भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में आरक्षण को लेकर चलने वाली बहस आमतौर पर एक ही दिशा में घूमती नजर आती है। देश के विभिन्न हिस्से से अक्सर कई समुदाय खुद को आरक्षित वर्ग में शामिल कराने के लिए प्रदर्शन और मांग करते दिखाई देते हैं। उनका प्राथमिक उद्देश्य सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिलने वाले विशेष अवसरों और सुरक्षा का लाभ उठाना होता है। लेकिन दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु से एक बिल्कुल अलग और अनोखी आवाज उठ रही है। यहां का देवेंद्रकुल वेल्लालर यानी DKV समुदाय इस पूरी स्थापित व्यवस्था के विपरीत जाकर खुद को अनुसूचित जाति यानी SC की सूची से बाहर निकालने की मांग कर रहा है। जब देश में आरक्षण को पिछड़ेपन से उबरने का सबसे बड़ा आर्थिक और सामाजिक जरिया माना जाता है, तब इस समुदाय द्वारा आरक्षण छोड़ने की यह मांग सभी को हैरान करती है। इस मांग के पीछे केवल आर्थिक समृद्धि की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से आत्मसम्मान, गौरवशाली अतीत और सांस्कृतिक पहचान की पुनर्प्राप्ति का संघर्ष है।
देवेंद्रकुल वेल्लालर समुदाय की कृषि पृष्ठभूमि और भौगोलिक स्थिति
देवेंद्रकुल वेल्लालर तमिलनाडु के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने में एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रभाव रखने वाला समुदाय है। इस समुदाय की एक बहुत बड़ी आबादी राज्य के दक्षिणी और मध्य हिस्सों में निवास करती है। भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो रामनाथपुरम, तूतीकोरिन, तिरुनेलवेली और विरुधुनगर जैसे जिले इस समुदाय के मुख्य गढ़ माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त तिरुचिरापल्ली, डिंडीगुल, तिरुवरुर, तंजावुर, थेनी, मदुरै, शिवगंगा और करूर जैसे क्षेत्रों में भी इनकी घनी आबादी बसी हुई है। ऐतिहासिक रूप से यह समुदाय पारंपरिक तौर पर खेती-किसानी से जुड़ा रहा है। 'देवेंद्रकुलम' शब्द इस समुदाय के गौरवशाली वंश और उनकी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है, जबकि 'वेल्लालर' शब्द का सीधा संबंध भूमि पर की जाने वाली पारंपरिक कृषि पद्धतियों और खेती से जुड़ा हुआ है। भूमि से उनका यह जुड़ाव केवल उनकी आजीविका नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान का एक अभिन्न हिस्सा रहा है।
सामाजिक और आर्थिक संघर्षों का ऐतिहासिक सफर
भले ही आज यह समुदाय अपनी पहचान को बदलने की मांग कर रहा है, लेकिन उनका अतीत कठिन सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से भरा रहा है। जाने-माने इतिहासकार केए मणिकुमार के शोध बताते हैं कि इस समुदाय ने लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और कृषि व्यवस्था के कारण गहरे पिछड़ेपन का सामना किया है। औपनिवेशिक काल और उसके बाद के वर्षों में भी जातिगत भेदभाव ने उन्हें हाशिये पर धकेलने का काम किया। साल 1968 में हुआ कीझवेनमणि नरसंहार तमिलनाडु के इतिहास की एक ऐसी दर्दनाक घटना है जिसने इस समुदाय के राजनीतिक दृष्टिकोण और सामाजिक चेतना को बहुत गहराई से प्रभावित किया। इस तरह के कई जातीय संघर्षों ने समुदाय के भीतर यह भावना पैदा की कि उनके साथ होने वाले भेदभाव को मिटाने के लिए केवल आर्थिक सहायता या सरकारी लाभ काफी नहीं हैं, बल्कि समाज में सम्मानजनक स्थान पाना सबसे ज्यादा जरूरी है।
2021 का ऐतिहासिक कानून: सात उपजातियों का एकीकरण
इस समुदाय की पहचान को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ साल 2021 में आया, जब भारत की संसद ने सात अलग-अलग उपजातियों को मिलाकर एक साझा नाम देने वाला विधेयक पारित किया। इस विधेयक के माध्यम से पल्लर समेत सात उपजातियों को एकीकृत करके 'देवेंद्रकुल वेल्लालर' नाम दिया गया। समुदाय के नेताओं और बुद्धिजीवियों की यह लंबे समय से मांग थी कि उन्हें पल्लर जैसे पुराने और सामाजिक रूप से रूढ़िवादी नामों के बजाय एक साझा सांस्कृतिक पहचान मिलनी चाहिए। साल 2015 में जब अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब उन्होंने समुदाय के इस स्वाभिमान आंदोलन की खुलकर सराहना की थी। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि जहां आमतौर पर जातियां सरकारी लाभ और आरक्षण पाने के लिए खुद को सामाजिक सीढ़ी में नीचे की श्रेणियों में शामिल कराना चाहती हैं, वहीं यह समुदाय अपनी गरिमा के लिए सामाजिक पायदान पर ऊपर उठने का प्रयास कर रहा है।
