पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और दमदम से सांसद सौगत रॉय के हालिया बयानों ने भारी सुगबुगाहट पैदा कर दी है। पार्टी की स्थापित लाइन से अलग जाकर दिए गए उनके लगातार बयानों के बाद राज्य में नए सियासी समीकरण बनने की अटकलें लगाई जा रही हैं। केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों की तारीफ करने से लेकर राज्य सरकार की सुरक्षा नीतियों पर सवाल उठाने तक, उनके हालिया कदमों ने सत्ताधारी दल के भीतर अंदरूनी कलह को उजागर कर दिया है।
तीन प्रमुख घटनाक्रम जिन्होंने राजनीतिक हलचल बढ़ाई
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सौगत रॉय के पिछले कुछ हफ्तों के फैसले किसी बड़े बदलाव का संकेत दे रहे हैं। पहला प्रमुख घटनाक्रम तब देखने को मिला जब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर कथित हमले हुए। जहां पार्टी के अन्य सभी नेता इसे केंद्रीय जांच एजेंसियों और केंद्र सरकार की साजिश बता रहे थे, वहीं सौगत रॉय ने इन मामलों में हस्तक्षेप की मांग करते हुए सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख दिया। उनके इस पत्राचार की चर्चा राजनीतिक गलियारों में काफी जोर-शोर से हुई।
दूसरा बड़ा मोड़ केंद्र सरकार द्वारा कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में की गई कटौती के बाद आया। जब मोदी सरकार ने कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दाम 192 रुपये घटाए, तो तमाम विपक्षी दलों ने इसे बेहद कम और नाकाफी करार दिया था। इसके विपरीत, सौगत रॉय ने खुले तौर पर केंद्र के इस फैसले की सराहना की और इसे आम जनता तथा व्यवसायियों को राहत देने वाला कदम बताया।
तीसरा और सबसे संवेदनशील मामला राज्य की आंतरिक सुरक्षा तथा बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की वापसी से जुड़ा है। 19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब विवादित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन कोलकाता पहुंचीं, तो तृणमूल कांग्रेस ने इस पर बेहद सतर्कता बरतते हुए कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया। हालांकि सौगत रॉय ने बेबाकी से टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अच्छी बात है और उन्हें यहां रहना चाहिए।
कानून व्यवस्था और सुरक्षा पर मुख्यमंत्री को दी सलाह
हाल ही में कोलकाता के रेनेसां इलाके से स्पेशल टास्क फोर्स द्वारा 23 वर्षीय हमीम मंडल की गिरफ्तारी हुई, जिस पर उग्रवादी संगठनों से संदिग्ध संबंध होने के आरोप हैं। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए सौगत रॉय ने राज्य में उग्रवादी गतिविधियों की मौजूदगी पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि यहां पहले उग्रवादी नहीं थे और अब इनका सामने आना चिंताजनक है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह भी दे डाली, जिसे राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सीधे आक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
टीएमसी के भीतर पुराना बनाम नया नेतृत्व का संघर्ष
तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से अंदरूनी असंतोष और गुटबाजी से जूझ रही है। पार्टी के भीतर राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के समर्थक युवाओं और ममता बनर्जी के पुराने वफादार वरिष्ठ नेताओं के बीच वर्चस्व की खींचतान अक्सर सामने आती रही है। सौगत रॉय जैसे विद्वान और वरिष्ठ सांसद, जो दशकों से ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं, उनका इस प्रकार आक्रामक रुख अपनाना दर्शाता है कि पार्टी के अंदर गहरे मतभेद पनप चुके हैं।
उपचुनावों के बाद नए सियासी समीकरण की संभावना
पश्चिम बंगाल में 30 जुलाई को हुए उपचुनावों के बाद से ही राजनीतिक माहौल काफी गरमाया हुआ है। जानकारों का कहना है कि सौगत रॉय का यह बदला हुआ अंदाज महज व्यक्तिगत राय नहीं हो सकता, बल्कि यह तृणमूल कांग्रेस के भीतर उस धड़े की आवाज है जो मुख्यमंत्री के काम करने के तरीके और सुरक्षा नीतियों से असहमत है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सौगत रॉय भारतीय जनता पार्टी या किसी अन्य राजनीतिक विकल्प का रुख करेंगे, या फिर यह पार्टी के भीतर नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोई रणनीति है। आने वाले समय में बंगाल के सियासी मंच पर इसका असर स्पष्ट हो जाएगा।



















