 1970 में चौथी लोकसभा भी समय से पहले भंग कर दी गई और 1971 में नए चुनाव कराने पड़े। आपातकाल के दौरान पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया गया था, जिसके बाद केवल कुछ ही लोकसभाएं अपना पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा कर पाईं, जिनमें आठवीं, दसवीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा शामिल हैं। ठीक इसी तरह राज्य विधानसभाओं को भी समय से पहले भंग होने और कार्यकालों में बदलाव जैसी तमाम प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।



















