महाराष्ट्र के पुणे शहर में आयोजित हुए 'गूंज' नामक छात्र आउटरीच कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस कार्यक्रम के जरिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने युवाओं और छात्रों के मुद्दों पर व्यापक संवाद स्थापित करने की कोशिश की थी। कार्यक्रम के बाद उनके समर्थक उन्हें एक बड़े जननेता और प्रधानमंत्री पद के सशक्त दावेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। हालांकि, राजनीतिक विरोधियों ने कांग्रेस पार्टी के भीतर की प्रतिक्रिया का डेटा सामने रखकर यह दावा किया है कि इस आयोजन को खुद कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों और प्रमुख नेताओं से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। इस अंदरूनी उदासीनता के बीच, कांग्रेस नेतृत्व ने अपना ध्यान एक बार फिर देश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी और जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर केंद्रित कर दिया है।
पुणे में 'गूंज' कार्यक्रम पर सोशल मीडिया पर कांग्रेस नेताओं की उदासीनता
बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने एक प्रेस वार्ता में कांग्रेस पार्टी के आंतरिक सोशल मीडिया आंकड़ों का विस्तृत ब्योरा जारी किया। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी के पुणे स्थित 'गूंज' इवेंट को पार्टी के भीतर ही नजरअंदाज किया गया। जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, कांग्रेस पार्टी के कुल 249 राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारियों में से केवल 113 नेताओं ने ही अपने एक्स प्लेटफॉर्म पर इस छात्र सम्मेलन से जुड़ा कोई पोस्ट शेयर किया। इसके अतिरिक्त, फोटो और वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर 249 पदाधिकारियों में से महज 48 नेताओं ने कार्यक्रम से जुड़ी सामग्री पोस्ट की। डेटा यह भी दर्शाता है कि 83 पदाधिकारी ऐसे रहे, जिन्होंने किसी भी प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस आयोजन का कोई उल्लेख तक नहीं किया।
बीजेपी नेता ने विशेष रूप से कांग्रेस की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च इकाई यानी सीडब्ल्यूसी के प्रमुख सदस्यों और वरिष्ठ नेताओं का नाम उजागर किया। उन्होंने दावा किया कि मनीष तिवारी, चरणजीत सिंह चन्नी और अजय माकन जैसे वरिष्ठ नेताओं के आधिकारिक हैंडल से इस कार्यक्रम के समर्थन में कोई सकारात्मक टिप्पणी नहीं आई। बीजेपी का कहना है कि आज के दौर में जब हर राजनीतिक विमर्श की लड़ाई डिजिटल माध्यमों पर लड़ी जा रही है, तब अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं का एक बड़े आउटरीच कार्यक्रम पर चुप रहना यह संकेत देता है कि राहुल गांधी के इस अभियान को पार्टी के अंदर भी एक बनावटी पीआर पहल के रूप में देखा जा रहा है।
बीजेपी का आरोप: जेनरेशन ज़ेड के नेता के रूप में स्वीकार्यता पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों और विरोधी दल के प्रवक्ताओं का तर्क है कि राहुल गांधी को युवाओं यानी जेनरेशन ज़ेड के सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिशें खुद उनकी पार्टी के ढांचे के भीतर चुनौती झेल रही हैं। प्रदीप भंडारी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि जब सीडब्ल्यूसी के सदस्य खुद राहुल गांधी के छात्र केंद्रित 'गूंज' कार्यक्रम के बारे में सोशल मीडिया पर एक भी सकारात्मक बात नहीं लिखते, तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी का अंदरूनी नेतृत्व भी इस पीआर अभियान से पूरी तरह सहमत नहीं है। बीजेपी का दावा है कि यह स्थिति दिखाती है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की जन-आउटरीच रणनीति से खुद को दूर रख रहे हैं।
ओबीसी राजनीति का रुख: पीएम मोदी को लिखा गया विस्तृत पत्र
