अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के वित्तपोषण और मनी लॉन्ड्रिंग पर शिकंजा कसने वाली संस्था FATF की आगामी बैठक में भारत पाकिस्तान को घेरने के लिए पूरी तरह तैयार है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में 28 से 30 अक्टूबर तक आयोजित होने वाली इस उच्च स्तरीय बैठक में जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर का मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाएगा। भारत का यह कड़ा रुख ऐसे समय में सामने आया है जब तालिबान के एक स्पष्ट बयान ने पाकिस्तान के उन दावों की पोल खोल दी है जिनमें वह मसूद अजहर के अपनी सीमा से बाहर होने की बात कहता रहा है। इस पूरी कूटनीतिक रणनीति का मकसद इस्लामाबाद पर वैश्विक मंच से दबाव बनाना है ताकि वह संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकियों के खिलाफ दिखावटी कदमों के बजाय ठोस और वास्तविक कार्रवाई करे।
तालिबान के बयान से बेनकाब हुआ पाकिस्तान
इस पूरे कूटनीतिक शिकंजे की मुख्य वजह पाकिस्तान का वह पुराना दावा है जिसमें उसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह कहा था कि मसूद अजहर साल 2019 से पड़ोसी देश अफगानिस्तान में शरण लिए हुए है। लेकिन तालिबान के प्रवक्ता जिया अहमद थाकल ने सितंबर महीने में इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया और साफ किया कि अजहर अफगानिस्तान की धरती पर मौजूद नहीं है। तालिबान की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि पाकिस्तान ने इस आतंकवादी की मौजूदगी को लेकर कभी भी उनके साथ कोई औपचारिक पत्राचार या संवाद नहीं किया है। भारत इसी भारी विरोधाभास को पेरिस में होने वाली बैठक के दौरान मजबूती से उठाने की तैयारी कर रहा है। इस कूटनीतिक पहल के तहत भारतीय अधिकारियों ने बैठक से पहले ही कई प्रमुख देशों के राजनयिकों और FATF के प्रभावशाली सदस्यों के साथ सिलसिलेवार बैठकें शुरू कर दी हैं ताकि पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को उजागर किया जा सके।
आतंकवाद और वित्तीय सुरक्षा पर होगी चर्चा
फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स वैश्विक स्तर पर वित्तीय प्रणाली को आतंकवादियों और अपराधियों द्वारा फंड के इस्तेमाल से बचाने का काम करती है। पेरिस में होने वाले इस सत्र के दौरान पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी प्रयासों की समीक्षा एक अहम एजेंडा हो सकती है। भारतीय पक्ष इस बात पर जोर देगा कि इस्लामाबाद ने मसूद अजहर के खिलाफ आज तक कोई पुख्ता और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं की है। हालांकि इस बात की अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है कि बैठक के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ कोई नया कठोर निर्णय लिया जाएगा या नहीं, लेकिन इस मुद्दे के उठने से वैश्विक मंच पर उसकी मुश्किलें जरूर बढ़ जाएंगी। बैठक में शामिल होने वाले विभिन्न देशों के प्रतिनिधि बदलते हुए वैश्विक सुरक्षा खतरों और वित्तीय अपराधों पर विस्तार से विचार-विमर्श करेंगे।
ग्रे लिस्ट का पुराना इतिहास और निगरानी
पाकिस्तान के लिए FATF का यह मंच नया नहीं है क्योंकि वह पहले भी साल 2018 से 2022 तक इसकी बदनाम ग्रे लिस्ट में शामिल रह चुका है। उस लंबी अवधि के दौरान संस्था ने बार-बार इस बात को रेखांकित किया था कि पाकिस्तान अपनी वित्तीय व्यवस्था के जरिए आतंकवाद को मिलने वाले फंड को रोकने और अवैध लेनदेन पर लगाम लगाने में पूरी तरह विफल रहा है। उस समय जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे घातक संगठनों के वित्तीय नेटवर्क वैश्विक चिंता का बड़ा कारण बने हुए थे। हालांकि बाद में पाकिस्तान उस सूची से बाहर आ गया था, लेकिन एशिया-पैसिफिक ग्रुप के माध्यम से उसकी गतिविधियों पर लगातार कड़ी निगरानी रखी जाती रही है। इसी निगरानी के दायरे में मसूद अजहर से जुड़े आतंक के वित्तपोषण और उससे जुड़े मामलों की जांच भी शामिल रही है।
भारत के लिए क्यों बेहद संवेदनशील है यह मामला
मसूद अजहर का नाम भारत की धरती पर खून-खराबे को अंजाम देने वाले कई सबसे भीषण आतंकी हमलों के साथ जुड़ा रहा है। साल 2001 में देश की संसद पर हुआ हमला, साल 2016 में पठानकोट के वायुसेना स्टेशन पर किया गया हमला और साल 2019 का पुलवामा हमला इसके काले कारनामों की सूची में शामिल हैं। इतिहास पर नजर डालें तो साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी-814 के अपहरण के बाद यात्रियों की सुरक्षित रिहाई की एवज में भारत सरकार को मजबूरी में मसूद अजहर समेत तीन खतरनाक आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मई 2019 में इसे आधिकारिक रूप से वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया था। अब भारत का मुख्य उद्देश्य यही है कि पाकिस्तान केवल इनामी घोषणाओं जैसे दिखावटी नाटक बंद करे और इन खूंखार तत्वों के खिलाफ जमीन पर ठोस कार्रवाई के दस्तावेजी सबूत पेश करे।




















