पश्चिम बंगाल की राजनीति में गरमा-गरमी के बीच तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी ने राज्य सरकार और पुलिस पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया है कि पिछले कुछ हफ्तों के दौरान पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ और सीआईडी शाखाओं ने बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी प्रक्रिया का पालन किए उनके कार्यालय से जुड़े करीब 25 लोगों को पूछताछ के नाम पर अचानक हिरासत में लिया या तलब किया है।
उत्पीड़न और धमकी के आरोप
अभिषेक ने दावा किया कि इन लोगों को डराने-धमकाने का सिलसिला जारी है और उन पर झूठे बयान देने का दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके करीबियों और यहां तक कि उनके परिवार की महिला सदस्यों को भी परेशान किया जा रहा है। इसके अलावा, उनके फोन टैप किए जा रहे हैं। अभिषेक ने इस स्थिति को राजनीतिक धमकियों का सबसे निचला स्तर करार दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस सरकार के मुख्यमंत्री खुद कथित तौर पर रिश्वत लेने के आरोपों में घिरे हैं और जिन पर सीबीआई के अनेक मामले लंबित हैं, वही अब सरकारी एजेंसियों का उपयोग उन्हें फंसाने के लिए कर रही है। अभिषेक ने साफ कर दिया है कि वे इन धमकियों के आगे झुकने वाले नहीं हैं और आखिरी सांस तक मुकाबला करेंगे।
न्यायिक नोटिस और आवाज का सैंपल
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब एक जुलाई को उत्तर 24 परगना जिले की एक अदालत ने अभिषेक बनर्जी को नोटिस भेजा। मामला एक चुनावी रैली के दौरान कथित रूप से भड़काऊ भाषण देने और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को धमकाने के आरोपों से जुड़ा है। बिधाननगर कोर्ट के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने डायमंड हार्बर के सांसद को आठ जुलाई को सुबह 10 बजे अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है। अदालत का उद्देश्य यह है कि फोरेंसिक विशेषज्ञों की निगरानी में अभिषेक के आवाज के नमूने लिए जा सकें।
कानूनी प्रक्रिया की स्थिति
अभिषेक को इस प्रक्रिया के लिए पहले मंगलवार को पेश होना था, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। उनके वकील का तर्क है कि इस समय कलकत्ता हाईकोर्ट की एक सिंगल-जज बेंच में उनकी उस याचिका पर सुनवाई चल रही है, जिसमें उन्होंने आवाज के नमूने लेने संबंधी जिला अदालत के आदेश को चुनौती दी है। इसी कारण से वे जिला अदालत की कार्यवाही में शामिल नहीं हुए।













