इंदिरा गांधी नहर परियोजना (आईजीएनपी) के प्रथम चरण के सिंचित इलाकों में सिंचाई पानी की भारी किल्लत और खरीफ फसलों के सूखने से उपजा असंतोष अब व्यापक जनआंदोलन की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है। अनूपगढ़ में अतिरिक्त जिला कलक्टर कार्यालय के समक्ष जुटे किसानों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी समस्याओं का ठोस समाधान नहीं निकलता, संघर्ष विराम का कोई सवाल नहीं उठता। किसान प्रतिनिधियों ने प्रशासन और राज्य सरकार को सीधे शब्दों में आगाह किया है कि यदि उनकी जायज मांगें स्वीकार नहीं की गईं, तो वे 2004 के ऐतिहासिक घड़साना-रावला आंदोलन जैसा तीखा संघर्ष दोबारा शुरू करने के लिए विवश होंगे। किसान नेतृत्व का कहना है कि वे अब केवल मौखिक वादों या आश्वासनों से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं और इस बार आर-पार का फैसला लेकर ही लौटेंगे। इस जनआक्रोश का असर मंगलवार को बाजारों में भी साफ देखा गया, जहां किसानों के समर्थन में रावला कस्बे और 365 हेड के व्यापारिक प्रतिष्ठान पूरी तरह बंद रहे। आंदोलनकारियों ने अपने संघर्ष को और गति देते हुए 24 सितंबर को पूरे क्षेत्र में पूर्ण चक्का जाम करने की सार्वजनिक घोषणा कर दी है।
प्रशासनिक वार्ताओं का लंबा दौर रहा बेनतीजा
आंदोलन की पृष्ठभूमि में सोमवार को दिन भर चला घटनाक्रम बेहद तनावपूर्ण बना रहा। किसानों ने सुबह 10 बजे से लेकर देर रात लगभग 12 बजे तक लगातार अपनी सभा जारी रखी। किसानों के भारी दबाव और मांग को देखते हुए सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता को वार्ता के लिए बुलाया गया था, परंतु मैराथन बातचीत के बावजूद कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। सोमवार आधी रात तक दोनों अतिरिक्त जिला कलक्टरों, स्थानीय उपखंड अधिकारी (एसडीएम) और सिंचाई विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चली लंबी बातचीत विफल रहने के बाद मंगलवार को भी किसानों का अनिश्चितकालीन महापड़ाव लगातार जारी रहा। अनूपगढ़ में एडीएम दफ्तर के बाहर किसानों के धरने का मंगलवार को तीसरा दिन था। हालात की संवेदनशीलता और बिगड़ते माहौल को संभालने के लिए जिला कलक्टर अमित यादव और पुलिस अधीक्षक हरी शंकर स्वयं मौके पर पहुंचे और किसान प्रतिनिधियों से सीधे संवाद का प्रयास किया।
चार सूत्रीय मांग पत्र पर किसानों का सख्त रुख
जिला प्रशासन और जिला कलक्टर अमित यादव के साथ आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में आंदोलन की अगुवाई कर रहे प्रमुख किसान नेता श्योपत मेघवाल और अन्य प्रतिनिधिमंडल ने अपनी बात दो-टूक अंदाज में रखी। किसानों ने प्रशासन के सामने अपना चार सूत्रीय मांग पत्र पेश किया, जिसमें पहली और प्राथमिक मांग यह रखी गई कि नहरों को चार में से दो समूह में चलाने का स्पष्ट लिखित आदेश तत्काल जारी किया जाए। किसानों की दूसरी प्रमुख मांग खरीफ (सावनी) की फसल बर्बाद होने के सीधे जिम्मेदार के तौर पर सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता प्रदीप रस्तोगी पर केंद्रित रही। किसान नेताओं ने उन्हें तुरंत पद से हटाने अथवा उनका स्थानांतरण करने की सख्त मांग उठाई। इसके साथ ही, तीसरी मांग के तहत पानी के अभाव में सूख चुकी फसलों का प्रारंभिक सर्वेक्षण कर प्रभावित किसानों को तुरंत उचित वित्तीय मुआवजा और फसल बीमा क्लेम का भुगतान सुनिश्चित करने की बात कही गई। किसानों ने चौथी मांग के रूप में अनूपगढ़ शाखा प्रणाली के तहत पानी वितरण की पुरानी समस्याओं का हमेशा के लिए स्थाई समाधान निकालने का आग्रह किया।
अजमेर जल समझौते की अनदेखी और उग्र आंदोलन की चेतावनी
