दक्षिण एशिया के कूटनीतिक गलियारों में एक बार फिर दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क (SAARC) को पुनर्जीवित करने की मांग जोर पकड़ रही है। हाल के दिनों में मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने इस क्षेत्रीय मंच को दोबारा सक्रिय करने की पुरजोर पैरवी की है। इसी कड़ी में बांग्लादेश की नई सरकार भी सार्क को पटरी पर लाने के समर्थन में खुलकर सामने आई है। इन पड़ोसी देशों का तर्क है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में फैली गरीबी, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और कनेक्टिविटी जैसी साझा समस्याओं का समाधान बिना क्षेत्रीय तालमेल के संभव नहीं है। हालांकि, इन लगातार उठती आवाजों के बावजूद नई दिल्ली की ओर से कोई खास गर्मजोशी देखने को नहीं मिल रही है। आखिर क्या वजह है कि साल 2016 के बाद से इस प्रमुख संगठन का एक भी शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो पाया है? क्या यह गतिरोध केवल भारत और पाकिस्तान के बीच छिड़े तनाव का नतीजा है या फिर इसके पीछे भारत की कोई सुविचारित रणनीतिक योजना काम कर रही है?
सार्क का इतिहास, उद्देश्य और इसकी विशाल जनसांख्यिकीय क्षमता
सार्क की पूरी पृष्ठभूमि को समझने के लिए इसके गठन और मूल उद्देश्यों पर नजर डालना जरूरी है। इस संगठन की नींव 8 दिसंबर 1985 को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में रखी गई थी। इसका प्राथमिक लक्ष्य दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों के बीच आर्थिक प्रगति, सामाजिक कल्याण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना था। सार्क में आठ सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल हैं। दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में शुमार दक्षिण एशिया की करीब दो अरब आबादी का सीधा संबंध किसी न किसी रूप में इस संगठन से जुड़ा हुआ है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि दुनिया की इतनी बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच पिछले एक दशक से लगभग पूरी तरह निष्क्रिय और प्रभावहीन पड़ा हुआ है।
दक्षिण एशियाई राजनीति में भारत की केंद्रीय भूमिका और प्रभाव
दक्षिण एशिया के भौगोलिक और आर्थिक मानचित्र पर भारत की स्थिति बेहद अहम है। पूरे क्षेत्र की कुल आबादी का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में निवास करता है। इतना ही नहीं, आर्थिक ताकत के मामले में भी भारत इस क्षेत्र की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। रक्षा, बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, व्यापार, निवेश और सुरक्षा जैसे लगभग हर प्रमुख क्षेत्र में भारत का दबदबा निर्विवाद है। यही कारण है कि इस क्षेत्र के अधिकांश छोटे और बड़े देशों की विदेश नीति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत के साथ उनके संबंधों से निर्धारित होती है। जब भी सार्क के काम-काज की समीक्षा की जाती है, तो मुख्य मुद्दा संगठन के ढांचे का नहीं, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच बने कूटनीतिक माहौल का होता है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के कई विश्लेषकों का तो यहां तक मानना है कि भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते ही सार्क के लिए ऑन और ऑफ स्विच का काम करते हैं।
साल 2016 का उरी हमला और सार्क की बैठकों पर लगा ब्रेक
सार्क के कामकाज की एक बेहद महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इसके सभी फैसले सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाते हैं। यानी यदि आठों सदस्य देशों में से एक भी देश किसी प्रस्ताव या बैठक के खिलाफ खड़ा हो जाए, तो कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जा सकता। संगठन का सबसे सर्वोच्च मंच इसका शिखर सम्मेलन होता है, जिसकी मेजबानी बारी-बारी से सभी सदस्य देश करते हैं। साल 2016 में सार्क का 19वां शिखर सम्मेलन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित होना प्रस्तावित था। लेकिन सम्मेलन से ठीक पहले जम्मू-कश्मीर के उरी में स्थित भारतीय सेना के शिविर पर एक भीषण आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें भारत के कई वीर जवान शहीद हो गए थे। इस हमले के विरोध में और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए भारत ने इस्लामाबाद सम्मेलन में हिस्सा लेने से साफ इनकार कर दिया। भारत के इस फैसले के तुरंत बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भी सम्मेलन से दूरी बना ली, जिसके चलते वह बैठक रद्द करनी पड़ी। तब से लेकर आज तक सार्क का कोई भी शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो सका है।
