राजस्थान के अधिकांश हिस्सों से मानसूनी बादलों की रवानगी की प्रक्रिया काफी तेज हो चुकी है। राज्य के पश्चिमी भूभागों को पार करते हुए मानसून वापसी की मुख्य सीमा रेखा अब बाड़मेर से लेकर कोटपूतली तक खिंच चुकी है। भौगोलिक तौर पर देखें तो आधे से अधिक राज्य के दायरे से मानसून पूरी तरह पीछे हट चुका है। मौसम वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार, आने वाले लगभग एक सप्ताह के भीतर मानसून राजस्थान की भौगोलिक सीमाओं को लांघकर पूरी तरह विदा हो जाएगा। मौसम का यह चक्र इसलिए बेहद चौंकाने वाला है क्योंकि ठीक एक वर्ष पूर्व राज्य में बारिश ने 108 वर्षों का सर्वकालिक सकारात्मक रिकॉर्ड बनाया था, जबकि चालू सीजन में 17 वर्षों का सबसे निराशाजनक नकारात्मक रिकॉर्ड दर्ज हुआ है। बादलों की इस भारी बेरुखी ने अन्नदाताओं और राज्य प्रशासन दोनों के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
औसत से 21 फीसदी कम बरसात और सूखते जलाशय
मौसम विभाग के सामान्य मानकों के तहत राजस्थान से मानसूनी हवाओं की औपचारिक विदाई सामान्यतः सितंबर महीने के समापन के साथ पूरी मानी जाती है। मौजूदा सीजन में भी वापसी की यह प्रक्रिया लगभग 25 सितंबर से 30 सितंबर के बीच मुकम्मल होने का अनुमान लगाया गया है। आधिकारिक वर्षा आंकड़ों का विश्लेषण करें तो चालू मानसूनी सत्र में 21 सितंबर की रात्रि तक समूचे राजस्थान में केवल 335.5 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई है। इसके उलट, ऐतिहासिक रूप से इसी समयावधि के दौरान राज्य में सामान्य वर्षा का औसत स्तर 425.4 मिलीमीटर रहता है।
इन सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर प्रदेश में इस बार सामान्य की तुलना में 21 फीसदी कम बरसात हुई है। राज्य के अनेक जिले और तहसीलें अपनी सामान्य औसत बारिश की पूर्ति के लिए भी तरसते रह गए। बारिश में आई इस व्यापक कमी का सीधा असर जलस्रोतों पर पड़ा है, जिसके चलते अधिकांश प्रमुख बांधों में उम्मीद से बेहद कम पानी एकत्र हुआ है। कई महत्वपूर्ण जलाशयों में तो नाममात्र का जल संचय दर्ज किया गया है, जो आगामी महीनों में पेयजल और सिंचाई प्रबंधन के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकता है।
साल 2009 के बाद 17 वर्षों का सबसे कमजोर सत्र
वर्षा के ताजा आंकड़े यह स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि राजस्थान पिछले 17 वर्षों के दौरान अपने सबसे कमजोर मानसून के दौर से गुजर रहा है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में प्रदेश ने भीषण सूखे का सामना किया था, जब राज्य में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश दर्ज हुई थी। उस ऐतिहासिक सूखे के बाद के अधिकांश वर्षों में मानसूनी स्थिति तुलनात्मक दृष्टि से काफी बेहतर और संतोषजनक बनी रही थी।
हालांकि विदाई की इस वेला में भी कोटा और भरतपुर संभाग के कुछ सीमित इलाकों में आगामी दिनों के दौरान हल्की से मध्यम फुहारों का छिटपुट दौर देखने को मिल सकता है। मौसम विज्ञानियों का मानना है कि इन छिटपुट बौछारों से कुल वर्षा के संचयी आंकड़ों में कोई खास बड़ा इजाफा होने की संभावना नहीं है। कुल मिलाकर राज्य में इस साल का मानसून सूखा और निराशाजनक साबित होकर ही विदा ले रहा है।
फसल उत्पादन पर सीधा खतरा और अनिश्चित होता मौसम
मौसम विभाग द्वारा कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में हल्की बारिश की संभावना बनाए रखने के बावजूद खेती किसानी के स्तर पर नुकसान की आशंकाएं काफी गहरी हो चुकी हैं। इस वर्ष का मानसून इसलिए भी विश्लेषकों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है क्योंकि ठीक एक साल पहले यानी वर्ष 2025 में राजस्थान की धरती पर हुई मूसलाधार बारिश ने 108 साल के पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया था।
महज बारह महीनों के भीतर हालात बिल्कुल पलट गए और बारिश सामान्य औसत से 21 फीसदी नीचे आ गिरी। वर्षा में आई इस अप्रत्याशित कमी के कारण समूचे प्रदेश में कृषि और खरीफ फसल उत्पादन के पैमाने पर बहुत बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के आसार बन चुके हैं। एक वर्ष में अत्यधिक बारिश का ऐतिहासिक रिकॉर्ड और उसके ठीक अगले वर्ष 17 साल का सबसे कमजोर मानसूनी सूखा पड़ना, जलवायु और स्थानीय मौसम चक्र में आ रहे तीव्र उतार-चढ़ाव की ओर एक गंभीर इशारा कर रहा है।
राजस्थान में मानसूनी बादलों की औपचारिक विदाई अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुकी है। अगले लगभग सात दिनों में मानसून की वापसी रेखा राज्य की सीमा से बाहर निकल जाएगी और इसी के साथ मानसूनी गतिविधियों का सिलसिला पूर्ण विराम की ओर बढ़ जाएगा। कमजोर मानसूनी प्रदर्शन ने एक बार फिर किसानों के सामने आजीविका और अगली फसलों के प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।




