रणनीति: एससी से ओबीसी और फिर सामान्य श्रेणी का सफर
इस मांग को वैचारिक और राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने में पुथिया तमिलगम के संस्थापक के कृष्णासामी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। वह इस मांग को एक सुनियोजित रणनीति के तहत दशकों से उठा रहे हैं। उनके अनुसार समुदाय ने पहली बार साल 1996 में तत्कालीन सरकारों के समक्ष SC श्रेणी से हटकर OBC श्रेणी में जाने का प्रस्ताव रखा था। इस संबंध में के कृष्णासामी ने कहा, "1996 से हम हमें एससी से ओबीसी श्रेणी में ले जाने की मांग कर रहे हैं।" उनका मानना है कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब उनके नेताओं को बिना किसी बड़े विरोध के SC सूची में डाल दिया गया था, तब की परिस्थितियां अलग थीं। अब समुदाय के विकास के लिए सामाजिक गतिशीलता की आवश्यकता है। उनकी योजना के मुताबिक सीधे SC से सामान्य श्रेणी में जाना व्यावहारिक नहीं होगा। इसलिए वे चाहते हैं कि पहले समुदाय को एससी और ओबीसी के बीच एक विशेष नई श्रेणी में रखा जाए और वहां करीब 10 से 15 साल रहने के बाद उन्हें पूरी तरह से सामान्य श्रेणी में शामिल कर दिया जाए।
आर्थिक लाभ पर भारी पड़ता आत्मसम्मान
तेनकासी क्षेत्र के बीजेपी जिला अध्यक्ष अनंथन अय्यासामी का मानना है कि इस मांग को गलत तरीके से आर्थिक संपन्नता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। जमीनी हकीकत यह है कि इस समुदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करता है। लेकिन समुदाय के लिए पैसे से बढ़कर उनका स्वाभिमान है। अनंथन अय्यासामी ने कहा, "एससी सूची छोड़ने की मांग समृद्धि नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के बारे में है।" उन्होंने जोर देकर कहा कि इस समुदाय के लोग अब खुद को 'दलित' कहलाना पसंद नहीं करते हैं। वे अपनी स्वतंत्र और गौरवशाली सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना चाहते हैं। हालांकि वे कृषि क्षेत्र में सक्रिय हैं, लेकिन पूरी आर्थिक श्रृंखला में किसानों को अक्सर उतना लाभ नहीं मिल पाता जितना व्यापारियों और बिचौलियों को मिलता है। शिक्षा के स्तर में सुधार आने के बाद भी जातिगत पहचान उनके व्यापारिक अवसरों के आड़े आती है, जिसे वे इस दर्जे को छोड़कर बदलना चाहते हैं।
एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून पर एक अलग नजरिया
देवेंद्रकुल वेल्लालर समुदाय की यह मांग सिर्फ आरक्षण के दायरे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा अन्य कानूनी पहलुओं को भी छूता है। अनंथन अय्यासामी ने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के व्यावहारिक उपयोग को लेकर एक बहुत ही अलग पक्ष रखा है। उनका तर्क है कि कई बार इस विशेष कानून का दुरुपयोग आपसी रंजिश साधने के लिए एक हथियार के रूप में किया जाता है, जिससे गांवों और ग्रामीण क्षेत्रों में समुदायों के बीच आपसी कड़वाहट और दुश्मनी बहुत अधिक बढ़ जाती है। इसी जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए देवेंद्रकुल वेल्लालर समुदाय के एक बड़े हिस्से ने किसी भी व्यक्ति के खिलाफ इस अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज न कराने का एक स्वैच्छिक और नैतिक सिद्धांत अपनाया है। यह फैसला दर्शाता है कि समुदाय कानूनी सुरक्षा के बजाय सामाजिक सौहार्द और स्वाभिमान के रास्ते पर चलकर अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढना चाहता है, जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था में एक अत्यंत अनूठा प्रयोग है।



















