अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और घरेलू राजनीति के टकराव के बीच एक नया राजनीतिक विवाद उस वक्त खड़ा हो गया जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर को लेकर बेहद सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारतीय विदेश मंत्री के बीच मुंबई में प्रस्तावित बैठक की सार्वजनिक चर्चा सामने आते ही इस पर सियासी बयानबाजी शुरू हो गई। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच X पर तंज कसते हुए आरोप लगाया कि मार्को रुबियो ने अपने कर्मचारी को मुंबई बुलाया है। विदेश नीति और द्विपक्षीय वार्ताओं के सामान्य प्रोटोकॉल पर दिए गए इस बयान ने देश के राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है, जिसके चलते अतीत के कई कूटनीतिक घटनाक्रम फिर से चर्चा में आ गए हैं।
प्रोटोकॉल और बैठकों की सूचना को लेकर विपक्ष का ऐतराज
इस पूरे मामले में राहुल गांधी के साथ ही कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी औपचारिक प्रक्रिया को लेकर मुख्य आपत्ति दर्ज कराई। विपक्ष का तर्क यह रहा कि दो संप्रभु देशों के विदेश मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक की आधिकारिक जानकारी भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से पहले जारी होने के बजाय एक विदेशी अधिकारी के माध्यम से सामने क्यों आई। इसी आधार को लेकर विपक्ष ने सरकार की कूटनीतिक स्वायत्तता पर सवाल उठाने शुरू किए और विदेश मंत्री के खिलाफ सख्त शब्दावली का प्रयोग किया।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय मामलों और वैश्विक कूटनीति के जानकारों के अनुसार जब दो प्रमुख राष्ट्रों के शीर्ष राजनयिक आपस में मिलने का कार्यक्रम तय करते हैं, तो उस वार्ता की जानकारी दोनों में से किसी भी पक्ष की तरफ से साझा की जा सकती है। दुनिया भर के राजनयिक मंचों पर यह एक सामान्य व्यवहार माना जाता है। ऐसे में कूटनीतिक संवाद की सूचना के स्रोत को लेकर सीधे किसी देश के विदेश मंत्री को दूसरे देश का कर्मचारी बता देना या कूटनीतिक गरिमा को कठघरे में खड़ा करना घरेलू राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा अधिक प्रतीत होता है।
2013 का इतिहास: जब सलमान खुर्शीद ने की थी पाकिस्तानी पीएम की मेजबानी
इस विवाद के गहराते ही यूपीए (UPA) सरकार के दौर का साल 2013 का एक वाकया भी अचानक सुर्खियों में आ गया है। तारीख थी 9 मार्च 2013, जब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में थी और सलमान खुर्शीद भारत के विदेश मंत्री के पद पर कार्यरत थे। उस समय पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ निजी यात्रा पर भारत पहुंचे थे। सलमान खुर्शीद ने जयपुर के ऐतिहासिक और भव्य रामबाग पैलेस होटल में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए एक विशेष निजी वर्किंग लंच आयोजित किया था।
उस दौर में भी इस लंच को भारत के कूटनीतिक शिष्टाचार और स्थापित राजनयिक परंपरा के तौर पर देखा गया था। यदि आज के राजनीतिक तर्क को लागू किया जाए, तो किसी विदेशी नेता के साथ वार्ता करने या लंच की मेजबानी करने से कोई भी विदेश मंत्री उस दूसरे देश का मातहत या कर्मचारी नहीं बन जाता। कूटनीतिक संवाद बनाए रखना विदेश मंत्रालय और उसके मंत्री का मूल दायित्व होता है। ऐसे में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एस. जयशंकर पर यह ठप्पा लगाना स्थापित कूटनीतिक प्रक्रियाओं की समझ पर सवाल खड़े करता है।
कूटनीति के स्थापित नियम: पेशेवर मर्यादा बनाम सियासी नैरेटिव
अंतरराष्ट्रीय संबंधों का बुनियादी सिद्धांत यही रहा है कि संवाद के रास्ते कभी पूरी तरह बंद नहीं किए जाते। एक विदेश मंत्री का प्राथमिक और पेशेवर दायित्व ही यह है कि वह अन्य देशों के नेताओं, विदेश मंत्रियों और प्रतिनिधियों से संवाद करे और द्विपक्षीय हितों को आगे बढ़ाए। वैश्विक स्तर पर ऐसे संवादों की व्यवस्था और समय दोनों पक्षों की सुविधा के अनुसार तय होते हैं।
जब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और विदेशी संबंधों को तात्कालिक घरेलू राजनीति और चुनावी बहसों में घसीटा जाता है, तो ऐसे आक्रामक नैरेटिव भले ही राजनीतिक रूप से सुर्खियां बटोर लें, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इससे देश की संस्थागत साख और विदेश नीति की निरंतरता पर असर पड़ता है। राजनीतिक अखाड़े में तीखी टिप्पणियां और आरोप प्रत्यारोप सामान्य बात हो सकते हैं, लेकिन विदेशी मामलों को विशुद्ध घरेलू वाद विवाद का विषय बना देना कूटनीतिक दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि कूटनीति को कूटनीति के पेशेवर चश्मे से ही देखा जाना चाहिए, न कि केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ के हथियार के रूप में।



