छात्र कार्यक्रम पर उठे इस राजनीतिक विवाद के बीच राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अपनी रणनीति बदलते हुए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला है। दोनों नेताओं ने संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री को एक औपचारिक पत्र लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली आगामी जाति जनगणना की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार जिस ढांचे के तहत जनगणना कराने की योजना बना रही है, उससे देश में पिछड़ा वर्ग की सही और सटीक आबादी का पता लगाना संभव नहीं हो सकेगा।
प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में राहुल गांधी ने जनगणना के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों के प्रारूप पर तकनीकी आपत्ति जताई है। पत्र में कहा गया है कि खुले उत्तर वाले यानी ओपन एंडेड प्रश्नों के जरिए जातियों की वास्तविक गिनती करना एक भ्रामक तरीका है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक ही जाति को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों, राज्यों और भाषाओं में विभिन्न नामों, उपजातियों या स्थानीय शब्दावलियों के साथ दर्ज किया जाता है। यदि जनगणना में उत्तरदाता द्वारा बताए गए नाम को सीधे दर्ज कर लिया गया, तो एक ही मूल जाति हजारों अलग-अलग नामों में बंट जाएगी।
खुले प्रश्नों और ड्रॉप-डाउन विकल्प पर तकनीकी असहमति
राहुल गांधी ने पत्र में तर्क दिया है कि खुले प्रश्नों के कारण डेटा संग्रह के दौरान लाखों जातियों के नाम दर्ज हो जाएंगे, जिससे जनगणना का पूरा सांख्यिकीय डेटा अप्रभावी हो जाएगा। ऐसी स्थिति में देश में ओबीसी समाज की वास्तविक जनसांख्यिकी और उनकी सही संख्या का निर्धारण कर पाना असंभव हो जाएगा। पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि वर्तमान में प्रस्तावित जनगणना प्रश्नावली के प्रारूप में पिछड़े वर्ग शब्द का स्पष्ट समावेश तक नहीं है।
इस समस्या के समाधान के रूप में कांग्रेस नेतृत्व ने सरकार के सामने एक ठोस प्रस्ताव रखा है। राहुल गांधी की मांग है कि सरकार को मौजूदा जनगणना प्रश्नावली को तुरंत रद्द कर देना चाहिए और सभी हितधारकों से विचार-विमर्श करके एक नई प्रश्नावली तैयार करनी चाहिए। इस नई व्यवस्था में जातियों की एक पूर्व-निर्धारित ड्रॉप-डाउन सूची शामिल की जानी चाहिए, ताकि डेटा दर्ज करते समय किसी भी प्रकार का भ्रम न रहे। कांग्रेस का कहना है कि जिस तरह से बिहार और तेलंगाना राज्यों में जातिगत सर्वेक्षण कराए गए थे, ठीक उसी वैज्ञानिक और संरचित पद्धति को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाना चाहिए। अपने दावों के समर्थन में राहुल गांधी ने तेलंगाना और बिहार में इस्तेमाल की गई आधिकारिक जाति सूचियों की प्रतियां भी प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र के साथ संलग्न की हैं।
बिहार और तेलंगाना के मॉडल की सिफारिश और पूर्व बयानों का विरोधाभास
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर मीडिया के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर 2027 की जनगणना की शुरुआत हो चुकी है, इसलिए सरकार को बिहार और तेलंगाना के सफल जातिगत सर्वेक्षणों के अनुभव से सीखते हुए वही प्रणाली अपनानी चाहिए। जयराम रमेश का मानना है कि राज्यों के इन मॉडलों से ही सटीक सामाजिक-आर्थिक आंकड़े हासिल किए जा सकते हैं।
हालांकि, इस पूरी बहस का एक दिलचस्प पहलू राहुल गांधी के पिछले बयानों से जुड़ा हुआ है। विरोधी दलों ने ध्यान दिलाया है कि जिस बिहार जाति सर्वेक्षण को अब कांग्रेस मॉडल के रूप में पेश कर रही है, उसी सर्वेक्षण को पिछले वर्ष पटना में एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया था। उस समय पटना में बोलते हुए राहुल गांधी ने बिहार के जाति सर्वेक्षण को पूरी तरह से नकली करार दिया था और कहा था कि वह लोगों को गुमराह करने वाली किसी प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करेंगे तथा सच्चा डेटा सामने लाने के लिए लड़ाई जारी रखेंगे। अब वही तरीका राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की वकालत करने पर राजनीतिक गलियारों में इस नीतिगत बदलाव पर सवाल उठाए जा रहे हैं।




















