दुनिया भर के समुद्रों में बढ़ते तापमान के बीच जिस समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को सबसे ज्यादा लचीला और मजबूत माना जाता रहा है, अब वह भी जलवायु परिवर्तन की तीव्र मार से अछूता नहीं रह गया है। लाल सागर के उत्तरी हिस्से में मौजूद मूंगा चट्टानें, जिन्हें वैज्ञानिक उनकी असाधारण सहनशीलता की वजह से अक्सर 'सुपर कॉरल' का दर्जा देते रहे हैं, भीषण समुद्री लू और रिकॉर्ड तापमान की वजह से व्यापक ब्लीचिंग का सामना कर रही हैं। स्वेज कैनाल यूनिवर्सिटी में समुद्री जीव विज्ञान के प्रोफेसर और हुर्घदा एन्वायरनमेंटल प्रोटेक्शन एंड कंजर्वेशन एसोसिएशन (हेपका) के सलाहकार महमूद हनाफी के नेतृत्व में किए गए सर्वेक्षण में साल 2024 के दौरान समूचे लाल सागर के मूंगों में ब्लीचिंग की पुष्टि हुई है। इस अध्ययन के आंकड़े दिखाते हैं कि उत्तरी हिस्सों में जहां सर्वेक्षण की गई कॉरल कॉलोनियों में से दसवें हिस्से से भी कम पर असर पड़ा, वहीं दक्षिणी इलाकों की स्थिति बेहद चिंताजनक रही और वहां लगभग आधे मूंगे इस ब्लीचिंग की भेंट चढ़ गए।
गंभीर ब्लीचिंग की चपेट में क्यों आ रहे हैं मजबूत मूंगे
साल 2023 और 2024 की गर्मियों के दौरान आई जबरदस्त समुद्री लू ने लाल सागर के पूरे पर्यावरण तंत्र को भारी दबाव में ला दिया। जब समुद्र का पानी सामान्य सीमा से बहुत अधिक गर्म हो जाता है, तो मूंगों के ऊतकों में रहने वाले सूक्ष्म शैवाल विषैले तत्व पैदा करने लगते हैं। अपने बचाव के लिए मूंगे इन शैवालों को अपने शरीर से बाहर निकाल फेंकते हैं। इसी पूरी जैविक प्रक्रिया को कॉरल ब्लीचिंग कहा जाता है। चूंकि ये सूक्ष्म जीव ही मूंगों का मुख्य पोषण स्रोत होते हैं, शैवाल के अलग होते ही मूंगे भुखमरी की कगार पर पहुंच जाते हैं और उनका प्राकृतिक रंग उड़कर सफेद पड़ जाता है। यदि गर्म पानी का प्रभाव लंबे समय तक बना रहे, तो बड़े पैमाने पर मूंगों की मौत हो जाती है।
समुद्र के गर्म होने का यह खतरा केवल मूंगे की संरचना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन चट्टानों पर आश्रित समूचे समुद्री जीवन के अस्तित्व को खतरे में डालता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, यद्यपि मूंगा चट्टानें समुद्र तल के एक प्रतिशत से भी कम हिस्से को कवर करती हैं, फिर भी वे समुद्र की कम से कम पच्चीस प्रतिशत प्रजातियों को आश्रय और जीवन प्रदान करती हैं। इनमें से कई प्रजातियां तो ऐसी हैं जिनकी खोज वैज्ञानिक अभी हाल के वर्षों में ही कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में इन चट्टानों का नष्ट होना व्यापक जैव विविधता के लिए एक विनाशकारी झटका साबित हो सकता है।
प्राकृतिक विकास का ऐतिहासिक सुरक्षा कवच
कई दशकों तक उत्तरी लाल सागर के ये मूंगे वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान के बावजूद पूरी तरह स्थिर बने रहे, जबकि दुनिया के अन्य प्रमुख समुद्रों में भीषण ब्लीचिंग से चट्टानें बर्बाद हो रही थीं। किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (काउस्ट) के समुद्री पारिस्थितिकी विज्ञानी एस्लाम उस्मान का मानना है कि मिस्र के इन मूंगों की गर्मी सहने की क्षमता के पीछे उनका विशिष्ट विकासवादी इतिहास एक प्रमुख कारण हो सकता है।
वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार, मूंगे बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य के जरिए लाल सागर में फैले थे, जो जिबूती और यमन के बीच समुद्र के सबसे दक्षिणी बिंदु पर स्थित है। इस जलडमरूमध्य का पानी स्वाभाविक रूप से अत्यधिक गर्म रहा है। उस्मान के अनुसार, अत्यधिक गर्म जलमार्ग से होकर गुजरने की इस प्रक्रिया ने एक प्राकृतिक छलनी की तरह काम किया। इस कठिन यात्रा में केवल वही प्रजातियां और जीनोटाइप जीवित बच सके जो भारी गर्मी को सहन करने में सक्षम थे। बाद में इन्हीं सहनशील मूंगों की संतानों का फैलाव उत्तर की ओर ठंडे पानी वाले इलाकों में हुआ, जिससे उन्हें उच्च तापमान के प्रति एक असाधारण अनुवांशिक मजबूती हासिल हुई।
