उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में आने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर जनता का मिजाज भांपने वाले एक सर्वे के आंकड़े सामने आए हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि राज्यों में प्रशासनिक कामकाज, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे चुनावी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल और सत्ताधारी पार्टी के बीच का मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है, जबकि उत्तराखंड और पंजाब में राजनीतिक समीकरण अपनी अलग कहानी बयां कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में सरकार के प्रदर्शन और मुख्य मुद्दों पर जनता की राय
उत्तर प्रदेश के चुनावी सर्वे के अनुसार, राज्य सरकार के कामकाज से 52 फीसदी लोग पूर्णतः संतुष्ट, संतुष्ट या फिर औसत रूप से संतुष्ट हैं। वहीं, जब स्थानीय विधायकों के प्रदर्शन को लेकर लोगों से सवाल किया गया तो इन श्रेणियों में मिलाकर करीब 44 फीसदी लोगों ने ही संतोष व्यक्त किया। इससे जाहिर होता है कि विधायकों के प्रति नाराजगी के बावजूद सरकार के समग्र प्रदर्शन पर जनता का भरोसा अपेक्षाकृत बेहतर बना हुआ है।
मतदाताओं से जुड़े बुनियादी सरोकारों की बात करें तो बेरोजगारी सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर सामने आई है। रोजगार की चिंता के बाद लोगों ने शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति और बढ़ती महंगाई को प्राथमिकता वाला मुद्दा माना है। चुनाव में मतदान करते समय 25 फीसदी मतदाताओं ने पार्टी की विचारधारा को सबसे ज्यादा अहमियत देने की बात कही है। इसके अलावा 22 फीसदी लोगों के लिए विकास और जनहित के मुद्दे सबसे ऊपर रहे, जबकि 13.5 फीसदी मतदाताओं ने मुख्यमंत्री के चेहरे को ध्यान में रखकर वोट देने की बात स्वीकार की। आंकड़ों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि 64 फीसदी मतदाता अपना मन बना चुके हैं कि उन्हें किसे वोट देना है, वहीं 36 फीसदी लोग अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं या अपनी राय को स्पष्ट करने से बच रहे हैं।
मुख्यमंत्री पद की पसंद और भाजपा-सपा के बीच घटता अंतर
मुख्यमंत्री पद की पहली पसंद को लेकर पूछे गए सवाल पर योगी आदित्यनाथ सबसे आगे रहे, जिन्हें 43.4 फीसदी लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ। वहीं समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव 35.5 फीसदी समर्थन के साथ दूसरे स्थान पर बने हुए हैं। राजनीतिक दलों और गठबंधनों के समर्थन के मामले में भारतीय जनता पार्टी को 41.8 फीसदी और समाजवादी पार्टी को 38.7 फीसदी वोट मिलने का अनुमान जताया गया है। इस तरह दोनों प्रमुख प्रतिस्पर्धियों के बीच करीब 3 फीसदी का ही अंतर दिखाई दे रहा है।
चुनावी आंकड़ों के ऐतिहासिक परिदृश्य पर ध्यान दें तो 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा और सपा के बीच वोट प्रतिशत का अंतर लगभग 13 फीसदी दर्ज किया गया था। 2022 के चुनाव में यह अंतर घटकर लगभग 7 फीसदी पर आ गया था और अब ताजा सर्वे में यह सिमटकर करीब 3 फीसदी रह गया है। हालांकि, चुनावी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रैकर सर्वे के आधार पर सीधे वोट प्रतिशत का सटीक आकलन करना आसान नहीं होता। मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता और सरकार के कामकाज के मूल्यांकन के लिए अलग-अलग पैमानों और सवालों की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही पद पर बने रहने वाले मुख्यमंत्री को स्वाभाविक रूप से पद का लाभ भी मिलता है।
विकास कार्य, कानून-व्यवस्था और युवा वोटरों के रुझान
उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल की बढ़त के पीछे मजबूत कानून-व्यवस्था, महिलाओं में सुरक्षा का अहसास, सरकारी नौकरियों में पारदर्शी नियुक्तियां और इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से होता विस्तार मुख्य वजह माना जा रहा है। राज्य में नए एक्सप्रेसवे, अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय एयरपोर्ट, नए उद्योगों के आगमन और मेडिकल कॉलेजों के निर्माण जैसे विकास कार्यों का असर सीधे तौर पर मतदाता के रुख पर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ, युवा मतदाताओं के आंकड़ों ने एक नया विमर्श खड़ा किया है। सर्वे में 18 से 24 वर्ष की आयु वर्ग के युवाओं के बीच अखिलेश यादव को योगी आदित्यनाथ की तुलना में अधिक तरजीह मिलते हुए दर्शाया गया है। हालांकि, चुनावी विश्लेषकों ने युवा वर्ग के इस विशिष्ट आंकड़े के सैंपल और सर्वे प्रणाली पर सवाल भी उठाए हैं और इसे पूर्ण निष्कर्ष मानने से सतर्क रहने की सलाह दी है।
उत्तराखंड और पंजाब में राजनीतिक हवा का रुख
पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के संदर्भ में सर्वे के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय जनता पार्टी 41 फीसदी वोट समर्थन के साथ बढ़त बनाए हुए है, जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस 36 फीसदी समर्थन के साथ दूसरे स्थान पर है। मुख्यमंत्री के रूप में पुष्कर सिंह धामी को करीब 28 फीसदी लोगों की पहली पसंद बताया गया है। विश्लेषण के अनुसार राज्य में पार्टी के स्तर पर भाजपा मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है, लेकिन मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता का आंकड़ा पार्टी के प्रदर्शन की तुलना में कम रहने पर राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं।
पंजाब की राजनीतिक स्थिति पर नजर डालें तो आम आदमी पार्टी की सरकार की अप्रूवल रेटिंग 55 फीसदी दर्ज की गई है। चुनावी समर्थन के लिहाज से आम आदमी पार्टी 34 फीसदी वोट के साथ सबसे आगे है, जबकि कांग्रेस 30 फीसदी समर्थन के साथ दूसरे पायदान पर बनी हुई है। पंजाब में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित चुनावी गठबंधन को लेकर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है, जिससे वहां मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय बना हुआ है।
चुनावी नतीजों पर सर्वे का प्रभाव और अंतिम कारक
इन तमाम आंकड़ों का समग्र निष्कर्ष यही है कि सर्वे के परिणाम केवल किसी खास समय पर जनता के मूड का एक शुरुआती संकेत होते हैं। वास्तविक चुनावी परिणाम कई अन्य जटिल कारकों पर निर्भर करते हैं। वोट प्रतिशत का सीटों में परिवर्तन, सामाजिक और जातीय समीकरण, उम्मीदवारों का चयन तथा प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की स्थानीय समस्याएं अंतिम नतीजों को बदलने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।




















