पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य में उस समय अचानक सरगर्मियां तेज हो गईं जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक महत्वपूर्ण मुलाकात हुई। संसद भवन परिसर के भीतर शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधी भेंट की। दोनों नेताओं के बीच यह आमने-सामने की बातचीत करीब दस मिनट तक चली, जिसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में कयासों का दौर शुरू हो गया है। इस घटनाक्रम का महत्व इस बात से भी बढ़ जाता है कि सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने का ऐलान करने के बाद दोनों दिग्गजों की यह पहली आधिकारिक और प्रत्यक्ष मुलाकात है। इस संक्षिप्त संवाद ने पंजाब की आबोहवा में राजनीतिक चर्चाओं को नया आयाम दे दिया है।
ऐतिहासिक गठबंधन का टूटना और उसका असर
भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल का पुराना तालमेल केवल एक चुनावी समझौता भर नहीं था, बल्कि उसे पंजाब की धरती पर हिंदू-सिख भाईचारे तथा सामाजिक सौहार्द की मजबूत पहचान माना जाता था। वर्ष 1997 से शुरू हुई यह राजनीतिक साझेदारी बेहद सफल रही थी और इसी के बूते 1997, 2007 तथा 2012 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत के साथ सरकारें बनी थीं। हालांकि, साल 2020 के सितंबर महीने में जब केंद्र सरकार तीन नए कृषि अध्यादेश और कानून लेकर आई, तो पंजाब के खेतों से उठने वाला किसान विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे उग्र रूप धारण कर गया। राज्य की सियासत के दबाव में अकाली दल की प्रमुख हस्ती हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपना इस्तीफा सौंप दिया। उसी क्षण से पार्टी ने एनडीए के साथ अपने ढाई दशक से भी पुराने यानी तेईस साल के रिश्ते को हमेशा के लिए समाप्त कर लिया था। हालांकि बाद में सरकार ने उन तीनों कानूनों को वापस भी ले लिया, लेकिन दोनों दलों के सियासी रास्ते दोबारा कभी एक नहीं हो सके।
चुनावी अकेलेपन का परिणाम और सीटों का गणित
पुराने गठबंधन के बिखरने के बाद वर्ष 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और फिर 2024 के आम लोकसभा चुनावों में दोनों ही दलों ने अपने दम पर अकेले मैदान में उतरने का बड़ा फैसला किया। साल 2022 के प्रांतीय चुनाव में आम आदमी पार्टी की चली प्रचंड लहर के आगे अकाली दल सिमटकर मात्र 3 सीटों पर आ गया, जबकि भारतीय जनता पार्टी की झोली में केवल 2 सीटें आईं। इसके बाद 2024 के संसदीय चुनावों में भी दोनों तरफ से सीट बंटवारे को लेकर कुछ चर्चाएं हुईं, लेकिन आपसी सहमति न बन पाने के कारण हर कोई अलग-अलग ही चुनाव लड़ा। इस बार के लोकसभा नतीजों में अकाली दल को बठिंडा की केवल 1 सीट ही नसीब हुई, जबकि भाजपा का खाता तक नहीं खुल सका। इसके बावजूद, भाजपा ने अपना जनाधार मजबूत करते हुए अपने वोट शेयर को लगभग अट्ठारह प्रतिशत तक पहुंचाने में सफलता हासिल की थी।
दोनों पक्षों में फिर से साथ आने की सुगबुगाहट
आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी के भीतर राज्य की राजनीति को लेकर गहन मंथन और रणनीतिक तैयारियां लगातार चल रही हैं। पार्टी के कई प्रभावशाली और वरिष्ठ नेताओं का यह मानना है कि यदि अकाली दल के साथ दोबारा पुराना समझौता बहाल हो जाता है, तो राज्य का पूरा चुनावी समीकरण बदल सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ जैसे दिग्गज नेता भी इस संभावित गठबंधन की खुलकर वकालत कर चुके हैं। इन नेताओं का सीधा तर्क है कि पंजाब में दोबारा सत्ता की कुर्सी हासिल करने के लिए दोनों पुराने सहयोगियों का एक मंच पर लौटना बेहद आवश्यक है। हालांकि दोनों ही दलों के नेता सार्वजनिक रूप से अलग-अलग बयान दे रहे हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर पर्दे के पीछे से नई सियासी बिसात बिछाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
ग्रामीण और शहरी वोटों का अनूठा संतुलन
यदि आने वाले समय में ये दोनों दल फिर से हाथ मिला लेते हैं, तो राज्य की डेमोग्राफी के हिसाब से एक बहुत बड़ा सामाजिक और चुनावी बदलाव देखने को मिल सकता है। पंजाब का सामाजिक ताना-बाना बहुत स्पष्ट रूप से ग्रामीण और शहरी इलाकों में बंटा हुआ है। शिरोमणि अकाली दल का पारंपरिक और मजबूत जनाधार हमेशा से गांवों के भीतर तथा सिख पंथिक मतदाताओं के बीच माना जाता रहा है। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी की जड़ें हमेशा से शहरी और अर्ध-शहरी हिंदू बहुल क्षेत्रों में गहरी रही हैं। जब ये दोनों ताकतें अलग थीं तो विपक्ष का वोट बंट जाता था, लेकिन यदि दोबारा गठजोड़ बनता है तो ग्रामीण और शहरी मतों का यह मिलाप राज्य की सत्ताधारी पार्टी के सामने एक भारी चुनौती पेश कर सकता है।
प्रमुख विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और त्रिकोणीय मुकाबला
इस ताजा दिल्ली मुलाकात और संभावित गठबंधन की चर्चाओं से राज्य की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के खेमों में हलचल साफ महसूस की जा सकती है। आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया के माध्यम से तंज कसते हुए दोनों दलों पर अंदरूनी मिलीभगत होने का सीधा आरोप लगाया है। वहीं दूसरी ओर, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने बयान देते हुए कहा कि दोनों ही दल अपनी राजनीतिक जमीन खो चुके हैं और उनके साथ आने से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ने वाला है। दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह गठबंधन धरातल पर उतरता है, तो साल 2027 का मुकाबला चतुष्कोणीय न रहकर मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा-अकाली गठबंधन के बीच एक कड़े त्रिकोणीय संघर्ष में तब्दील हो जाएगा।
रणनीति और सीटों के बंटवारे की पेचीदगियां
भारतीय जनता पार्टी लगातार पंजाब में अपने पांव फैलाने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में जुटी है, लेकिन यह जमीनी सच्चाई है कि ग्रामीण अंचल में मजबूत पैठ बनाए बिना पूर्ण बहुमत का आंकड़ा छूना एक कठिन चुनौती है। यदि नया समझौता आकार लेता है, तो सीटों के समझौते का फार्मूला काफी दिलचस्प होने वाला है। पिछली व्यवस्था के दौरान अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में रहता था और अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ता था, लेकिन इस बार बदली हुई परिस्थितियों और बढ़े हुए वोट प्रतिशत के दम पर भाजपा बराबरी की हिस्सेदारी या फिर अधिक शहरी सीटों की मांग रख सकती है। फिलहाल संसद के मौजूदा सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार को उच्च सदन में समर्थन की आवश्यकता है, जिसमें अकाली दल का साथ मददगार साबित हो सकता है। इसके एवज में राज्य स्तर पर सीटों के बंटवारे के अलावा मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी जैसी शर्तें भी मायने रखेंगी, जिससे आने वाला समय बेहद दिलचस्प हो चला है।



















