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यूपी में बिना विधायक रहे मुख्यमंत्री बनने वाले त्रिभुवन नारायण सिंह की कहानी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसलाराजनीति
23 जुल॰ 2026, 11:05 am (27 दिन पहले)· 0

यूपी में बिना विधायक रहे मुख्यमंत्री बनने वाले त्रिभुवन नारायण सिंह की कहानी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह की नियुक्ति ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया कि कोई भी व्यक्ति बिना विधायक रहे भी पद की शपथ ले सकता है.

भारतीय राजनीति के पन्नों में कई ऐसे दिलचस्प और हैरान करने वाले अध्याय दर्ज हैं, जो आज भी कानूनी और संवैधानिक रूप से एक बड़ी मिसाल माने जाते हैं. जब भी लोकतंत्र और चुनाव की बात आती है, तो एक आम धारणा यही होती है कि किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री बनने के लिए उस व्यक्ति को पहले जनता द्वारा चुना जाना चाहिए. लोगों का मानना होता है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए कम से कम विधायिका का हिस्सा होना पहली और सबसे जरूरी शर्त है. लेकिन देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा अनूठा वाकया भी मौजूद है, जिसने इस पूरी धारणा को जड़ से बदल दिया. एक ऐसा भी समय आया जब उत्तर प्रदेश की कमान एक ऐसे राजनेता के हाथों में सौंपी गई, जिनके पास मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय न तो विधानसभा की सदस्यता थी और न ही विधान परिषद की. राज्य के मुखिया के तौर पर उनके पदभार संभालते ही इस अहम फैसले को पूरी तरह से असंवैधानिक करार देते हुए विरोधियों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की. यह भारी राजनीतिक विवाद जल्द ही एक बड़ी कानूनी और संवैधानिक लड़ाई में तब्दील हो गया. मामला पहले हाईकोर्ट पहुंचा और फिर वहां से देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा. शीर्ष अदालत ने इस अहम मामले में जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया, उसने भारतीय संविधान के दायरे में एक नई व्यवस्था को जन्म दिया और आज भी उस फैसले की प्रासंगिकता पूरी तरह से कायम है. यह पूरी कहानी उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह की है, जिनकी विवादित लेकिन ऐतिहासिक नियुक्ति ने देश को एक नई संवैधानिक दिशा देने का काम किया.

स्वतंत्रता संग्राम से लेकर कांग्रेस संगठन के शीर्ष तक का सफर

त्रिभुवन नारायण सिंह की पहचान केवल एक आम राजनेता के रूप में नहीं की जाती थी, बल्कि उनका नाता देश के स्वतंत्रता आंदोलन से भी बेहद गहराई से जुड़ा हुआ था. देश की आजादी में उनका एक अहम योगदान रहा था. उनका जन्म 8 अगस्त 1904 को पवित्र नगरी वाराणसी में हुआ था. एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर देश की निस्वार्थ सेवा करने के बाद उन्होंने मुख्यधारा की राजनीति में मजबूती से कदम रखा. अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने जल्द ही कांग्रेस पार्टी के एक सीनियर नेता के रूप में अपनी एक अलग और मजबूत पहचान स्थापित कर ली. वह पार्टी के संगठन को चलाने और संसद के भीतर, दोनों ही मोर्चों पर बेहद सक्रिय भूमिका निभाते थे. उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनकी बिल्कुल बेदाग, ईमानदार और साफ-सुथरी छवि थी. इसके साथ ही उनके पास सरकार और प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने का बहुत गहरा अनुभव भी मौजूद था. इन्हीं तमाम खूबियों और नेतृत्व क्षमता के कारण कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उन पर बहुत अधिक भरोसा जताता था. उनके लंबे राजनीतिक सफर में पार्टी का यह अटूट भरोसा उस वक्त सबसे ज्यादा काम आया, जब उत्तर प्रदेश भारी राजनीतिक उथल-पुथल और संकट के दौर से गुजर रहा था.