नई दिल्ली का स्पष्ट रुख: आतंकवाद और सहयोग एक साथ संभव नहीं
भारत ने इस पूरे घटनाक्रम पर हमेशा एक स्पष्ट और सिद्धांतवादी कूटनीतिक रुख कायम रखा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने हाल ही में बिना पाकिस्तान का नाम लिए एक बार फिर अपनी बात दोहराते हुए कहा कि दक्षिण एशिया का हर एक देश इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि कौन सा देश सार्क की प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ है। भारत का संदेश बिल्कुल साफ है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार से होने वाली आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक उसके साथ किसी भी सामान्य क्षेत्रीय मंच पर साझेदारी संभव नहीं है। नई दिल्ली इस समस्या को सार्क संगठन की प्रशासनिक विफलता के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे सीधे तौर पर पाकिस्तान के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और आतंकी तंत्र को प्रश्रय देने की नीति का परिणाम मानती है।
सार्क के विकल्प के तौर पर बिम्सटेक और बीबीआइएन पर भारत का ध्यान
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने क्षेत्रीय सहयोग और कनेक्टिविटी से अपना ध्यान हटाया नहीं है, बल्कि उसने अपने रास्ते और प्राथमिकताओं में रणनीतिक बदलाव किया है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत ने बिम्सटेक (BIMSTEC यानी बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव) और बीबीआइएन (BBIN यानी बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल पहल) जैसी संस्थाओं को अधिक प्राथमिकता देनी शुरू कर दी है। इन संगठनों की सबसे बड़ी कूटनीतिक खासियत यह है कि इनमें पाकिस्तान शामिल नहीं है। भारत का मानना है कि इन वैकल्पिक मंचों के माध्यम से क्षेत्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और डिजिटल कनेक्टिविटी के कार्यों को बिना किसी रुकावट के ज्यादा प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है। यही वजह है कि जब छोटे पड़ोसी देश सार्क को पुनर्जीवित करने का राग अलापते हैं, तब भारत सार्क के बजाय बिम्सटेक जैसे व्यावहारिक मंचों को मजबूत करने की नीति पर अडिग रहता है।
छोटे पड़ोसी देशों के रणनीतिक हित और सार्क को बचाने की कोशिशें
मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों द्वारा सार्क को दोबारा सक्रिय करने की मांग के पीछे केवल भावनात्मक लगाव नहीं है, बल्कि इसके ठोस रणनीतिक कारण भी हैं। मालदीव जैसे छोटे द्वीप देश के लिए सार्क एक ऐसा संतुलनकारी मंच प्रदान करता है जहां उसकी आवाज को बराबरी का दर्जा मिलता है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू खुद को क्षेत्र में एक स्वतंत्र कूटनीतिक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, ताकि वे चीन और भारत जैसी बड़ी शक्तियों के बीच अपने राजनीतिक हितों का संतुलन साध सकें। दूसरी ओर, बांग्लादेश की नई सरकार अपनी विदेश नीति का पुनर्गठन कर रही है। पाकिस्तान के साथ रिश्तों में आई नरमी, सीधी उड़ानों की बहाली की सुगबुगाहट और रक्षा सहयोग पर चर्चा के बीच ढाका सार्क के बहाने भारत के प्रभाव से इतर अपनी एक स्वतंत्र और संप्रभु क्षेत्रीय पहचान गढ़ने की कोशिश में जुटा है।
पाकिस्तान के आरोप और सार्क के भविष्य पर मंडराता अनिश्चितता का साया
दूसरी तरफ, पाकिस्तान लगातार भारत पर यह आरोप लगाता रहा है कि वह आतंकवाद के मुद्दे को ढाल बनाकर सार्क के सर्वसम्मति वाले ढांचे को जानबूझकर पंगु बना रहा है। इस्लामाबाद का दावा है कि भारत क्षेत्रीय सहयोग को राजनीतिक रंग दे रहा है। बहरहाल, जब तक सीमा पार आतंकवाद पर भारत की सुरक्षा चिंताएं दूर नहीं होतीं और दक्षिण एशियाई देशों के बीच आपसी विश्वास बहाल नहीं होता, तब तक सार्क के फिर से सक्रिय होने की संभावनाएं बेहद कम नजर आती हैं। भारत के सख्त रुख और वैकल्पिक मंचों की सफलता ने यह साफ कर दिया है कि सार्क का भविष्य अब पुरानी व्यवस्था के भरोसे आगे नहीं बढ़ सकता।


