जल धाराओं के परिसंचरण से जुड़ी नई बहस
हालांकि, पूरे क्षेत्र में तापमान झेलने की यह क्षमता एक समान नहीं है। यही कारण है कि महमूद हनाफी केवल विकासवादी इतिहास को मिस्र की मूंगा चट्टानों की सुरक्षा का एकमात्र या मुख्य आधार मानने से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका जोर इस बात पर अधिक है कि समुद्र के पानी का भौतिक परिसंचरण और लहरों की गतिशीलता इन चट्टानों के लिए असली ढाल का काम करती रही है।
हनाफी के अनुसार, उत्तरी लाल सागर में पानी की धाराओं की दिशा में लगातार बदलाव देखने को मिलता रहता है। यह प्रक्रिया वर्टिकल मिक्सिंग यानी ऊर्ध्वाधर मिश्रण पैदा करती है, जिसके कारण समुद्र की गहराइयों से ठंडा पानी सतह की ओर लगातार ऊपर उठता रहता है। जब हवा का तापमान बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है, तब भी गहराइयों से आने वाला यह ठंडा पानी मूंगों के आसपास तापमान को संतुलित बनाए रखता है और उन्हें अतिरिक्त गर्मी के झटके से बचाता है।
इस वैज्ञानिक अंतर की समझ बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि इन चट्टानों का बचना मूंगों या उनके सहजीवी शैवालों की आंतरिक जीव विज्ञान पर नहीं बल्कि भौतिक जल धाराओं पर निर्भर करता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि 2024 में लाल सागर के मूंगों में अचानक ब्लीचिंग क्यों शुरू हो गई। साल 2024 की भीषण गर्मी के दौरान करीब डेढ़ महीने तक समुद्र असामान्य रूप से शांत बना रहा। इस ठहराव के चलते पानी का वह परिसंचरण कमजोर पड़ गया जो सामान्य दिनों में चट्टानों की रक्षा करता था। हेपका की रिपोर्ट में इस कमजोर जल प्रवाह को ब्लीचिंग को बढ़ावा देने वाला एक बड़ा कारक चिन्हित किया गया है। इसके अलावा, जुलाई 2024 में समुद्र में आए असाधारण रूप से निचले ज्वार ने भी उथले पानी में मौजूद कॉरल कॉलोनियों पर तनाव को और अधिक बढ़ा दिया।
एस्लाम उस्मान भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शांत समुद्र ने ब्लीचिंग की गंभीरता को बढ़ाया हो सकता है, लेकिन उनका कहना है कि इस परिसंचरण सिद्धांत पर अभी और गहन शोध की आवश्यकता है। उस्मान ने स्पष्ट किया कि मुख्य समस्या तापमान में अत्यधिक वृद्धि ही थी। दोनों वैज्ञानिकों के ये दृष्टिकोण एक-दूसरे के पूरी तरह विरोधी नहीं हैं, लेकिन भविष्य की लू की मार से इन चट्टानों की रक्षा की रणनीति तैयार करने के लिए यह समझना जरूरी है कि कौन सा कारक कितना प्रभावी है।
संरक्षण के प्रयास और स्थायी समाधान की चुनौती
भविष्य में आने वाली गर्मी की लहरों से पहले लाल सागर की इन अनमोल चट्टानों को बचाने के लिए नीतिगत कदम भी उठाए जा रहे हैं। मिस्र की सरकार ने कई नए संरक्षित क्षेत्र घोषित किए हैं। इसके साथ ही सतत प्रबंधन और संरक्षण को गति देने के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ग्लोबल फंड फॉर कॉरल रीफ्स के साथ विशेष साझेदारियां की गई हैं।
एस्लाम उस्मान इन पहलों को एक सकारात्मक कदम मानते हैं, लेकिन उनका जोर इस बात पर है कि ऐसे संरक्षण कार्यों को निरंतर वित्तीय समर्थन की दरकार होती है। उस्मान का कहना है कि संरक्षण कोई एक साल का काम नहीं है, इसके लिए अधिक स्थिर वित्तीय संसाधनों की जरूरत है। वहीं, हनाफी के लिए मिस्र की इन चट्टानों का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या जलवायु परिवर्तन समुद्र की उस धारा प्रणाली को ही बदल देगा जो अब तक इन मूंगों को बचाती आई है। हनाफी का मानना है कि उनकी मजबूती की वजह चाहे जो भी हो, स्थानीय संरक्षण समुद्र के बढ़ते तापमान को रोक नहीं सकता। उन्होंने साफ किया कि इसका असली समाधान कार्बन डाइऑक्साइड और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करना है, बाकी सभी उपाय केवल कुछ समय की मोहलत ही दिला सकते हैं।



