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उत्तर प्रदेश की भारी अस्थिरता और मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी

भारत के राजनीतिक इतिहास में साल 1969 को एक बड़े बदलाव के लिए याद किया जाता है, क्योंकि इसी साल कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ा विभाजन देखने को मिला था. इस ऐतिहासिक टूट का सीधा और बहुत गहरा असर देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश पर पड़ा. पार्टी के दो फाड़ होने के कारण राज्य की राजनीति में भारी अस्थिरता, गुटबाजी और अनिश्चितता का माहौल पैदा हो गया था. ऐसी नाजुक और चुनौतीपूर्ण स्थिति में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को एक ऐसे अनुभवी चेहरे की सख्त तलाश थी, जो राज्य में पार्टी के सभी नेताओं को एकजुट रख सके और प्रशासनिक कामकाज को भी बिना किसी बाधा के सुचारू रूप से चला सके. इसी अहम रणनीति के तहत कांग्रेस आलाकमान ने उत्तर प्रदेश की कमान सीधे त्रिभुवन नारायण सिंह के हाथों में सौंपने का एक बहुत बड़ा राजनीतिक फैसला लिया. पार्टी के इस निर्देश के बाद, 18 अक्टूबर 1970 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इसी के साथ वह आधिकारिक तौर पर राज्य के नए मुखिया बन गए.

नियुक्ति पर भारी राजनीतिक बवाल और अदालती लड़ाई की शुरुआत

जैसे ही त्रिभुवन नारायण सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, वैसे ही राज्य भर में एक बहुत बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में यह अहम सवाल जोर-शोर से गूंजने लगा कि आखिर राज्य का यह नया मुखिया किस सदन का सदस्य है. सच्चाई यह थी कि उस समय वह किसी भी सदन का हिस्सा बिल्कुल नहीं थे. वह न तो विधानसभा के लिए सीधे तौर पर चुने गए विधायक थे और न ही उनके पास उच्च सदन यानी विधान परिषद की कोई सदस्यता मौजूद थी. विपक्ष ने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया और तुरंत इस मुद्दे को लपकते हुए इसे एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना लिया. विरोधियों ने हर मंच से यह आरोप लगाना शुरू कर दिया कि बिना किसी सदन का सदस्य हुए किसी भी व्यक्ति को सीधे मुख्यमंत्री की अहम कुर्सी पर बिठा देना पूरी तरह से संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. इसी भारी विरोध और प्रदर्शनों के बीच यह पूरा मामला राजनीतिक गलियारों से निकलकर इंसाफ के लिए अदालत के दरवाजे तक पहुंच गया. लखनऊ के रहने वाले हर शरण वर्मा नाम के एक जागरूक नागरिक ने मुख्यमंत्री की इस नियुक्ति को सीधे अदालत में चुनौती देने का फैसला किया. उन्होंने अपनी याचिका में यही सबसे बुनियादी और अहम सवाल उठाया कि जब कोई इंसान विधायिका का हिस्सा ही नहीं है और जनता ने उसे नहीं चुना है, तो वह पूरे राज्य का मुख्यमंत्री कैसे नियुक्त किया जा सकता है. कानूनी प्रक्रिया के तहत सबसे पहले यह महत्वपूर्ण मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुंचा. वहां अदालत ने सभी दलीलों को सुनने के बाद इस नियुक्ति को पूरी तरह से वैध ठहराया. लेकिन याचिकाकर्ता हर शरण वर्मा और राजनीतिक विरोधी हाईकोर्ट के इस फैसले से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हुए. जब हाईकोर्ट से उन्हें निराशा हाथ लगी, तो उन्होंने हार नहीं मानी और देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया. इसके बाद यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक जा पहुंचा.

