रविवार को बंगाल की सियासत में एक ऐसा ऐलान हुआ जिसने सबको हैरान कर दिया। ममता बनर्जी के साथ पूरे 40 साल तक राजनीति करने वाली काकोली घोष दास्तीदार ने घोषणा की कि वह 21 सांसदों के साथ 'नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी' में विलय करने जा रही हैं। सवाल यहीं से शुरू होता है — जब बागी गुट के पास दो तिहाई सांसद थे और 60 से ज्यादा विधायकों का समर्थन भी हासिल था, तो उसने सीधे टीएमसी पर ही कब्जे का दावा क्यों नहीं ठोंका? आखिर एक ऐसी पार्टी क्यों चुनी, जिसका नाम तक आम जनता ने पहले कभी नहीं सुना?
कानून तो टीएमसी पर दावे की इजाजत देता था
नियम साफ है — अगर किसी दल के दो तिहाई सांसद अलग हो जाएं, तो वे पार्टी तोड़ सकते हैं और उस पर कब्जा भी कर सकते हैं। शिवसेना का शिंदे गुट और अजित पवार वाली एनसीपी इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। फिर भी बागियों ने यह रास्ता नहीं अपनाया। राजनीति के जानकार इसकी वजह कानूनी झंझटों का डर बताते हैं। अगर यह गुट चुनाव आयोग के दरवाजे पर पहुंचकर खुद को असली टीएमसी बताता, तो वहीं से एक लंबी लड़ाई की शुरुआत हो जाती।
दलबदल कानून के मुताबिक किसी पार्टी पर कब्जा करने के लिए दो तिहाई बहुमत जरूरी है, और इसके साथ कई बारीक पेच भी जुड़े हैं — जिन्हें पहले चुनाव आयोग में और फिर सुप्रीम कोर्ट में साबित करना पड़ता है। बागी गुट अच्छी तरह जानता था कि अगर वह टीएमसी पर हक की लड़ाई में उलझा, तो सालों तक अदालतों और चुनाव आयोग के चक्कर लगाने पड़ेंगे, वकीलों की पूरी फौज खड़ी करनी पड़ेगी, और उसकी सारी ऊर्जा सिर्फ खुद को 'असली' साबित करने में ही खप जाएगी।
महाराष्ट्र के शिंदे-पवार मॉडल से सीखा सबक
दरअसल टीएमसी के बागियों ने महाराष्ट्र के तजुर्बे से बड़ा सबक लिया। एकनाथ शिंदे और अजित पवार को अपनी-अपनी पार्टी शिवसेना और एनसीपी का नाम और चुनाव चिह्न हासिल करने में पसीने छूट गए थे। इस खींचतान ने जनता के बीच भी भ्रम का माहौल बना दिया था। बंगाल के बागी इसी उलझन से बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी में विलय कर खुद को एक वैध राजनीतिक दल का हिस्सा बना लिया।
इसका सीधा फायदा यह है कि अब दलबदल कानून की तलवार उन पर उतनी आसानी से नहीं लटकेगी, क्योंकि विलय की स्थिति में कानून के नियम कुछ अलग और ज्यादा लचीले होते हैं। स्पीकर भी अब उन्हें फौरन सदन में एक अलग गुट के तौर पर मान्यता दे देंगे — किसी दफ्तर या अदालत के चक्कर काटने की नौबत ही नहीं आएगी।
असली खेल बीजेपी के दरवाजे से गुजरता है
विलय की घोषणा से ठीक पहले जिस तरह सभी सांसद बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पहुंचे — और निशिकांत दुबे भी उनके साथ मौजूद थे — उससे एक बात तय हो जाती है कि यह पूरी कहानी बीजेपी के दरवाजे से होकर गुजरी है। जानकारों का कहना है कि असली खेला बीजेपी ही रच रही है। बीजेपी को संसद में कई बड़े बिल पास कराने हैं और वह जानती है कि अगर ये सांसद कानूनी पचड़ों में उलझ गए, तो मुश्किल खड़ी हो सकती है। पार्टी नहीं चाहती कि जो बागी अभी उसके साथ खड़े हैं, वे कोर्ट-कचहरी के फेर में नकारा साबित हो जाएं।
आने वाले दिनों में बीजेपी डिलिमिटेशन बिल और महिला आरक्षण संशोधन बिल जैसे कई अहम विधेयक सदन में पेश करने वाली है, जिन पर भारी बवाल होना तय है। कुछ ही दिन पहले सदन में ऐसा हंगामा देखा भी जा चुका है, जहां हालात इस कदर बिगड़े कि बिल पास तक नहीं हो सका। अगर बागी गुट टीएमसी के नाम पर लड़ता रहता, तो वह व्हिप के उल्लंघन के मामलों में फंस सकता था। भले ही नई पार्टी अनजान हो, लेकिन अलग दल बन जाने से अब यह गुट संसद में अपना खुद का व्हिप जारी कर सकेगा और खुलकर बीजेपी के पक्ष में वोट दे पाएगा।
ममता बनर्जी ने क्यों ली राहत की सांस
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी राहत शायद ममता बनर्जी को मिली है। उनका सबसे बड़ा डर यही था कि बागी गुट टीएमसी का चुनाव चिह्न छीन लेगा, या चुनाव आयोग उसे फ्रीज कर देगा, जिससे भारी भ्रम फैलता और एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती। लेकिन बागियों के एक अनजान पार्टी में चले जाने से ममता की पार्टी, उनका नाम और उनका चुनाव चिह्न पूरी तरह सुरक्षित बच गए।
अब ममता बनर्जी बंगाल की जनता के बीच जाकर छाती ठोककर कह सकती हैं कि गद्दारों ने भले पार्टी छोड़ दी, पर वे टीएमसी पर कब्जा नहीं जमा पाए। वे बागियों को भगोड़ा और बिकाऊ साबित कर सकती हैं। बागियों के बाहर हो जाने से ममता और अभिषेक बनर्जी की पार्टी के भीतर पकड़ और मजबूत हो गई है, और भीतरघात का खतरा भी घट गया है। कोई कानूनी लड़ाई न होने के कारण ममता अब अपना पूरा ध्यान बंगाल में टीएमसी को फिर से खड़ा करने पर लगा सकती हैं।













