राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में बीकानेर नगर निगम का मुकाबला राज्य भर में चर्चा का केंद्र बन गया। राज्य के दस नगर निगमों में से बीकानेर अकेला ऐसा नगर निगम रहा जहाँ कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ था। दूसरी तरफ, अन्य सभी नगर निगमों में अपना परचम लहराने वाली बीजेपी ने यहाँ भी अपना बोर्ड बनाने के लिए हर मुमकिन राजनीतिक दांव आजमाया। हालांकि, तमाम जोड़तोड़ और सियासी गणित के बावजूद बीजेपी का फ्लोर मैनेजमेंट यहाँ पूरी तरह चरमरा गया और कांग्रेस अपना महापौर बनाने में कामयाब रही। हालांकि इसके बाद उपमहापौर के चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस की कुछ चूक का फायदा उठाकर बाजी जरूर पलटी, लेकिन महापौर चुनाव में उसकी रणनीति उल्टी पड़ गई।
राज्य के नगर निगमों का चुनावी परिदृश्य
राजस्थान के कुल 309 नगरीय निकायों में से 10 नगर निगम शामिल हैं। इन दस में से सात नगर निगमों में महापौर और उपमहापौर के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। केवल बीकानेर को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी छह नगर निगमों में बीजेपी ने अपने महापौर निर्वाचित करवा लिए हैं। वहीं जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगमों में महापौर और उपमहापौर के चुनाव 25 सितंबर को निर्धारित हैं, जहाँ बीजेपी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त दिख रही है। ऐसे माहौल में बीकानेर की हार बीजेपी के लिए अंदरूनी स्तर पर गहरे मंथन और चर्चा का विषय बनी हुई है।
दशक भर के मजबूत गढ़ में बीजेपी का कमजोर फ्लोर मैनेजमेंट
बीकानेर लंबे समय से बीजेपी की मजबूत सियासी जमीन मानी जाती रही है। पिछले 10 वर्षों से नगर निगम की सत्ता पर बीजेपी का ही कब्जा था। इसके अलावा केंद्र सरकार में लगातार तीसरी बार शामिल केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल यहीं से लगातार चार बार सांसद चुने जा चुके हैं। शहर की दोनों विधानसभा सीटों पर भी बीजेपी के ही विधायक काबिज हैं। इतने मजबूत राजनीतिक आधार के बावजूद नगर निगम चुनाव में पार्टी का पिछड़ना हर किसी को चौंका गया। कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत था, फिर भी बीजेपी ने सत्ता हथियाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। लेकिन प्रदेश के अन्य नगर निगमों की तुलना में बीकानेर में पार्टी का फ्लोर मैनेजमेंट बेहद लचर साबित हुआ।
बीडी कल्ला की घेराबंदी और निर्दलीयों का बिखराव
बीजेपी ने बीकानेर में कांग्रेस के कद्दावर नेता बीडी कल्ला के प्रभाव क्षेत्र में सेंधमारी करने की आक्रामक योजना तैयार की थी। लेकिन लंबे राजनीतिक अनुभव वाले बीडी कल्ला ने बीजेपी के इस दांव को पूरी तरह नाकाम कर दिया। उन्होंने अपने पार्षदों की किलेबंदी को इतना मजबूत रखा कि बीजेपी उसमें सेंध नहीं लगा सकी। उल्टे बीजेपी उन निर्दलीयों को भी अपने पाले में नहीं रोक पाई, जिनके समर्थन का वह दम भर रही थी। चुनाव परिणाम आने तक समीकरण पूरी तरह उलट चुके थे और कांग्रेस बीजेपी के प्रभाव वाले निर्दलीय पार्षदों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रही।
वार्डों का गणित और मतदान के दौरान बड़ा उलटफेर
