पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के पहचान चिन्ह 'जोड़ा-फूल' को लेकर छिड़ी कानूनी जंग अब एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। भारत निर्वाचन आयोग में दोनों गुटों की बहस पूरी होने के बाद जहां फैसले का इंतजार किया जा रहा है, वहीं ममता बनर्जी के कालीघाट कैंप में रणनीतिक स्तर पर एक बैकअप योजना तैयार की जा रही है। किसी भी संभावित प्रशासनिक या कानूनी प्रतिकूल स्थिति से निपटने के लिए कालीघाट कैंप एक वैकल्पिक चुनाव निशान तैयार करने में जुटा है, ताकि वक्त आने पर मतदाताओं के बीच किसी तरह का भ्रम न रहे।
चुनाव आयोग के सामने निशान का विवाद
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से ही पार्टी के भीतर मतभेद गहराते चले गए, जिसके बाद संगठन दो हिस्सों में बंट गया। इस समय ममता बनर्जी गुट और ऋतब्रत बनर्जी गुट आमने-सामने हैं। दोनों ही पक्ष खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पारंपरिक 'जोड़ा-फूल' प्रतीक पर अपना दावा ठोक रहे हैं। विवाद जब गंभीर हुआ तो मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने पहुंचा। दोनों पक्षों के वकीलों ने अपने-अपने दावे प्रस्तुत किए और सभी दस्तावेज जमा किए। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।
ममता बनर्जी का पत्र और आयोग की प्रक्रिया पर सवाल
मामले में हो रही देरी को देखते हुए ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग को एक पत्र लिखा था। अपने पत्र में उन्होंने प्रक्रिया में समानता न होने का मुद्दा उठाया और कहा कि विरोधी पक्ष को अपनी बात रखने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया। उन्होंने आयोग से अनुरोध किया कि निष्पक्षता बनाए रखते हुए इस मामले का निपटारा जल्द से जल्द किया जाए, क्योंकि अनिश्चितता की स्थिति से राजनीतिक गतिविधियों पर असर पड़ता है।
पार्टी के वरिष्ठ सांसद सौगत राय ने भी आयोग की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताया। उन्होंने कहा कि उनके पक्ष को अपनी दलीलें रखने के लिए महज सात दिन की मोहलत दी गई, जबकि दूसरे गुट को इससे तीन गुना अधिक समय प्रदान किया गया। सौगत राय के अनुसार ममता बनर्जी ने आयोग के समक्ष बिल्कुल सही बात रखी है और अब बिना समय गंवाए अंतिम फैसला सुनाया जाना चाहिए।
कालीघाट की रणनीति: क्यों पड़ी बैकअप चुनाव चिन्ह की जरूरत
राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, कालीघाट स्थिति पार्टी मुख्यालय में 'प्लान बी' पर तेजी से काम चल रहा है। इस तैयारी के पीछे मुख्य वजह यह है कि यदि आयोग 'जोड़ा-फूल' निशान को फ्रीज़ कर देता है या दूसरे गुट के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो चुनाव के समय पार्टी के पास तुरंत एक मान्यता प्राप्त प्रतीक उपलब्ध होना चाहिए।
सूत्रों का कहना है कि प्रस्तावित नए प्रतीक में भी फूल के चित्र का ही प्रयोग किया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि पार्टी का पुराना स्वरूप और वैचारिक जुड़ाव कायम रहे, जिससे आम जनता को नया निशान पहचानने में कोई परेशानी न हो। हालांकि इस नए प्रतीक की रूपरेखा क्या होगी और इसे कब जारी किया जाएगा, इस बारे में अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
क्या कहते हैं चुनाव चिन्ह आवंटन के नियम
राजनीतिक दलों के प्रतीक विवाद में चुनाव आयोग तय नियमों के तहत ही कोई फैसला लेता है। ऐसे मामलों में आयोग यह देखता है कि किस धड़े के पास निर्वाचित जन प्रतिनिधियों और सांगठनिक पदाधिकारियों का बहुमत है। विधानसभा सदस्यों, संसद सदस्यों और पार्टी की राष्ट्रीय व प्रांतीय इकाइयों के समर्थन का आंकड़ा ही यह तय करता है कि असली दल कौन सा है और चुनाव निशान किसे सौंपा जाएगा।
'ममता ही पार्टी का ब्रांड': नेताओं का दावा
कानूनी लड़ाई के बीच ममता समर्थकों का कहना है कि पार्टी की ताकत किसी चिन्ह से ज्यादा ममता बनर्जी के नेतृत्व में निहित है। टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस का वास्तविक पर्याय खुद ममता बनर्जी ही हैं। कुणाल घोष ने कहा, "तृणमूल कांग्रेस का मतलब ही ममता बनर्जी है और वही पार्टी का असली चेहरा हैं।" उनका कहना था कि 'जोड़ा-फूल' को घर-घर तक पहुंचाने का काम भी ममता बनर्जी ने ही किया है, इसलिए निशान जो भी मिले, जनता ममता बनर्जी के नाम पर ही मतदान करेगी।
फिलहाल निर्वाचन आयोग के फैसले का इंतजार किया जा रहा है। आयोग किस पक्ष को वैध तृणमूल कांग्रेस घोषित करता है और 'जोड़ा-फूल' किसके पास रहता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।


















