भारत की अध्यक्षता में 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस बार केवल आर्थिक विकास, व्यापार और ग्लोबल साउथ के मुद्दों को उठाने तक सीमित नहीं रहेगा। इस वैश्विक आयोजन के सामने पश्चिम एशिया का गहराता संकट एक गंभीर कूटनीतिक चुनौती के रूप में उभर रहा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि संगठन के दो प्रमुख सदस्य देश, यानी ईरान और संयुक्त अरब अमीरात, इस क्षेत्रीय विवाद पर बिल्कुल अलग रणनीतिक रुख और प्राथमिकताएं रखते हैं।
नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक उलझन यह है कि वह बिना किसी एक पक्ष के झुकाव के, तेहरान और आबू धाबी को एक ऐसी साझा भाषा पर सहमत करे जिसे आगामी संयुक्त घोषणा-पत्र में आसानी से शामिल किया जा सके।
संगठन के भीतर ही मतभेदों की चुनौती
भारत ने ब्रिक्स की कमान ऐसे संवेदनशील वक्त में संभाली है जब इस समूह का विस्तार हो चुका है और इसके सदस्य देशों के भू-राजनीतिक हित पहले की तुलना में कहीं अधिक बंटे हुए हैं। हालांकि ईरान और यूएई दोनों इस विस्तारित मंच का हिस्सा हैं, लेकिन पश्चिम एशिया की मौजूदा उथल-पुथल पर दोनों का नजरिया एक-दूसरे से काफी अलग है।
यही वजह है कि यह संकट अब केवल क्षेत्रीय सरहदों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ब्रिक्स के भीतर आम सहमति कायम करने की एक बड़ी बाधा बन गया है। इससे पहले अप्रैल के महीने में हुई ब्रिक्स की एक अन्य बैठक के दौरान भी इस संवेदनशील विषय पर सभी सदस्य देशों के बीच पूर्ण सहमति नहीं बन पाई थी। अब भारतीय कूटनीति का पूरा प्रयास यह होगा कि 12 और 13 सितंबर के मुख्य सम्मेलन से पहले एक ऐसा संतुलित मसौदा तैयार किया जाए जिस पर दोनों देश अपनी रजामंदी दे सकें।
दोनों पक्षों के लिए भारत का एक समान संदेश
भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में अपने कूटनीतिक संतुलन को बेहद सावधानी से बरकरार रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले एससीओ समिट के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ द्विपक्षीय बैठक की थी। इस बातचीत के दौरान पश्चिम एशिया के हालात पर विस्तार से चर्चा हुई और भारत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि इस संकट का स्थायी समाधान केवल बातचीत और कूटनीतिक रास्ते से ही निकल सकता है। इस दौरान भारत ने समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही बिना किसी बाधा के जारी रहने और उनकी सुरक्षा पर भी विशेष जोर दिया था।
दूसरी तरफ, यूएई के साथ भी भारत के रिश्ते बेहद प्रगाढ़ और रणनीतिक रूप से अहम हैं। जून के महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान के बीच हुई मुलाकात में भी लगभग यही संदेश दिया गया था। भारत ने तब भी तनाव कम करने, बातचीत को सबसे ऊपर रखने, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संप्रभुता का पूरा सम्मान करने तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नौवहन को पूरी तरह सुरक्षित रखने की वकालत की थी। इससे साफ जाहिर है कि भारत का रुख दोनों देशों के मामले में एक जैसा और संतुलित रहा है।
केवल मध्यस्थता नहीं, ब्रिक्स की साख का भी सवाल
भारत के लिए यह चुनौती सिर्फ दो देशों को एक साझा बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ पूरे ब्रिक्स संगठन की राजनीतिक विश्वसनीयता भी दांव पर लगी है। ब्रिक्स खुद को ग्लोबल साउथ की एक सशक्त और मुखर आवाज के रूप में स्थापित करने की लगातार कोशिश कर रहा है। ऐसे हालात में यदि इसके सदस्य देश किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष पर एक संयुक्त बयान तक जारी करने में नाकाम रहते हैं, तो इस संगठन की सामूहिक कार्यक्षमता और राजनीतिक प्रभाव पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
यही कारण है कि भारत किसी एक देश के पक्ष में झुकने के बजाय ऐसे वैकल्पिक शब्दों और शब्दावली की तलाश कर रहा है जिसमें संवाद, कूटनीति, तनाव में कमी, अंतरराष्ट्रीय नियमों का आदर और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे तमाम अहम बिंदु प्रमुखता से शामिल हो सकें।
भारत की कूटनीतिक क्षमता की बड़ी परीक्षा
आगामी 12 और 13 सितंबर का यह शिखर सम्मेलन भारतीय कूटनीति के लिए एक बहुत बड़ी और निर्णायक परीक्षा साबित होने वाला है। यदि भारत पश्चिम एशिया के इस जटिल मुद्दे पर ईरान और यूएई जैसे परस्पर विरोधी देशों को एक मंच पर लाकर किसी साझा घोषणा पर सहमत कराने में कामयाब हो जाता है, तो यह केवल एक संयुक्त दस्तावेज की सफलता नहीं होगी। बल्कि यह इस बात का भी पुख्ता सबूत होगा कि भारत इतने बड़े, विस्तारित और विविध हितों वाले ब्रिक्स संगठन को एकजुट और साधे रखने में पूरी तरह सक्षम है।


