बीकानेर नगर निगम के कुल 80 वार्डों में से कांग्रेस ने 42 वार्डों में जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया था। वहीं बीजेपी के खाते में महज 27 पार्षद आए थे। इनके अलावा 10 निर्दलीय और एक आरएलपी का पार्षद चुनाव जीता था। चुनाव के दौरान बीजेपी के महापौर प्रत्याशी सुरेन्द्र सिंह शेखावत ने सात निर्दलीय पार्षदों के साथ एक तस्वीर जारी कर यह दावा किया था कि ये सभी उनके साथ हैं और बाकी भी उनके खेमे में आ जाएंगे। दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना था कि बहुमत के 42 पार्षदों के अलावा चार निर्दलीय भी उनके साथ खड़े हैं। जब मतदान के बाद नतीजे सामने आए तो हकीकत कुछ और ही निकली। कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी अनिल कल्ला को कुल 50 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार सुरेन्द्र सिंह शेखावत केवल 30 वोट ही हासिल कर सके। यानी बीजेपी जिन सात निर्दलीयों का दावा कर रही थी, उनमें से केवल तीन ने ही पार्टी को वोट दिया और बाकी चार निर्दलीय मतदान के वक्त कांग्रेस के पाले में चले गए। राज्य के अन्य नगर निगमों में निर्दलीयों को बांधकर रखने वाली बीजेपी बीकानेर में अपनी बाड़ाबंदी को संभाल नहीं पाई।
तुरुप का पत्ता बने बागी को नोटिस देकर भड़काया
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी के हाथ से बाजी फिसलने की सबसे बड़ी वजह कांग्रेस के बागी नवरत्न डागा से जुड़ा घटनाक्रम रहा। नवरत्न डागा के पास खुद समेत दो पार्षद थे और वे कांग्रेस कैंप में बीजेपी के लिए सबसे बड़े तुरुप के इक्के साबित हो सकते थे। लेकिन चुनाव से ठीक पहले नवरत्न डागा और पार्षद मकसूद अहमद को दो अलग मामलों में पुलिस की तरफ से थाने में पेश होने के नोटिस थमा दिए गए। इस कानूनी कार्रवाई ने बागी खेमे को नाराज कर दिया। बीजेपी के इस कदम ने कांग्रेस को सक्रिय होने और अपने नाराज बागी को मनाने का सुनहरा अवसर दे दिया। कांग्रेस नेतृत्व ने तुरंत डागा से संपर्क साधा और उन्हें मनाकर वापस अपने पाले में ले लिया। इसके बाद नवरत्न डागा ने महापौर पद के लिए दाखिल अपना नामांकन वापस ले लिया, जिससे कांग्रेस की स्थिति और ज्यादा मजबूत हो गई।
चौधराहट की जंग और नेताओं की गुटबाजी
बीजेपी की रणनीति फेल होने के पीछे अंदरूनी कलह और उम्मीदवारी को लेकर असंतोष भी एक प्रमुख कारण रहा। पार्टी द्वारा सुरेन्द्र सिंह शेखावत को महापौर प्रत्याशी बनाए जाने से उनके प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले पार्टी के दो अन्य पार्षद असहज महसूस कर रहे थे। इसके अलावा चुनावी प्रबंधन संभालने के लिए पार्टी ने एक साथ कई बड़े नेताओं को मैदान में उतार दिया। कमान संभालने की इस होड़ में चौधराहट की जंग शुरू हो गई और पार्टी अलग-अलग खेमों में बंट गई। हर नेता अपनी अलग रणनीति पर काम करने लगा। हालांकि बीजेपी ने पूरे चुनाव की कमान अपने कद्दावर नेता राजेन्द्र राठौड़ के हाथों में सौंपी थी, लेकिन वे स्थानीय स्तर पर बिखरे रायते को समेटने और अंदरूनी खींचतान को भांपने में असफल रहे। वहीं बीकानेर के एक अन्य प्रमुख बीजेपी नेता का पूरे घटनाक्रम से चुपचाप दूरी बनाए रखना भी पार्टी की आंतरिक दरारों की ओर स्पष्ट इशारा कर गया।




















