राजस्थान के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में उस समय भारी खलबली मच गई जब राज्य सरकार ने एक वरिष्ठ नौकरशाह दंपती से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने के मामले में सख्त कदम उठाया। सरकार की ओर से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-A के तहत आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल के खिलाफ औपचारिक जांच की अनुमति दे दी गई है। इस प्रशासनिक मंजूरी के तत्काल बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने अपनी प्राथमिक जांच दर्ज करने की कवायद शुरू कर दी है। इसी कड़ी में कड़ा संदेश देते हुए सरकार ने उनकी पत्नी वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी प्रशाखा माथुर को भी एपीओ (पदस्थापन आदेशों की प्रतीक्षा में) कर दिया है। इसके अलावा विवादों के केंद्र में आई निजी फर्म गोयल फैशंस को पूर्व में स्वीकृत किए गए भारी-भरकम आर्थिक पैकेज को भी वापस लेने की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
पद के दुरुपयोग और अवैध लाभ पहुंचाने के संगीन आरोप
इस पूरे प्रकरण की तह में आईएएस शिखर अग्रवाल द्वारा अपने पद और प्रभाव का बेजा इस्तेमाल कर निजी फर्म गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड को भारी वित्तीय फायदा पहुंचाने का मामला सामने आया है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को धारा 17-A के तहत मिली आधिकारिक हरी झंडी के बाद जांच दल अब पूरे घटनाक्रम की गहन छानबीन में जुट गया है। एसीबी अपनी प्राथमिक जांच के दौरान दर्ज शिकायत, उससे जुड़े तमाम सहायक दस्तावेजों, सरकारी फाइलों, विभागों द्वारा लिए गए नीतिगत फैसलों और पत्रावलियों का बारीकी से परीक्षण करेगी। मामले से जुड़े उच्चाधिकारियों और संबंधित पक्षों को तलब कर उनके बयान दर्ज किए जाने की भी पूरी संभावना है। प्रारंभिक पड़ताल में यदि आरोपों के समर्थन में पुख्ता साक्ष्य और तथ्य सामने आते हैं, तो इस मामले में जल्द ही नियमित एफआईआर दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासनिक गलियारों में इस हलचल की शुरुआत उस समय हुई जब राजस्थान के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के महानिदेशक गोविंद गुप्ता से एक अहम बैठक की। इस उच्चस्तरीय विचार-विमर्श के बाद ही जांच एजेंसी ने अपनी कार्रवाई की गति को तेज किया और सरकार की ओर से जांच को औपचारिक हरी झंडी मिली।
ढाई साल में 40 विला और कॉटेज की रहस्यमयी खरीद
जांच का सबसे प्रमुख केंद्र बिंदु आईएएस शिखर अग्रवाल, उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर और उनके करीबी पारिवारिक सदस्यों के नाम पर दर्जनों संपत्तियों की खरीद का संदेहास्पद खेल है। सामने आए विवरण के अनुसार महज ढाई साल की छोटी समयावधि के भीतर एक ही कंपनी से 20 विला और 20 आलीशान कॉटेज खरीदे गए। इन कुल 40 अचल संपत्तियों की खरीद का मूल्य लगभग 6.15 करोड़ रुपये दर्शाया गया है।
सामने आए आरोपों के मुताबिक यह पूरी खरीद-फरोख्त उदयपुर के बुझड़ा और अलवर के अजबगढ़ में मौजूद अनंता रिसॉर्ट की संपत्तियों से जुड़ी है। प्रारंभिक खुलासे बताते हैं कि शिखर अग्रवाल और उनकी पत्नी प्रशाखा माथुर के नाम पर 10-10 विला दर्ज किए गए। इसके अतिरिक्त अजबगढ़ स्थित रिसॉर्ट परिसर में प्रशाखा माथुर, दंपती के दोनों बेटों और सास-ससुर के नाम पर भी विला की रजिस्ट्री कराई गई। इस पूरे लेनदेन में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन लग्जरी संपत्तियों को जानबूझकर बाजार दर से बेहद कम कीमत पर खरीदा गया ताकि काले धन या रिश्वत के बदले अनुचित लाभ को समायोजित किया जा सके।