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और अनुच्छेद 164(4) की विस्तृत व्याख्या

जब यह बहुचर्चित और अहम मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो पूरे देश की निगाहें इसी बात पर टिकी थीं कि शीर्ष अदालत इस पर क्या अंतिम फैसला सुनाती है. सर्वोच्च अदालत के सामने सबसे मुख्य चुनौती भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) की सही और सटीक व्याख्या करने की थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की बहुत गहराई से सुनवाई की, सभी संवैधानिक पहलुओं को परखा और अपना स्पष्ट ऐतिहासिक फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान किसी भी राज्य के राज्यपाल को यह विशेष अधिकार देता है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को भी सीधे मुख्यमंत्री या मंत्री के पद पर नियुक्त कर सकते हैं, जो नियुक्ति के वक्त विधानसभा का विधायक या विधान परिषद का सदस्य न हो. अदालत ने एकदम स्पष्ट किया कि शपथ ग्रहण के समय विधायिका का सदस्य होना कतई अनिवार्य शर्त नहीं है. हालांकि, इस राहत के साथ अदालत ने एक बेहद जरूरी और अनिवार्य शर्त का भी प्रमुखता से जिक्र किया. इस अहम शर्त के मुताबिक, ऐसे किसी भी मुख्यमंत्री या मंत्री को शपथ लेने के ठीक छह महीने के भीतर राज्य की विधानसभा या विधान परिषद में से किसी एक सदन की सदस्यता हर हाल में हासिल करना अनिवार्य होता है. अगर वह व्यक्ति इस तय समय सीमा यानी छह महीने के भीतर किसी भी सदन का सदस्य बनने में पूरी तरह विफल रहता है, तो उसे तत्काल प्रभाव से अपना पद छोड़ना पड़ेगा. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने तमाम शंकाओं को दूर करते हुए त्रिभुवन नारायण सिंह की नियुक्ति को पूरी तरह से संवैधानिक और वैध करार दिया.

भारतीय राजनीति के लिए एक स्थायी और मजबूत मिसाल

सुप्रीम कोर्ट का यह अहम फैसला केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने आने वाले समय में पूरे देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा मील का पत्थर स्थापित कर दिया. इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद देश के अलग-अलग राज्यों में जब भी किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री या मंत्री बनाया गया, जो चुनाव नहीं जीता था या किसी भी सदन का सदस्य नहीं था, तो हमेशा इसी ऐतिहासिक फैसले को आधार बनाया गया. आज के आधुनिक दौर में भी जब बड़े संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या की जाती है, तो साल 1971 के हर शरण वर्मा बनाम त्रिभुवन नारायण सिंह मामले के इस फैसले को सबसे महत्वपूर्ण नजीर के तौर पर पेश किया जाता है. यही वजह है कि आज भी अगर कोई बिना विधायकी वाला नेता किसी राज्य की भारी सत्ता संभालता है, तो उसे हर हाल में छह महीने के भीतर चुनाव जीतकर या विधान परिषद में मनोनीत होकर सदन में पहुंचना होता है. अगर वह नेता इस संवैधानिक शर्त को पूरा करने में जरा भी चूक जाता है, तो संविधान के सख्त नियमों के तहत उसे अपनी मुख्यमंत्री या मंत्री की कुर्सी तुरंत खाली करनी पड़ती है. इस फैसले ने भारतीय लोकतंत्र में नेतृत्व चुनने की प्रक्रिया को हमेशा के लिए एक स्पष्ट दिशा दी है.

सवाल-जवाब

त्रिभुवन नारायण सिंह कौन थे?
त्रिभुवन नारायण सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे, जो 18 अक्टूबर 1970 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे.
त्रिभुवन नारायण सिंह के मुख्यमंत्री बनने पर विवाद क्यों हुआ?
उनके शपथ ग्रहण के समय वह न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के, इसलिए विपक्ष ने इसे संविधान के खिलाफ बताकर विरोध किया.
हर शरण वर्मा कौन थे और उन्होंने क्या किया?
हर शरण वर्मा लखनऊ के एक निवासी थे, जिन्होंने त्रिभुवन नारायण सिंह की मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति को असंवैधानिक बताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या करते हुए फैसला दिया कि बिना विधायक रहे भी कोई मुख्यमंत्री बन सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर सदस्यता लेनी होगी.
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