बैठक कक्ष से बाहर निकलने के बाद किसान नेता श्योपत मेघवाल के तेवर बेहद सख्त नजर आए। उन्होंने सिंचाई विभाग के शीर्ष अधिकारियों पर हठधर्मिता और दोषपूर्ण रेगुलेशन लागू करने का सीधा आरोप लगाया, जिसकी वजह से प्रथम चरण के हजारों काश्तकारों द्वारा पसीने से सींची गई खरीफ फसलें खेतों में ही नष्ट हो गईं। मेघवाल ने याद दिलाया कि ऐतिहासिक अजमेर जल समझौते के तहत प्रथम चरण के लिए 58 फीसदी पानी सुरक्षित और आरक्षित किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग इस कानूनी हक की अनदेखी कर मनमानी पर उतारू है और जल उपलब्धता को लेकर बांधों के पानी के भ्रामक आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। किसान नेता ने कहा कि जिला कलक्टर ने उनकी मांगों को राज्य सरकार के पास भेजने का आश्वासन दिया है, लेकिन किसान अब केवल आश्वासनों पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं।
2004 और 2021 के संघर्ष को दोहराने की तैयारी
श्योपत मेघवाल ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते किसानों के पक्ष में नहरों के लिखित रेगुलेशन और जिम्मेदार अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई का निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन अभूतपूर्व रूप से उग्र हो जाएगा। उन्होंने कहा कि किसान 2004 के चर्चित घड़साना-रावला आंदोलन और 2021 के लंबे चक्का जाम जैसे जनसंघर्ष को दोबारा जमीन पर उतारने से पीछे नहीं हटेंगे। आने वाले दिनों में समूचे प्रथम चरण के क्षेत्र में प्रशासनिक कामकाज को पूरी तरह ठप करने की रूपरेखा बनाई जा रही है। अधिकारियों के साथ वार्ता बेनतीजा समाप्त होने के फौरन बाद महापड़ाव स्थल पर जुटे किसानों ने आपात बैठक की, जिसमें पूरे प्रथम चरण क्षेत्र में आंदोलन का दायरा बढ़ाने और बड़े पैमाने पर राजमार्गों तथा सड़कों को अवरुद्ध करने की रणनीति तैयार की गई।
जिला कलक्टर का पक्ष: राहत और नीतिगत निर्णयों पर स्थिति स्पष्ट
किसान संगठनों के साथ हुई लंबी वार्ता के पश्चात जिला कलक्टर अमित यादव ने प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि घड़साना में विगत 13 दिनों से चल रहे स्थानीय धरने और अनूपगढ़ में एडीएम कार्यालय के समक्ष तीन दिन से जारी किसानों के महापड़ाव को गंभीरता से लेते हुए सभी मांगों पर बिंदुवार चर्चा की गई है। कलक्टर ने आश्वस्त किया कि फसलों के नुकसान से जुड़े आकलन का प्रशासनिक कार्य लगभग पूरा किया जा चुका है और इसकी रिपोर्ट तुरंत राज्य स्तर पर भेजी जा रही है ताकि पीड़ित किसानों को आर्थिक राहत प्रदान की जा सके। नहरी पानी के रेगुलेशन और वितरण के जटिल मुद्दे पर उन्होंने स्पष्ट किया कि भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड (बीबीएमबी) की बैठक के बाद ही जल परामर्शदात्री समिति, जिसमें क्षेत्र के सभी निर्वाचित जनप्रतिनिधि सदस्य होते हैं, के स्तर पर अंतिम निर्णय किया जाता है। जैसे ही जल आवंटन की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी, इस समिति की बैठक तुरंत बुलाई जाएगी।
मुख्य अभियंता पर निर्णय और फसल बीमा सर्वे की प्रक्रिया
सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता प्रदीप रस्तोगी को हटाने और उन्हें जल परामर्शदात्री समिति की बैठकों से दूर रखने की किसानों की मांग पर जिला कलक्टर अमित यादव ने स्थिति साफ करते हुए कहा कि यह विशुद्ध रूप से एक नीतिगत फैसला है, जो राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है। उन्होंने बताया कि किसानों की तीव्र भावनाओं और इस मांग से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट राज्य सरकार के उच्च स्तर पर विचारार्थ भेजी जा रही है। इसके अलावा, फसल बीमा क्लेम और सर्वे में विसंगतियों की शिकायतों पर जिला कलक्टर ने कहा कि बीमा कंपनी, राजस्व विभाग और कृषि विभाग की संयुक्त टीमें निर्धारित नियमों के तहत ही सर्वेक्षण कार्य करती हैं। यदि किसी भी काश्तकार को सर्वे रिपोर्ट या क्षति आकलन पर कोई आपत्ति है, तो उसे नियमानुसार समीक्षा कमेटी के समक्ष अपनी अपील प्रस्तुत करने का पूरा कानूनी अधिकार प्राप्त है।


