खरीदी गई संपत्तियों को उसी कंपनी को लीज पर देकर भारी कमाई
इस सौदेबाजी में केवल संपत्तियों की खरीद ही सवालों के घेरे में नहीं है, बल्कि उसके बाद का वित्तीय ढांचा भी जांच एजेंसियों के रडार पर है। आरोपों के अनुसार खरीदे गए सभी विला और कॉटेज को फौरन उसी संबंधित निजी कंपनी को दोबारा लीज पर सौंप दिया गया। इस लीज व्यवस्था के जरिए अधिकारियों को हर साल लगभग 1.80 करोड़ रुपये की मोटी किराया आय हासिल होने की बात सामने आई है।
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो अब इस बात की पड़ताल में जुटा है कि क्या यह लीज समझौता किसी गुप्त रिश्वत की भरपाई का जरिया था। इसके साथ ही विला की खरीद के वित्तीय स्रोतों, लीज अनुबंध की शर्तों और संबंधित अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों द्वारा हर साल सरकार को सौंपी जाने वाली अचल संपत्ति विवरणी (आईपीआर) में इन संपत्तियों के वास्तविक उल्लेख की गहराई से जांच की जाएगी। शिखर अग्रवाल के खिलाफ एसीबी जांच के आदेश के तुरंत बाद आईपीएस प्रशाखा माथुर का एपीओ आदेश जारी होना यह दर्शाता है कि सरकार इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रही है।
गोयल फैशंस को मिली विशेष सरकारी रियायतें रद्द करने की तैयारी
इस पूरे भ्रष्टाचार प्रकरण की धुरी बनी निजी कंपनी गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड को दिए गए विशेष आर्थिक पैकेज की वैधता पर भी अब तलवार लटक गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार 27 मार्च 2026 को अलवर जिले के अजबगढ़ में स्थित रिसॉर्ट परियोजना के लिए इस कंपनी को असाधारण सरकारी रियायतों का तोहफा दिया गया था। इस विशेष पैकेज में कंपनी को आगामी 10 वर्षों तक स्टेट टैक्स में 75 प्रतिशत की भारी सब्सिडी और बिजली शुल्क में पूरे 100 प्रतिशत की छूट प्रदान की गई थी। इसके अलावा स्टांप ड्यूटी, कृषि भूमि रूपांतरण शुल्क में छूट और परियोजना में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन के लिए सरकारी अनुदान जैसी आकर्षक सुविधाएं भी मंजूर की गई थीं।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह सामने आया है कि जिस तारीख यानी 27 मार्च 2026 को कंपनी के लिए यह भारी-भरकम आर्थिक पैकेज जारी किया गया, ठीक उसी दिन कंपनी द्वारा 20 विला की रजिस्ट्री भी कराई गई थी। इस संदेहास्पद तारीख और सीधे संबंध को देखते हुए राज्य सरकार अब गोयल फैशंस को दी गई इन तमाम कर छूटों और रियायतों को पूरी तरह निरस्त करने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे रही है।
एसीबी की प्राथमिक जांच पर टिकी प्रशासनिक निगाहें
फिलहाल भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच का दायरा संपत्तियों की खरीद-बिक्री की वास्तविक बाजार कीमत, लीज एग्रीमेंट से प्राप्त होने वाले सालाना 1.80 करोड़ रुपये के किराये और गोयल फैशंस को दिए गए सरकारी खजाने के लाभ के बीच की कड़ियों को जोड़ने पर केंद्रित है। एसीबी की जांच टीम आईएएस शिखर अग्रवाल, आईपीएस प्रशाखा माथुर, निजी कंपनी के निदेशकों और इस निर्णय प्रक्रिया में शामिल रहे अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों की भूमिका की बारीकी से जांच करेगी। अब पूरे प्रदेश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्राथमिक जांच के निष्कर्ष क्या निकलते हैं और किन धाराओं में औपचारिक एफआईआर दर्ज होती है।




















